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By: Ravindra Sikarwar

मध्य प्रदेश में आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी द्वारा की गई टिप्पणी ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भूचाल ला दिया है। राज्य की भाजपा सरकार ने तुरंत कड़ा रुख अपनाते हुए 2011 बैच के आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा को बुधवार देर रात तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। साथ ही सामान्य प्रशासन विभाग ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भी थमा दिया है। निलंबन के समय संतोष वर्मा कृषि एवं किसान कल्याण विभाग में उप सचिव के पद पर कार्यरत थे। सरकार का स्पष्ट कहना है कि सरकारी सेवा में रहते हुए कोई भी अधिकारी संवैधानिक प्रावधानों और सामाजिक संवेदनशीलता के खिलाफ सार्वजनिक मंच से बोलने की स्वतंत्रता नहीं रखता। निलंबन आदेश जारी होने के साथ ही उन्हें सभी शासकीय सुविधाओं और दायित्वों से भी दूर कर दिया गया है।

घटना का श्रीगणेश 22 नवंबर 2025 को भोपाल में आयोजित एक निजी साहित्यिक समारोह से हुआ। इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे संतोष वर्मा ने खचाखच भरे हॉल में आरक्षण व्यवस्था पर खुलकर बोलना शुरू किया। उन्होंने कहा कि “आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक समानिक पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना था, जो काफी हद तक पूरा हो चुका है। अब यह व्यवस्था अपना स्वरूप खोकर केवल एक स्थायी राजनीतिक हथियार बन गई है, जिसका इस्तेमाल वोट बैंक की राजनीति के लिए लगातार किया जा रहा है।” उनके इस बयान का वीडियो किसी उपस्थित व्यक्ति ने तुरंत सोशल मीडिया पर डाल दिया और देखते-देखते पूरे प्रदेश में वायरल हो गया। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के संगठनों ने इसे आरक्षण-विरोधी मानसिकता करार देते हुए सड़कों पर उतर आए। विपक्षी दल कांग्रेस ने भी मौके का फायदा उठाते हुए सरकार पर हमला बोला कि जब उसके अपने अधिकारी ही आरक्षण को राजनीतिक हथियार बता रहे हैं तो संविधान की रक्षा करने की बातें कितनी खोखली हैं।

प्रदेश सरकार पर जैसे-जैसे दबाव बढ़ता गया, उसने बिना वक्त गंवाए एक्शन ले लिया। सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव ने रात में ही निलंबन आदेश पर हस्ताक्षर किए। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्वयं इस पूरे मामले की मॉनिटरिंग की और कहा कि संवैधानिक मूल्यों के साथ कोई समझौता नहीं होगा। अधिकारी को सात दिन के अंदर लिखित जवाब देना होगा कि उनके बयान से सरकारी नीतियों और सामाजिक सौहार्द पर क्या असर पड़ा। यदि जवाब संतोषजनक नहीं हुआ तो उनके खिलाफ बड़ी विभागीय कार्रवाई, यहाँ तक कि बर्खास्तगी तक की जा सकती है। यह घटना एक बार फिर यह बहस छेड़ रही है कि नौकरशाही को व्यक्तिगत विचार रखने का कितना अधिकार है और संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति सार्वजनिक मंच पर कितनी स्वतंत्रता ले सकता है। फिलहाल संतोष वर्मा अपने गृह जिले में हैं और मीडिया से दूरी बनाए हुए हैं। पूरे मामले ने मध्य प्रदेश की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है।

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