By: Ravindra Sikarwar
मध्यप्रदेश के बहुचर्चित व्यापम घोटाले से जुड़े एक पुराने मामले में आखिरकार अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। यह फैसला उन आरोपियों के खिलाफ है, जिन पर पुलिस कॉन्स्टेबल भर्ती परीक्षा 2012 में नकल और प्रतिरूपण (Impersonation) कराकर सरकारी भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप था।
ग्वालियर स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने गुरुवार को इस मामले में दो आरोपियों — रणवीर और हरवेंद्र सिंह चौहान उर्फ प्रवेंद्र कुमार — को दोषी मानते हुए 7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अदालत ने दोनों पर 11,000 रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया है।
कैसे हुआ था घोटाला उजागर?
यह पूरा मामला वर्ष 2012 में पुलिस कॉन्स्टेबल भर्ती परीक्षा के दौरान सामने आया था। परीक्षा केंद्र अधीक्षक ने नकल और प्रतिरूपण के शक के आधार पर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद 30 सितंबर 2012 को थाना मुरैना में एफआईआर नंबर 770/2012 दर्ज की गई।
शुरुआती जांच में पता चला कि परीक्षा में असली उम्मीदवारों की जगह प्रशिक्षित व्यक्तियों को बैठाया गया था, जिससे वे लिखित परीक्षा में अच्छे नंबर ला सकें। यह तरीका संगठित नकल रैकेट का हिस्सा माना गया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने संभाली जांच
शुरुआत में इस मामले की जांच मध्यप्रदेश पुलिस ने की और रणवीर के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई। लेकिन मामले की गंभीरता और व्यापम घोटाले के बढ़ते दायरे को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 8 अगस्त 2015 को इस केस को सीबीआई के हवाले कर दिया।
सीबीआई ने इस मामले में गहन जांच करते हुए IPC की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ मध्यप्रदेश मान्यता प्राप्त परीक्षा अधिनियम, 1937 के तहत भी आरोप तय किए।
दो सप्लीमेंट्री चार्जशीट ने खोले बड़े राज
जांच के दौरान सीबीआई ने अदालत में दो सप्लीमेंट्री चार्जशीट प्रस्तुत की।
- पहली चार्जशीट – 30 सितंबर 2016 (रणवीर के खिलाफ)
- दूसरी चार्जशीट – 29 सितंबर 2017 (हरवेंद्र उर्फ प्रवेंद्र के खिलाफ)
जांच में सामने आया कि दोनों आरोपी संगठित तरीके से परीक्षा प्रणाली को प्रभावित करने में शामिल थे। उन्होंने पैसे लेकर असली अभ्यर्थियों की जगह अन्य लोगों को परीक्षा दिलाने की व्यवस्था की थी।
अदालत ने माना अपराध साबित
अभियोजन पक्ष ने अदालत में मजबूत सबूत और गवाही पेश की। अदालत ने माना कि आरोपियों की भूमिका सिर्फ मध्यस्थता तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने परीक्षा में धांधली को अंजाम देने की सोची-समझी साजिश तैयार की थी।
इसके बाद अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए 7 वर्ष की कठोर कैद और जुर्माने की सजा सुनाई।
CBI की प्रतिक्रिया
सीबीआई की ओर से कहा गया कि यह फैसला उन संस्थानों में भरोसा बहाल करने की दिशा में अहम कदम है, जो पारदर्शी और निष्पक्ष परीक्षाओं के जरिए भविष्य निर्माण करते हैं।
सीबीआई का कहना है कि परीक्षा से जुड़े भ्रष्टाचार से न केवल उम्मीदवारों का भविष्य प्रभावित होता है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था और जनता के भरोसे को भी गहरी क्षति पहुंचाता है।
व्यापम घोटाला — अभी भी जारी जांच और फैसलों का दौर
व्यापम घोटाला सिर्फ एक परीक्षा या भर्ती का मामला नहीं है, बल्कि वर्षों तक चली संगठित धांधली, फर्जी प्रवेश, नकल, प्रतिरूपण और रिश्वतखोरी का ऐसा जाल है जिसमें छात्र, अधिकारी, दलाल और सिस्टम के कई स्तर शामिल रहे हैं।
इस मामले में अभी भी कई आरोपियों के खिलाफ अदालतों में सुनवाई और जांच प्रक्रिया जारी है।
यह सजा इस बात का संदेश देती है कि परीक्षा प्रणाली से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ अब सख्त कार्रवाई और कानूनी परिणाम सामने आएंगे।
