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By: Ravindra Sikarwar

केंद्र सरकार ग्रामीण भारत को सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। लोकसभा में केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पेश किए जाने वाले ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल, 2025’ को संक्षेप में VB-G RAM G या जी-राम-जी बिल कहा जा रहा है। यह विधेयक 2005 के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को पूरी तरह बदलकर एक नया कानूनी ढांचा स्थापित करेगा। सरकार का लक्ष्य है कि यह नया कानून ‘विकसित भारत 2047’ के विजन को साकार करने में ग्रामीण क्षेत्रों की भूमिका को मजबूत बनाए।

मनरेगा ने पिछले दो दशकों में ग्रामीण परिवारों को न्यूनतम 100 दिनों का गारंटीड रोजगार देकर गरीबी कम करने और प्रवास रोकने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लाखों गांवों में सड़कें, तालाब और अन्य बुनियादी सुविधाएं इसी योजना से बनीं। लेकिन अब ग्रामीण भारत बदला है – बेहतर कनेक्टिविटी, डिजिटल पहुंच, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार और विविध आजीविका के अवसरों ने पुरानी व्यवस्था को अपडेट करने की मांग की है। नए बिल में रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 कर दिया गया है, जो हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को अकुशल श्रम के लिए वैधानिक अधिकार देगा। इससे आय बढ़ने और परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने की उम्मीद है।

इस विधेयक की खासियतें कई हैं। सबसे पहले, कार्यों का फोकस अब चार प्रमुख क्षेत्रों पर होगा: जल संरक्षण और सुरक्षा, मूल ग्रामीण अवसंरचना का विकास, आजीविका से जुड़ी परियोजनाएं और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए मजबूत ढांचा। सभी बनने वाली संपत्तियों को ‘विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक’ में दर्ज किया जाएगा, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय और लंबे समय तक टिकाऊ विकास सुनिश्चित होगा। खेती के व्यस्त मौसम में योजना के तहत अधिकतम 60 दिनों का काम नहीं गिना जाएगा, ताकि किसानों को मजदूरों की कमी न हो। प्राकृतिक आपदाओं में विशेष छूट का प्रावधान भी रखा गया है।

पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए डिजिटल तकनीक का व्यापक इस्तेमाल होगा। बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जियो-टैगिंग, डिजिटल मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (MIS) और सामाजिक ऑडिट अनिवार्य होंगे। भुगतान की व्यवस्था मजबूत की गई है – काम पूरा होने के 15 दिनों या साप्ताहिक आधार पर मजदूरी मिलेगी। अगर 15 दिनों में काम नहीं मिला तो बेरोजगारी भत्ता का प्रावधान है। शिकायतों के लिए बहु-स्तरीय और जिला स्तर पर लोकपाल की व्यवस्था होगी। कार्य योजना ग्राम पंचायत से शुरू होकर ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर तक एकीकृत होगी, जिससे स्थानीय जरूरतों का बेहतर ध्यान रखा जा सकेगा।

वित्तीय व्यवस्था में भी बदलाव है। सामान्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य का अनुपात 60:40 होगा, जबकि उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10। केंद्र शासित प्रदेशों को 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता मिलेगी। अनुमानित वार्षिक खर्च करीब 1.51 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें केंद्र का हिस्सा लगभग 95,692 करोड़ रुपये होगा। वित्त वर्ष 2025-26 में ग्रामीण रोजगार योजनाओं के लिए अब तक का सबसे बड़ा बजट 86,000 करोड़ रुपये रखा गया है, जो इस नई योजना के लिए मजबूत आधार प्रदान करेगा।

हालांकि, इस बिल पर राजनीतिक मतभेद उभर आए हैं। विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस, ने महात्मा गांधी का नाम हटाने पर तीखा विरोध जताया है। कांग्रेस सांसदों का कहना है कि योजना को मजबूत करने के नाम पर बापू की विरासत को मिटाया जा रहा है। कुछ नेताओं ने रोजगार दिनों को 150 और न्यूनतम मजदूरी को 400 रुपये करने की मांग की है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल के सांसद इसे गरीबों और ग्रामीणों के लिए फायदेमंद बता रहे हैं, जो आर्थिक प्रगति और रोजगार सुरक्षा को नई ऊंचाई देगा।

कुल मिलाकर, जी-राम-जी बिल ग्रामीण भारत को सिर्फ रोजगार का स्रोत नहीं, बल्कि समृद्धि का केंद्र बनाने की कोशिश है। यह पुरानी योजना की कमियों को दूर कर आधुनिक चुनौतियों से निपटने का प्रयास है। अगर संसद से पारित होता है तो करोड़ों ग्रामीणों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आएगा। डिजिटल निगरानी और लक्षित कार्यों से भ्रष्टाचार कम होगा और विकास तेज। अब संसद में होने वाली बहस इस बिल की दिशा तय करेगी, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का यह प्रयास निश्चित रूप से एक नई शुरुआत का संकेत है।

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