रिपोर्टर: रंजीत सिंह
DGP Kailash Makwana : मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) कैलाश मकवाना सेवानिवृत्ति से कुछ दिन पहले एक प्रशासनिक विवाद को लेकर चर्चा में हैं। पुलिस मुख्यालय और हैदराबाद की हार्टफुलनेस संस्था के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) पर अब शासन की अनुमति और अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर सवाल उठने लगे हैं। फरवरी 2025 में हुए इस समझौते को लेकर दावा किया जा रहा है कि इसके लिए शासन से पहले औपचारिक मंजूरी नहीं ली गई थी।
मामला तब सामने आया, जब आईजी रुचिवर्धन मिश्रा ने हैदराबाद स्थित हार्टफुलनेस केंद्र में प्रशिक्षण लेने के लिए शासन से अनुमति मांगी। इस आवेदन के बाद गृह विभाग ने पूरे मामले की जानकारी जुटानी शुरू की। जांच के दौरान पुलिस मुख्यालय और संस्था के बीच हुए पुराने समझौते का भी पता चला।
खास बात यह है कि मध्यप्रदेश शासन के आनंद विभाग में पहले से ही ध्यान और मानसिक तनाव प्रबंधन से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित हैं। ऐसे में अलग से MoU करने की जरूरत और उसकी प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि, अभी तक इस मामले में किसी वित्तीय अनियमितता की पुष्टि नहीं हुई है। मुख्य विवाद समझौते की मंजूरी और डीजीपी के अधिकारों को लेकर है।

आईजी के प्रशिक्षण आवेदन से सामने आया फरवरी 2025 का MoU
DGP Kailash Makwana पुलिस मुख्यालय और हार्टफुलनेस संस्था के बीच 2 फरवरी 2025 को समझौता हुआ था। इस पर तत्कालीन पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाना और संस्था की ओर से कमलेश डी. पटेल ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते का उद्देश्य मध्यप्रदेश पुलिस के अधिकारियों, कर्मचारियों और उनके परिवारों को निशुल्क ध्यान प्रशिक्षण उपलब्ध कराना था।
बताया गया कि पुलिसकर्मियों की व्यस्त दिनचर्या, लगातार ड्यूटी और काम के दबाव को देखते हुए ध्यान कार्यक्रम शुरू करने की पहल की गई थी। इसके जरिए कर्मचारियों को मानसिक तनाव कम करने, एकाग्रता बढ़ाने और मुश्किल परिस्थितियों में मानसिक संतुलन बनाए रखने का प्रशिक्षण दिया जाना था।
विवाद उस समय सामने आया, जब आईजी रुचिवर्धन मिश्रा ने हैदराबाद स्थित हार्टफुलनेस केंद्र में प्रशिक्षण के लिए सरकारी अनुमति मांगी। इस आवेदन पर विचार करते हुए गृह विभाग ने प्रशिक्षण कार्यक्रम और उसके लिए हुए समझौते की जानकारी मांगी।
DGP Kailash Makwana सूत्रों के अनुसार, इसी प्रक्रिया में फरवरी 2025 का MoU चर्चा में आया। इसके बाद यह सवाल उठा कि क्या पुलिस मुख्यालय ने समझौते से पहले शासन की स्वीकृति ली थी? क्या डीजीपी को अपने स्तर पर किसी बाहरी संस्था के साथ इस तरह का समझौता करने का अधिकार था? बताया जा रहा है कि उपलब्ध फाइल में पूर्व अनुमति से संबंधित स्पष्ट दस्तावेज सामने नहीं आए हैं। हालांकि, इस संबंध में अंतिम स्थिति मूल सरकारी रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
आनंद विभाग की पहले से व्यवस्था, फिर अलग समझौते की जरूरत क्यों पड़ी?
