By: Ravindra Sikarwar
छत्तीसगढ़ राज्य सिकल सेल एनीमिया जैसी आनुवंशिक बीमारी को जड़ से खत्म करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के तहत 2047 तक इस रोग को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने का संकल्प लिया गया है। राज्य सरकार इस राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास कर रही है, जिसमें बड़े पैमाने पर जांच अभियान, मुफ्त उपचार और उन्नत चिकित्सा सुविधाओं का विकास शामिल है। विशेष रूप से आदिवासी बहुल क्षेत्रों में यह बीमारी अधिक प्रचलित है, इसलिए यहां फोकस ज्यादा है। राज्य की यह पहल न केवल मरीजों को राहत दे रही है, बल्कि भविष्य में इस रोग की रोकथाम के लिए मजबूत आधार तैयार कर रही है।
व्यापक स्क्रीनिंग अभियान और उल्लेखनीय उपलब्धियां
राज्य में 0 से 40 वर्ष की आयु के लोगों की सिकल सेल जांच को प्राथमिकता दी जा रही है। इस अभियान के तहत अब तक लगभग 1.65 करोड़ नागरिकों की जांच पूरी हो चुकी है और उनकी जानकारी केंद्र सरकार के ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज की गई है। इन जांचों से 3 लाख 35 हजार से ज्यादा व्यक्ति सिकल सेल वाहक (कैरियर) पाए गए हैं, जबकि 27 हजार 135 लोगों में इस रोग की पुष्टि हुई है।
एक बड़ी सफलता यह है कि जशपुर जिला देश का पहला ऐसा जिला बन गया है, जहां लक्षित आबादी की शत-प्रतिशत स्क्रीनिंग पूरी कर ली गई है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का गृह जिला होने के कारण यहां विशेष ध्यान दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप यह मील का पत्थर हासिल हुआ। इस उपलब्धि से अन्य जिलों को भी प्रेरणा मिल रही है और पूरे राज्य में स्क्रीनिंग की गति बढ़ी है। जांच के दौरान चिह्नित सभी व्यक्तियों को विशेष कार्ड जारी किए जा रहे हैं, जो आगे की निगरानी और उपचार में मदद करते हैं।
स्वास्थ्य विभाग की मजबूत व्यवस्थाएं और उपचार सुविधाएं
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने सिकल सेल प्रबंधन के लिए ठोस कदम उठाए हैं। पिछले दो वर्षों में सरकारी अस्पतालों में हाइड्रोक्सीयूरिया दवा की खपत एक लाख कैप्सूल से बढ़कर पांच लाख कैप्सूल हो गई है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि उपचार की पहुंच कितनी व्यापक हो चुकी है और मरीजों तक दवाएं नियमित रूप से पहुंच रही हैं।
चिह्नित मरीजों को राज्य सरकार की ओर से मुफ्त दवाएं, डॉक्टरी सलाह और निरंतर इलाज की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, मरीजों की सुविधा के लिए विशेष संसाधन जैसे मेडिसिन गाइड, पेशेंट बुकलेट और दर्द नियंत्रण के दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं। संवेदनशीलता दिखाते हुए पात्र मरीजों को दिव्यांगता प्रमाण पत्र भी दिए जा रहे हैं, जिससे उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।
पिछले एक साल में 5,232 मरीजों का नियमित फॉलो-अप किया गया, जिससे सिकल सेल संकट (क्राइसिस) के मामलों और रक्त की जरूरत में काफी कमी आई है। सभी मरीजों को हर तीन महीने में मुफ्त रक्त परीक्षण, लीवर तथा किडनी की जांच की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। ये कदम न केवल वर्तमान मरीजों की स्थिति सुधार रहे हैं, बल्कि रोग की जटिलताओं को कम करने में भी प्रभावी साबित हो रहे हैं।
भविष्य के लिए उन्नत चिकित्सा केंद्र का विकास
आने वाले समय की जरूरतों को देखते हुए रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में सिकल सेल सेंटर ऑफ कॉम्पिटेंस स्थापित किया जा रहा है। यह केंद्र उच्च स्तरीय सुविधाओं से लैस होगा, जहां बोन मैरो ट्रांसप्लांट, जेनेटिक जांच और सीवीएस टेस्ट जैसी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध होंगी। इससे गंभीर मरीजों को उन्नत इलाज मिल सकेगा और राज्य में ही सभी सुविधाएं उपलब्ध हो जाएंगी।
यह केंद्र न केवल उपचार का हब बनेगा, बल्कि अनुसंधान और प्रशिक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। आदिवासी क्षेत्रों में डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग और जागरूकता कार्यक्रमों के साथ मिलकर यह पहल सिकल सेल को पूरी तरह नियंत्रित करने में मदद करेगी।
छत्तीसगढ़ की यह मुहिम राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहनीय है। राज्य सरकार का संकल्प है कि जनजातीय समुदायों को इस आनुवंशिक रोग से मुक्ति दिलाई जाए और एक स्वस्थ समाज का निर्माण किया जाए। निरंतर प्रयासों से जल्द ही छत्तीसगढ़ सिकल सेल मुक्त राज्य की मिसाल कायम करेगा।
