by-Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े मामले में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका को एक बार फिर खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इन दोनों के खिलाफ प्रथम दृष्टया (prima facie) पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, जो यह दर्शाते हैं कि वे इस आपराधिक साजिश का हिस्सा थे।
अदालत का फैसला और अवलोकन:
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि खालिद और इमाम के खिलाफ दायर की गई चार्जशीट और अन्य सबूतों से यह स्पष्ट है कि उनकी भूमिका केवल विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं थी। अदालत ने कहा कि उनके भाषणों और गतिविधियों ने हिंसा को भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे बड़े पैमाने पर दंगे हुए।
अभियोजन पक्ष का तर्क:
अभियोजन पक्ष (दिल्ली पुलिस) ने अदालत में कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध की आड़ में दंगे भड़काने की योजना बनाई थी। पुलिस ने उनके खिलाफ कई व्हाट्सएप चैट, फोन रिकॉर्डिंग, और उनके भाषणों के वीडियो फुटेज सबूत के तौर पर पेश किए। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि ये सबूत दिखाते हैं कि खालिद और इमाम ने जानबूझकर सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा दिया, जिससे कई लोगों की मौत हुई और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा।
बचाव पक्ष का तर्क:
बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किलों को गलत तरीके से फँसाया गया है और उनके भाषणों को गलत तरीके से पेश किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके भाषणों में हिंसा का कोई आह्वान नहीं था और यह केवल लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा थे। वकीलों ने जमानत देने की मांग करते हुए कहा कि खालिद और इमाम दो साल से अधिक समय से जेल में हैं और उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है।
अगले कदम:
उच्च न्यायालय से जमानत न मिलने के बाद, अब उमर खालिद और शरजील इमाम के पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प है। यह मामला अभी भी निचली अदालत में विचाराधीन है और सुनवाई चल रही है। खालिद और इमाम दोनों को सख्त गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोपी बनाया गया है, जिसमें जमानत मिलना काफी मुश्किल होता है। यह मामला भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच के संतुलन पर बहस को जारी रखे हुए है।