DGP Kailash Makwana इस पूरे विवाद में मध्यप्रदेश शासन का आनंद विभाग भी महत्वपूर्ण भूमिका में है। आनंद विभाग पहले से ही लोगों को ध्यान, योग और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के कार्यक्रम संचालित करता है। विभाग अलग-अलग संस्थाओं के सहयोग से ऐसे शिविर और प्रशिक्षण गतिविधियां आयोजित करता रहा है।
गृह विभाग की ओर से जानकारी मांगे जाने पर आनंद विभाग ने बताया कि उसके प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हैदराबाद की हार्टफुलनेस संस्था, कोयंबटूर की ईशा फाउंडेशन और आर्ट ऑफ लिविंग जैसी संस्थाएं शामिल रही हैं।
विभाग की ओर से यह भी बताया गया कि ध्यान और मानसिक तनाव प्रबंधन के लिए पहले से व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में इसी उद्देश्य से पुलिस मुख्यालय द्वारा अलग से नया समझौता करने की आवश्यकता पर सवाल उठे।
DGP Kailash Makwana यहां गौर करने वाली बात है कि हार्टफुलनेस संस्था का प्रशिक्षण मुख्य रूप से ध्यान लगाने, तनाव प्रबंधन और मानसिक शांति से संबंधित है। यह पुलिस की तकनीकी ट्रेनिंग या कानून-व्यवस्था से जुड़ा प्रशिक्षण नहीं है। संस्था का उद्देश्य लोगों को व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में मानसिक संतुलन बनाए रखने के तरीके सिखाना है।
पुलिसकर्मियों के लिए इस तरह के कार्यक्रम उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर सवाल यह है कि जब आनंद विभाग के माध्यम से पहले से प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध थी, तो पुलिस मुख्यालय को अलग समझौते की जरूरत क्यों महसूस हुई?
इस मामले में गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय कुमार शुक्ल ने बताया कि आनंद विभाग से जानकारी मांगी गई थी। विभाग ने पहले से उपलब्ध प्रशिक्षण व्यवस्था के बारे में जानकारी दी है। वहीं हार्टफुलनेस के साथ हुए समझौते का परीक्षण कराने की बात भी कही गई है।
शासन की मंजूरी और डीजीपी के अधिकारों पर उठे सवाल, पहले भी विवादों में रहे फैसले
DGP Kailash Makwana हार्टफुलनेस MoU को लेकर सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा प्रशासनिक अधिकारों का है। सरकारी विभागों में किसी संस्था के साथ समझौता करने, वित्तीय स्वीकृति देने और सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षण के लिए भेजने की अलग-अलग प्रक्रियाएं निर्धारित होती हैं।
ऐसे में यह जांचना जरूरी होगा कि पुलिस महानिदेशक को इस तरह का समझौता स्वतंत्र रूप से करने का अधिकार था या इसके लिए गृह विभाग अथवा शासन की पूर्व अनुमति जरूरी थी।
यदि संबंधित नियमों के तहत शासन की मंजूरी अनिवार्य थी और वह नहीं ली गई, तो मामला प्रशासनिक प्रक्रिया के उल्लंघन के दायरे में आ सकता है। हालांकि, इसका निर्णय संबंधित नियमों, अधिकार प्रत्यायोजन और हस्ताक्षरित दस्तावेजों की जांच के आधार पर ही किया जा सकता है।
कैलाश मकवाना के कार्यकाल में इससे पहले भी पुलिस मुख्यालय के कुछ फैसलों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर सवाल उठ चुके हैं।
- आईपीएस अधिकारियों की पदस्थापना: पुलिस मुख्यालय से जारी कुछ पदस्थापना संबंधी आदेश बाद में वापस लेने पड़े थे। इस मामले में आईपीएस अधिकारियों की पोस्टिंग के अधिकार को लेकर गृह विभाग की भूमिका पर चर्चा हुई थी।
- सॉफ्टवेयर खरीदी का मामला: साइबर पुलिस के लिए सॉफ्टवेयर खरीदने की प्रक्रिया में भी शासन की पूर्व अनुमति और वित्तीय अधिकारों को लेकर सवाल उठे थे। बताया गया कि बाद में कार्योत्तर स्वीकृति लेने की स्थिति बनी।
