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By: Ravindra Sikarwar

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की कठिन स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कोलकाता में संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित व्याख्यानमाला में उन्होंने स्पष्ट कहा कि वहां हिंदू अल्पसंख्यक होने के कारण परिस्थितियां बेहद जटिल बनी हुई हैं। इस कार्यक्रम में हजारों बुद्धिजीवियों और स्वयंसेवकों की उपस्थिति रही, जहां डॉ. भागवत ने न केवल सामाजिक मुद्दों पर चर्चा की, बल्कि हिंदू समाज की एकजुटता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर भी बल दिया।

बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति और एकता की आवश्यकता
डॉ. भागवत ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों का जिक्र करते हुए कहा कि अल्पसंख्यक होने की वजह से वहां की स्थितियां काफी मुश्किल हैं। उन्होंने जोर देकर अपील की कि सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बांग्लादेश के हिंदुओं को संगठित और एकजुट रहना होगा। साथ ही, विश्व भर के हिंदू समुदाय को उनकी हरसंभव मदद के लिए आगे आना चाहिए। सरसंघचालक ने भारत की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदुओं का एकमात्र अपना देश भारत है, इसलिए यहां की सरकार को इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए और आवश्यक कदम उठाने चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सरकार शायद पहले से ही कुछ प्रयास कर रही हो, लेकिन कुछ कार्य सार्वजनिक नहीं किए जा सकते। भारत अपनी सीमाओं के भीतर रहते हुए जितनी सहायता संभव हो, उतनी करे, यह उनका मानना है।

भारत की सांस्कृतिक पहचान और हिंदू समाज की जिम्मेदारी
व्याख्यान में डॉ. भागवत ने भारत को परंपरागत रूप से हिंदू सभ्यता की धरती बताया। उन्होंने कहा कि यह देश प्राचीन काल से अपनी विरासत और संस्कृति के माध्यम से आगे बढ़ता रहा है। हिंदू समाज को राष्ट्र के प्रति हमेशा जिम्मेदार माना गया है। देश में अच्छा हो या बुरा, हिंदुओं से ही सवाल किए जाते हैं कि उन्होंने राष्ट्र के लिए क्या योगदान दिया। एक सुसंगठित समाज ही स्वाभाविक स्थिति है, और हिंदुओं को अपनी एकता से राष्ट्र को मजबूत बनाना चाहिए। परिवारिक मूल्यों, परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन पर भी उन्होंने विस्तार से चर्चा की, जो संघ की कार्यपद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मुस्लिम विरोधी होने के आरोपों का खंडन
संघ पर लगने वाले मुस्लिम विरोधी होने के आरोपों को डॉ. भागवत ने सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य पूरी तरह पारदर्शी है और कोई भी व्यक्ति स्वयं आकर इसे देख सकता है। कई लोग ऐसा करने के बाद मान चुके हैं कि संघ हिंदू समाज को संगठित और सुरक्षित करने का काम करता है, लेकिन वह मुस्लिम विरोधी नहीं है। संघ का कोई शत्रु नहीं है, बल्कि यह समाज के कल्याण और हिंदू एकता के लिए कार्यरत है।

अयोध्या विवाद और बाबरी मस्जिद का मुद्दा
अयोध्या मामले पर बोलते हुए सरसंघचालक ने कहा कि लंबे कानूनी संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राम मंदिर का निर्माण हुआ और विवाद समाप्त हो गया। अब किसी जगह पर बाबरी मस्जिद जैसी संरचना बनाकर पुराना विवाद फिर से जगाने की कोशिश राजनीतिक साजिश है, जो वोट बैंक की खातिर की जा रही है। इससे न हिंदुओं का भला होगा और न मुसलमानों का। ऐसे प्रयासों से समाज में विभाजन ही बढ़ेगा।

संघ को भाजपा से अलग समझने की सलाह
डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नजरिए से देखना बड़ी भूल है। संघ एक सामाजिक संगठन है, जिसकी विचारधारा और कार्यपद्धति अनोखी है। इसे किसी राजनीतिक दल से जोड़कर समझने की कोशिश गलतफहमी पैदा करती है। संघ के स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते हैं, जिनमें राजनीति भी शामिल है, लेकिन संघ स्वयं राजनीतिक एजेंडा नहीं चलाता। संघ की वैचारिक यात्रा और भविष्य के लक्ष्यों पर उन्होंने विस्तृत प्रकाश डाला, जिसमें समाज को विश्वगुरु बनाने की तैयारी शामिल है।

यह व्याख्यान संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित श्रृंखला का हिस्सा था, जो देश के विभिन्न शहरों में हो रही है। डॉ. भागवत का संदेश हिंदू समाज के लिए एकता और जागृति का आह्वान था, साथ ही सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने का। उनके विचारों ने न केवल बांग्लादेश के मुद्दे पर ध्यान आकर्षित किया, बल्कि भारत की सांस्कृतिक मजबूती पर भी जोर दिया। आने वाले समय में ऐसे मुद्दे राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का केंद्र बने रहेंगे।

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