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by-Ravindra Sikarwar

मध्य प्रदेश: गुना जिले में हिरासत के दौरान एक युवक की संदिग्ध मौत के मामले की जांच कर रही केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने दो फरार पुलिसकर्मियों पर प्रत्येक के लिए 2 लाख रुपये का इनाम घोषित कर दिया है। यह कदम आरोपी पुलिसकर्मियों को जल्द पकड़ने और मामले में न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया है। उसी समय, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी घटनाओं पर कड़ी चेतावनी जारी करते हुए पुलिस महकमे को चिंता में डाल दिया है, जिससे मध्य प्रदेश में कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर निगरानी की तीव्रता बढ़ गई है। यह घटना 23 सितंबर, 2025 को गुना पुलिस थाने में हुई थी, जब 28 वर्षीय रामू साहू नामक एक स्थानीय मजदूर को चोरी के संदेह में गिरफ्तार किया गया था, और पूछताछ के दौरान उनकी मौत हो गई।

घटना का पूरा विवरण: हिरासत में संदिग्ध मौत का सिलसिला
गुना जिले के बमोरी थाना क्षेत्र के अंतर्गत 23 सितंबर की रात करीब 8 बजे रामू साहू को स्थानीय बाजार से चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। पुलिस के अनुसार, वे एक दुकान से सामान चुराने के प्रयास में पकड़े गए थे। थाने पहुंचने के बाद रामू को लॉकअप में रखा गया, जहां रात 11:30 बजे के आसपास उन्हें सीने में दर्द की शिकायत हुई। सहायक उप निरीक्षक (एएसआई) राजेश कुमार और हेड कांस्टेबल मनोज शर्मा द्वारा पूछताछ की जा रही थी, जब रामू अचानक बेहोश हो गए। थाने में उपलब्ध प्राथमिक चिकित्सा के बावजूद उन्हें नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। प्रारंभिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हृदयाघात का कारण बताया गया, लेकिन परिवार और स्थानीय संगठनों ने इसे पुलिस की पिटाई से जोड़ते हुए हत्या का आरोप लगाया।

परिवार ने बताया कि रामू एक गरीब मजदूर थे, जो दैनिक मजूरी से गुजारा करते थे और किसी आपराधिक गतिविधि में लिप्त नहीं थे। घटना के बाद थाने के बाहर सैकड़ों ग्रामीणों ने प्रदर्शन किया, जिसमें पुलिस थाने पर पथराव और वाहनों में तोड़फोड़ भी हुई। गुना जिला प्रशासन ने तुरंत धारा 144 लागू कर दी और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया। मध्य प्रदेश पुलिस ने प्रारंभ में मामला दर्ज करने से इनकार किया, लेकिन सामाजिक दबाव और मीडिया कवरेज के बाद 24 सितंबर को गुना एसपी ने एफआईआर दर्ज की, जिसमें राजेश कुमार और मनोज शर्मा सहित चार पुलिसकर्मियों को नामजद किया गया।

सीबीआई की जांच और इनाम की घोषणा: फरार आरोपियों पर शिकंजा
मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 25 सितंबर को जांच सीबीआई को सौंप दी। सीबीआई की विशेष टीम ने गुना पहुंचकर थाने का निरीक्षण किया, गवाहों के बयान दर्ज किए और सीसीटीवी फुटेज जब्त की। जांच में पाया गया कि घटना के समय थाने में उपलब्ध कैमरों को जानबूझकर बंद कर दिया गया था, और लॉकअप के बाहर कोई गवाह मौजूद नहीं था। राजेश कुमार और मनोज शर्मा 24 सितंबर से फरार हैं, जबकि अन्य दो पुलिसकर्मी—कांस्टेबल राकेश पटेल और चालक राम सिंह—हिरासत में हैं।

27 सितंबर को भोपाल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीबीआई के डीआईजी ने इनाम की घोषणा की। उन्होंने कहा, “फरार आरोपी पुलिसकर्मी जांच में सहयोग नहीं कर रहे, जो मामले को जटिल बना रहा है। इनाम की राशि सूचना देने वाले नागरिकों या संगठनों को दी जाएगी, और उनकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी।” सीबीआई ने फरारों के फोन नंबर ट्रैक किए हैं, जो इंदौर और भोपाल के आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय हैं। जांच एजेंसी ने रामू के शव का दोबारा पोस्टमार्टम करवाया है, जिसमें चोट के निशान मिलने की संभावना जताई गई है। परिवार को 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और एक सदस्य को नौकरी का आश्वासन दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी: पुलिस सुधारों पर जोर
इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर को एक संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान हिरासत में मौतों पर सख्त रुख अपनाया। चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा, “पुलिस हिरासत को कब्रिस्तान न बनने दें। ऐसी घटनाएं लोकतंत्र की नींव हिला देती हैं।” कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिए कि सभी थानों में सीसीटीवी कैमरों की अनिवार्य स्थापना हो, और हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के स्वास्थ्य की हर घंटे निगरानी की जाए। इस चेतावनी ने राज्य के पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया, जहां पहले से ही मानवाधिकार उल्लंघनों के कई मामले लंबित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने गुना मामले को उदाहरण बनाते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को रिपोर्ट मांगी है, और अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को निर्धारित की है। जस्टिस बी.आर. गवई ने टिप्पणी की, “पुलिस सुधार लंबे समय से लंबित हैं; अब कार्रवाई का समय आ गया है।” इस फैसले से न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश के पुलिस विभागों पर दबाव बढ़ गया है।

प्रतिक्रियाएं और सामाजिक प्रभाव: न्याय की मांग तेज
रामू के परिवार ने सीबीआई इनाम की सराहना की, लेकिन कहा कि “पैसे से न्याय नहीं मिलेगा; दोषियों को सजा दो।” स्थानीय विधायक और विपक्षी नेता राहुल सिंह ने विधानसभा में मामला उठाया, जहां उन्होंने पुलिस की मनमानी पर सवाल खड़े किए। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने बयान जारी कर कहा, “यह घटना सिस्टमिक फेल्योर को दर्शाती है; स्वतंत्र जांच जरूरी है।” सोशल मीडिया पर #JusticeForRamu ट्रेंड कर रहा है, जहां हजारों लोग पुलिस सुधारों की मांग कर रहे हैं।

गुना जिला कलेक्टर ने शांति बनाए रखने की अपील की और प्रभावित परिवारों के लिए काउंसलिंग सेंटर खोले जाने की घोषणा की। यह घटना मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था पर सवाल उठा रही है, जहां पिछले एक वर्ष में हिरासत मौतों की संख्या 12 से अधिक हो चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इनाम और कोर्ट की चेतावनी से अपराधियों को पकड़ना आसान होगा, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए पुलिस प्रशिक्षण और जवाबदेही में सुधार अनिवार्य है।

निष्कर्ष: न्याय का सफर जारी
गुना हिरासत मौत मामला न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। सीबीआई की कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से उम्मीद है कि दोषी जल्द सलाखों के पीछे पहुंचेंगे। यह घटना हमें याद दिलाती है कि कानून का राज हर नागरिक के लिए समान होना चाहिए, और पुलिस की भूमिका संरक्षक की होनी चाहिए, न कि उत्पीड़क की। रामू साहू की आत्मा को शांति मिले, यही प्रार्थना है।

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