By: Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण मोहरा बनता जा रहा है, जहां चीन अपनी आर्थिक और सैन्य पहुंच को तेजी से बढ़ा रहा है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के जरिए ढाका में बड़े निवेश और रक्षा सहयोग के माध्यम से बीजिंग न केवल आर्थिक प्रभाव बढ़ा रहा है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को भी प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विकास भारत के लिए गंभीर चुनौती पेश कर रहा है, खासकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) की सुरक्षा और पूर्वोत्तर राज्यों की स्थिरता के संदर्भ में।
चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और रक्षा उपकरण आपूर्तिकर्ता बन चुका है। पिछले एक दशक में बांग्लादेश के आयातित हथियारों का 70-80 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया है, जिसमें पनडुब्बियां, फ्रिगेट्स, लड़ाकू विमान और मिसाइल सिस्टम शामिल हैं। हाल के वर्षों में ढाका ने चीनी जे-10सी फाइटर जेट्स, एसवाई-400 मिसाइल सिस्टम और अन्य उन्नत हथियार खरीदे हैं। सबसे चिंताजनक है कॉक्स बाजार के निकट पेकुआ में बीएनएस शेख हसीना सबमरीन बेस का निर्माण, जो दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा सबमरीन आधार माना जाता है। यह बेस छह पनडुब्बियों और कई युद्धपोतों को समायोजित करने की क्षमता रखता है, जबकि बांग्लादेश के पास वर्तमान में केवल दो चीनी पनडुब्बियां हैं। यह अतिरिक्त क्षमता भारत में आशंकाएं पैदा कर रही है कि चीन भविष्य में इस बेस का उपयोग अपनी नौसेना के लिए कर सकता है।
इसी तरह, लालमोनिरहाट एयरबेस का विकास और मोंगला पोर्ट का विस्तार भी चीनी सहायता से हो रहा है। लालमोनिरहाट बेस भारत की सीमा से मात्र 15 किलोमीटर दूर है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब स्थित होने से रणनीतिक रूप से संवेदनशील है। मोंगला पोर्ट के लिए 2025 में चीन ने 370 मिलियन डॉलर का समझौता किया है। ये परियोजनाएं बांग्लादेश की ‘फोर्सेस गोल 2030’ आधुनिकीकरण योजना का हिस्सा हैं, लेकिन इनसे चीन की बंगाल की खाड़ी में पहुंच मजबूत हो रही है।

आर्थिक मोर्चे पर बीआरआई के तहत चीन ने बांग्लादेश में अरबों डॉलर का निवेश किया है। प्रमुख परियोजनाओं में पद्मा ब्रिज रेल लिंक (लगभग 3.3 बिलियन डॉलर), पायरा पोर्ट और पावर प्लांट, कर्णफुली नदी के नीचे सुरंग, और कई राजमार्ग व पावर प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। ये निवेश बांग्लादेश की कनेक्टिविटी और ऊर्जा क्षेत्र को मजबूत कर रहे हैं, लेकिन कर्ज के बोझ और निर्भरता की चिंता भी बढ़ा रहे हैं। पद्मा ब्रिज रेल लिंक जैसे प्रोजेक्ट्स ढाका को दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों से जोड़कर व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन ये चीन की रणनीतिक पहुंच को भी गहरा कर रहे हैं।

बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता इस स्थिति को और जटिल बना रही है। 2024 में शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद अंतरिम सरकार के नेतृत्व में मुहम्मद यूनुस ने चीन के साथ संबंधों को और मजबूत किया है। 2025 में यूनुस की चीन यात्रा और नए रक्षा सौदों ने भारत में चिंताएं बढ़ा दी हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति 1971 के बाद भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है। रिपोर्ट में इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों की वापसी, युवा राष्ट्रवाद और चीन-पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव का जिक्र है। समिति ने कहा कि ये कारक मिलकर दीर्घकालिक और संरचनात्मक खतरा पैदा कर सकते हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता और भारत की पड़ोस नीति को प्रभावित करेंगे।

भारत सरकार ने संसदीय समिति को आश्वासन दिया है कि वह चीन की गतिविधियों पर करीबी नजर रख रही है और बांग्लादेश के साथ संबंधों को मजबूत करने के प्रयास जारी हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को रक्षा सहयोग, निवेश और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स में अधिक सक्रिय होना होगा ताकि चीन की निर्भरता को संतुलित किया जा सके। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार भी विदेश नीति में विविधता ला रही है, लेकिन क्षेत्रीय शक्तियों के इस खेल में ढाका की स्थिति भारत के लिए निर्णायक बनी हुई है।
यह विकास न केवल द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा गतिशीलता को भी बदल रहा है। आने वाले समय में सभी की निगाहें इस पर टिकी होंगी कि बांग्लादेश इन बाहरी प्रभावों को कैसे संतुलित करता है और भारत अपनी रणनीतिक स्थिति को कैसे मजबूत रखता है।
