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by-Ravindra Sikarwar

लद्दाख के लेह शहर में हाल के दिनों में राज्यसत्ता और संवैधानिक छठी अनुसूची में शामिल होने की मांगों को लेकर भड़के हिंसक प्रदर्शनों के बाद प्रशासन ने राहत की सांस ली है। 1 अक्टूबर 2025 को कर्फ्यू में चरणबद्ध ढील दी गई, जिससे स्थानीय बाजार फिर से खुले और लोग आवश्यक सामान खरीदने निकले। हालांकि, मोबाइल इंटरनेट सेवाएं 3 अक्टूबर तक निलंबित रहेंगी, और पांच या इससे अधिक लोगों के जमावड़े पर रोक बनी हुई है। दूसरी ओर, कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (केडीए) ने केंद्र सरकार के साथ 6 अक्टूबर को निर्धारित वार्ता से हटने का ऐलान किया है, लेकिन कुछ शर्तों के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने की इच्छा जताई है। यह घटनाक्रम लद्दाख के स्वायत्तता संघर्ष को नई ऊंचाई दे रहा है, जहां स्थानीय संगठन शांतिपूर्ण आंदोलन की प्रतिबद्धता दोहरा रहे हैं, लेकिन केंद्र पर विश्वास बहाली की मांग कर रहे हैं।

प्रदर्शनों का पृष्ठभूमि और समयरेखा:
लद्दाख का यह आंदोलन 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद जम्मू-कश्मीर से अलग होकर केंद्र शासित प्रदेश बनने से उपजा है। स्थानीय निवासी राज्यसत्ता की मांग कर रहे हैं, ताकि उनकी सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और जनजातीय पहचान की रक्षा हो सके। छठी अनुसूची में शामिल होने से आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष प्रशासनिक स्वायत्तता मिलेगी, जो भूमि, नौकरियां और संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण सुनिश्चित करेगी। आंदोलन की शुरुआत 10 सितंबर 2025 को जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन से हुई, जो इन मांगों को मनवाने के लिए बैठे थे। लेकिन स्थिति बिगड़ते ही 26 सितंबर को वांगचुक को हिरासत में ले लिया गया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत जोधपुर जेल में बंद हैं।

24 सितंबर को लेह में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच भिड़ंत भड़क उठी, जब हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई, जिसमें चार नागरिक मारे गए—इनमें कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिक त्सेवांग थारचिन (46 वर्षीय) भी शामिल थे। थारचिन का शव कर्फ्यू के बीच अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया, जो घटना की गंभीरता को दर्शाता है। कुल 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया, और आगजनी व तोड़फोड़ की घटनाएं दर्ज हुईं। इन मौतों ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश फैला दिया, जिसके बाद लेह में कर्फ्यू लगाना पड़ा। कर्फ्यू 25 सितंबर से सातवें दिन प्रवेश कर चुका था, और इंटरनेट ब्लैकआउट ने संचार को और कठिन बना दिया।

कर्फ्यू में ढील और सुरक्षा व्यवस्था:
1 अक्टूबर को सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक कर्फ्यू में चार घंटे की छूट दी गई, जिसे बाद में शाम 5 बजे तक बढ़ा दिया गया। इससे लोग घरों से बाहर निकले, बाजारों में चहल-पहल लौटी, और कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। लेह के उप-जिलाधिकारी ने बताया कि स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन सतर्कता बरती जा रही है। लेफ्टिनेंट गवर्नर कविंदर गुप्ता ने उच्च स्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक बुलाई, जिसमें पुलिस, सीआरपीएफ, सेना और आईटीबीपी के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। गुप्ता ने निर्देश दिए कि 24 सितंबर की हिंसा के जिम्मेदारों की पहचान कर सख्त कार्रवाई हो, और खुफिया तंत्र को मजबूत किया जाए। उन्होंने स्थानीय लोगों की जिम्मेदाराना भूमिका की सराहना की, लेकिन “असामाजिक और राष्ट्र-विरोधी तत्वों” से सावधान रहने की चेतावनी दी। टेलीकॉम एक्ट 2023 के तहत इंटरनेट निलंबन को सार्वजनिक आपातकाल टालने के लिए जरूरी बताया गया।

कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस की शर्तें और लेह एपेक्स बॉडी का समर्थन:
कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (केडीए), जो कारगिल के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठनों का संयुक्त मंच है, ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केंद्र के साथ वार्ता से हटने की घोषणा की। केडीए के सह-अध्यक्ष असगर अली करबलाई ने कहा, “हम 6 अक्टूबर की बैठक में हिस्सा नहीं लेंगे, जब तक 24 सितंबर की नागरिक हत्याओं की निष्पक्ष न्यायिक जांच न हो।” अन्य शर्तें हैं: हिरासत में लिए गए सभी लोगों की बिना शर्त रिहाई, आगे गिरफ्तारियां बंद करना, और सोनम वांगचुक समेत नेताओं को तुरंत मुक्त करना। करबलाई ने वांगचुक को “राष्ट्र-विरोधी” बताने पर आपत्ति जताई, कहा कि वे लद्दाख के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, न कि देश के खिलाफ।

यह फैसला लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) का समर्थन करता है, जो लेह-आधारित संगठनों का समूह है। एलबी ने पहले ही वार्ता स्थगित करने का ऐलान किया था, और केडीए ने इसे जॉइन कर लिया। दोनों संगठन राज्यसत्ता और छठी अनुसूची की मांगों पर अडिग हैं, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध की प्रतिबद्धता दोहराई। गृह मंत्रालय ने वार्ता के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित की थी, लेकिन बहिष्कार से यह प्रक्रिया पटरी से उतर गई।

विपक्ष की आलोचना और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं:
विपक्ष ने केंद्र पर निशाना साधा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने चार मौतों की न्यायिक जांच की मांग की, गांधी ने कहा, “लद्दाख के लोगों के साथ विश्वासघात हुआ है। हिंसा और भय की राजनीति बंद हो।” खड़गे ने गलवान संघर्ष के बाद चीन को “क्लीन चिट” देने का जिक्र किया। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी केंद्र को “धोखेबाज” बताया, कहा कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटने पर उत्सव मनाने वाले लेहवासी अब सड़कों पर हैं। लद्दाख बीजेपी इकाई ने जांच और मामूली अपराधों में फंसे लोगों की रिहाई की मांग की, जो समाधान की दिशा में सकारात्मक संकेत है।

लद्दाख के स्वायत्तता मुद्दों का व्यापक संदर्भ:
लद्दाख का संघर्ष केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद से चला आ रहा है, जब जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त हुआ। स्थानीय लोग भूमि हड़पने, नौकरियों में बाहरी हस्तक्षेप और पर्यावरण क्षति से चिंतित हैं। छठी अनुसूची असम, मेघालय जैसे राज्यों में आदिवासी स्वायत्तता का मॉडल है, जो लद्दाख के बौद्ध-प्रधान संस्कृति के अनुकूल हो सकता है। यह आंदोलन न केवल राजनीतिक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा भी, क्योंकि वांगचुक जैसे कार्यकर्ता हिमालयी पारिस्थितिकी की रक्षा पर जोर देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना विश्वास बहाली के वार्ता संभव नहीं, और लद्दाख को संघर्ष क्षेत्र न बनने दें।

प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि वैध चिंताओं का लोकतांत्रिक तरीके से समाधान होगा, लेकिन भविष्य की वार्ता शर्तों पर निर्भर करेगी। स्थानीय निवासी शांति चाहते हैं, लेकिन अपनी पहचान की रक्षा के लिए लड़ते रहेंगे। यह घटना संघीय ढांचे में क्षेत्रीय आकांक्षाओं के संतुलन पर सवाल खड़ी कर रही है।

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