by-Ravindra Sikarwar
केंद्र सरकार ने 2025-26 के लिए अफीम खेती की नीति को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत केवल मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में ही अफीम की खेती की अनुमति होगी। यह निर्णय नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम, 1985 के तहत लिया गया है। नीति के अनुसार, मध्य प्रदेश के किसानों को अपनी अफीम की उपज विशेष रूप से केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN) को ही बेचनी होगी। यह नीति न केवल अफीम की खेती को नियंत्रित करने बल्कि इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए भी बनाई गई है।
नीति का विवरण:
केंद्र सरकार ने हर साल की तरह इस वर्ष भी अफीम खेती को सख्त नियमों के तहत नियंत्रित करने का निर्णय लिया है। 2025-26 सत्र के लिए, केवल तीन राज्यों—मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश—को ही अफीम की खेती की अनुमति दी गई है। इन राज्यों में अफीम की खेती लाइसेंसधारी किसानों द्वारा ही की जा सकती है, जिन्हें केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो द्वारा लाइसेंस जारी किया जाता है।
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र, विशेष रूप से नीमच, मंदसौर और रतलाम जिले, अफीम की खेती के लिए प्रमुख केंद्र हैं। नीति के तहत, इन क्षेत्रों के किसानों को अपनी पूरी उपज केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो को सौंपनी होगी, जो इसे औषधीय और वैज्ञानिक उपयोग के लिए प्रोसेस करता है। यह उपज दवाइयों, जैसे मॉर्फिन और कोडीन, के उत्पादन में उपयोग की जाती है।
NDPS अधिनियम के तहत नियम:
NDPS अधिनियम, 1985 के तहत अफीम की खेती को सख्ती से नियंत्रित किया जाता है ताकि इसका अवैध उपयोग और तस्करी रोकी जा सके। इस अधिनियम के अनुसार:
- केवल लाइसेंस प्राप्त किसान ही अफीम की खेती कर सकते हैं।
- खेती की प्रक्रिया, बुवाई से लेकर कटाई तक, केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो की निगरानी में होती है।
- किसानों को अपनी उपज का हिस्सा निजी उपयोग या बिक्री के लिए रखने की अनुमति नहीं है।
- किसी भी उल्लंघन पर कठोर दंड, जैसे लाइसेंस रद्द करना या कानूनी कार्रवाई, का प्रावधान है।
मध्य प्रदेश के लिए महत्व:
मध्य प्रदेश में अफीम की खेती कई किसानों के लिए आजीविका का प्रमुख स्रोत है। मालवा क्षेत्र में हजारों किसान इस खेती पर निर्भर हैं, और यह नीति उनके लिए स्थिरता और आय का स्रोत प्रदान करती है। हालांकि, सख्त नियमों के कारण किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे लाइसेंस प्राप्त करने में देरी और निगरानी की जटिल प्रक्रिया।
केंद्र सरकार ने इस नीति के तहत यह भी सुनिश्चित किया है कि किसानों को उनकी उपज के लिए उचित मूल्य मिले। केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो समय-समय पर मूल्य निर्धारण की समीक्षा करता है ताकि किसानों को नुकसान न हो। इसके अलावा, सरकार ने अवैध खेती और तस्करी को रोकने के लिए ड्रोन निगरानी और सैटेलाइट मैपिंग जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ाने का निर्णय लिया है।
आलोचनाएं और चुनौतियां:
हालांकि इस नीति का उद्देश्य अफीम की खेती को नियंत्रित करना है, लेकिन कुछ किसानों और विशेषज्ञों ने इसकी आलोचना भी की है। कुछ का मानना है कि सख्त नियम और लाइसेंस प्रक्रिया छोटे किसानों के लिए मुश्किलें पैदा करती है। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में अवैध अफीम की खेती की खबरें भी सामने आती रहती हैं, जो प्रशासन के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
स्थानीय किसान संगठनों ने मांग की है कि लाइसेंस प्रक्रिया को और सरल किया जाए और किसानों को उनकी उपज का भुगतान समय पर सुनिश्चित किया जाए। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी सुझाव दिया है कि सरकार को वैकल्पिक आजीविका के स्रोतों पर ध्यान देना चाहिए ताकि अफीम की खेती पर निर्भरता कम हो।
वैश्विक संदर्भ में भारत की स्थिति:
भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक है जो औषधीय उपयोग के लिए अफीम की खेती को कानूनी रूप से अनुमति देता है। यह खेती न केवल देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देती है बल्कि वैश्विक दवा उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत से निर्यात की जाने वाली अफीम का उपयोग दवाइयों के उत्पादन में किया जाता है, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त नियमों का पालन करना पड़ता है।
भविष्य की दिशा:
2025-26 की अफीम खेती नीति का उद्देश्य उत्पादन को नियंत्रित करते हुए किसानों की आजीविका को सुरक्षित करना और अवैध तस्करी को रोकना है। केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो ने इस साल और अधिक किसानों को लाइसेंस देने की योजना बनाई है ताकि उत्पादन में वृद्धि हो, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि सारी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के अनुरूप हो।
मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए यह नीति एक महत्वपूर्ण कदम है, जो उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में मदद कर सकती है। हालांकि, नीति के प्रभावी कार्यान्वयन और किसानों की समस्याओं का समाधान इसकी सफलता की कुंजी होगा।