- सेवानिवृत्ति की तारीख का विवाद: पुलिस मुख्यालय ने कैलाश मकवाना की सेवानिवृत्ति की तारीख 2 दिसंबर 2026 मानने का प्रस्ताव गृह विभाग को भेजा था। हालांकि, गृह विभाग ने इसे स्वीकार नहीं किया और उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख 30 नवंबर 2026 निर्धारित मानी।
इन मामलों में अलग-अलग प्रशासनिक परिस्थितियां रही हैं, लेकिन सभी में पुलिस मुख्यालय और शासन के अधिकार क्षेत्र को लेकर चर्चा हुई।
पुलिसकर्मियों के लिए निशुल्क ध्यान कार्यक्रम, लेकिन सरकारी खर्च का हिसाब भी जरूरी
DGP Kailash Makwana हार्टफुलनेस संस्था के साथ हुए समझौते के तहत पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों को बिना शुल्क ध्यान प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई थी। आईजी रुचिवर्धन मिश्रा के अनुसार, इसका उद्देश्य पुलिसकर्मियों का तनाव कम करना और उनकी कार्यक्षमता बेहतर बनाना था।
दिसंबर 2025 में मध्यप्रदेश के एक हजार से अधिक पुलिस थानों में साप्ताहिक ध्यान सत्र शुरू किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी। विश्व ध्यान दिवस पर करीब 2,800 केंद्रों से 50 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों के ऑनलाइन जुड़ने का दावा किया गया था।
हालांकि, संस्था की ओर से प्रशिक्षण निशुल्क होने का मतलब यह नहीं है कि प्रशिक्षण के लिए होने वाले सभी सरकारी खर्च भी शून्य थे। अधिकारियों की हैदराबाद यात्रा, आवागमन, ठहरने और टीए-डीए से संबंधित खर्चों की जानकारी भी महत्वपूर्ण है।
यदि सरकारी धन का उपयोग हुआ है, तो यह देखना होगा कि यात्रा की अनुमति किस स्तर से दी गई और भुगतान के लिए कौन सक्षम प्राधिकारी था। संबंधित बिल, स्वीकृति आदेश और यात्रा रिकॉर्ड से इस स्थिति को स्पष्ट किया जा सकता है।
डीजीपी ने नहीं दिया जवाब, गृह विभाग कराएगा समझौते का परीक्षण
DGP Kailash Makwana इस मामले में कैलाश मकवाना से भी उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई थी। उन्होंने सवाल व्हाट्सऐप पर भेजने के लिए कहा। इसके बाद उनसे पूछा गया कि हार्टफुलनेस संस्था के साथ समझौता करते समय शासन की अनुमति ली गई थी या नहीं और क्या उनके पास ऐसा MoU करने का अधिकार था।
बताया गया कि डीजीपी ने संदेश पढ़े, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं दिया। ऐसे में उनका पक्ष सामने नहीं आ सका है। केवल जवाब नहीं मिलने के आधार पर आरोपों को सही नहीं माना जा सकता।
DGP Kailash Makwana दूसरी ओर, गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय कुमार शुक्ल ने समझौते का परीक्षण कराने की बात कही है। उनका कहना है कि आनंद विभाग से मिली जानकारी के आधार पर पहले से उपलब्ध प्रशिक्षण व्यवस्था का पता चला है। हार्टफुलनेस के साथ हुए MoU की प्रशासनिक प्रक्रिया की जांच के बाद ही इस पर स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
कैलाश मकवाना 30 नवंबर 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में उनके कार्यकाल के अंतिम दिनों में सामने आया यह मामला प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो गया है। अब निगाहें गृह विभाग की जांच पर हैं। यह देखना बाकी है कि MoU के लिए शासन की मंजूरी जरूरी थी या नहीं और पुलिस मुख्यालय ने समझौता करते समय निर्धारित नियमों का पालन किया था या नहीं।

