by-Ravindra Sikarwar
भोपाल: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मध्य क्षेत्र सह-कार्यवाह हेमंत मुक्तिबोध ने रविवार को ‘मध्य प्रदेश सुशासन संवाद 2.0’ के मंच पर ‘संघ संवाद’ सत्र में संघ की विचारधारा, हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा और वर्तमान सामाजिक परिदृश्य पर खुलकर बात की। पाञ्चजन्य के इस विशेष विमर्श में उन्होंने पिछले सौ वर्षों से संघ को दिशा देने वाली मूल विचारधारा को सरल शब्दों में रखा।
हिन्दू राष्ट्र कोई नया राजनीतिक नारा नहीं:
मुक्तिबोध जी ने याद दिलाया कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में संघ की स्थापना के साथ ही स्पष्ट कर दिया था कि यह देश सदा से हिन्दू राष्ट्र है और रहेगा। जब कुछ लोगों ने हिन्दू राष्ट्र की बात करने वालों को पागल कहा था, तब डॉ. साहब ने दृढ़ स्वर में कहा था, “यह राष्ट्र हिन्दू राष्ट्र था, है और रहेगा। जब तक इस भूमि पर हिन्दू रक्त की एक बूंद भी मौजूद है, तब तक यह देश हिन्दू राष्ट्र ही कहलाएगा।”
उन्होंने कहा कि यदि हम इतिहास को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदर्भों में देखें, तो भारत कभी भी केवल भौगोलिक इकाई नहीं रहा। यह सदा से सांस्कृतिक एकता का प्रतीक रहा है, जिसे हम हिन्दू राष्ट्र कहते हैं।
संघ के लिए ‘हिन्दू’ की परिभाषा समावेशी है:
संघ पर अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि हिन्दू किसे कहते हैं? मुक्तिबोध जी ने स्पष्ट किया कि संघ के लिए हिन्दू कोई संकीर्ण धार्मिक पहचान नहीं है। उनके शब्दों में, “जो इस भारत भूमि को अपनी मातृभूमि और पितृभूमि मानता है, इसकी संस्कृति का सम्मान करता है, इसके मूल्यों से प्रेम करता है – वह हिन्दू है। उसकी पूजा-पद्धति, मजहब या पंथ कुछ भी हो।”
यह परिभाषा किसी को बाहर नहीं करती, बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसी उदार भावनाओं पर आधारित समावेशी सांस्कृतिक चेतना को रेखांकित करती है। हिन्दुत्व मूल्य-आधारित जीवन दृष्टि है, जो सांस्कृतिक एकता को राष्ट्र की पहचान मानती है।
राष्ट्र पहले जन से बनता है, फिर प्रशासन आता है:
मुक्तिबोध जी ने संविधान की प्रस्तावना का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पहले ‘We the People of India’ आता है, फिर ‘India’। यानी राष्ट्र पहले लोगों से बनता है, प्रशासनिक ढांचा बाद में आता है। प्राचीन काल में ऋषियों की भद्र इच्छाएं – “सर्वे भवन्तु सुखिनः”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” – ही राष्ट्र की संकल्पना का आधार बनीं। यही आध्यात्मिक अधिष्ठान हिन्दुत्व है।
संघ का सपना: समाज इतना सशक्त हो जाए कि संघ स्वयं विलीन हो जाए
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “संघ समाज से अलग कोई संगठन नहीं है। हमारा लक्ष्य है कि समाज इतना संगठित, सशक्त और जागृत हो जाए कि संघ को अलग से रहने की जरूरत ही न पड़े। हम तो जल्द से जल्द अपना काम पूरा कर समाज में विलीन होना चाहते हैं।”
शाखा चरित्र निर्माण का केंद्र है:
“संघ को समझना है तो शाखा में आइए” – यह वाक्य उन्होंने दोहराया। शाखा केवल खेल-कूद या व्यायाम का स्थान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और संस्कार देने की प्रयोगशाला है। स्वामी विवेकानंद के ‘Man with Capital M’ की संकल्पना को साकार करने का स्थान है शाखा।
विरोध और आरोपों पर मुस्कुराते हुए जवाब:
आरएसएस पर लगने वाले आरोपों पर मुक्तिबोध जी ने हल्के अंदाज में कहा, “आरोप लगाना किसी की स्वतंत्रता है। हमें समाज से जितना अधिक प्रेम और समर्थन मिलता है, कुछ लोगों को उतनी ही पीड़ा होती है। हम तो अहिंसावादी और मासूम संगठन हैं। आज का विरोधी भी हमारा अपना भारतवासी है। हम किसी से बैर नहीं रखते।”
प्रचार नहीं, सत्य का संप्रेषण:
प्रचार न करने की आलोचना पर उन्होंने कहा, “संघ ने कभी अपना ढोल नहीं पीटा। पुराना गीत है – ‘वृत्तपत्रों में नाम छपेगा… छोड़ चलो ये छुद्र भावना’। लेकिन आज समाज में कई नकारात्मक नैरेटिव जानबूझकर फैलाए जा रहे हैं। ऐसे में समाज को सही तथ्य बताना हमारा दायित्व बन जाता है। हम संघ का प्रचार नहीं, समाज में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का संदेश पहुंचाते हैं।”
दूर-दराज के क्षेत्रों में संघ क्यों?:
नक्सल प्रभावित या पिछड़े इलाकों में संघ की उपस्थिति पर उन्होंने कहा, “समस्या होने पर ही नहीं, भारत के पुनर्जागरण के लिए हर कोना महत्वपूर्ण है। नक्सलवाद खत्म हो जाए तब भी भारत को संघ चाहिए, क्योंकि हमें फिर से विश्वगुरु बनाने के लिए वही संस्कार और संगठन चाहिए, जिसने कभी भारत को महान बनाया था।”
पाञ्चजन्य के इस संवाद में मुक्तिबोध जी ने संघ की सौ साल पुरानी वैचारिक यात्रा को न केवल स्पष्ट किया, बल्कि यह भी दिखाया कि हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा आज भी उतनी ही प्रासंगिक और समावेशी है, जितनी 1925 में थी। यह संवाद केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना को पुनर्जागृत करने का सशक्त आह्वान था।
