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Casteism: मध्यप्रदेश में जाति और वर्ग आधारित राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंचती दिख रही है।

अब चर्चा जेलों में बंद कैदियों की सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर हो रही है।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा उठाए गए सवालों के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ गया है।

Casteism: जेलों की संख्या और क्षमता पर सवाल

नेता प्रतिपक्ष ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद मध्यप्रदेश की जेलों में कैदियों की संख्या सबसे अधिक है।

प्रदेश की 132 जेलों में कुल क्षमता लगभग 30 हजार कैदियों की है।

वर्तमान में यहां 45 हजार से अधिक लोग बंद हैं।

इस तरह जेलें अपनी निर्धारित क्षमता से कहीं ज्यादा भरी हुई हैं।

Casteism: विचाराधीन कैदियों की बड़ी तादाद

उमंग सिंघार के अनुसार, प्रदेश की जेलों में लगभग आधे कैदी विचाराधीन हैं।

यानी ऐसे लोग जिन पर अभी आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं या जिनके मामले अदालत में लंबित हैं।

यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति और जमानत व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है।

सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों की अधिक भागीदारी

विचाराधीन कैदियों के सामाजिक आंकड़ों पर ध्यान दिलाते हुए सिंघार ने कहा कि इनमें बड़ी संख्या अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आती है।

लगभग 80 प्रतिशत विचाराधीन कैदी इन्हीं वर्गों से हैं।

यह संकेत देता है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर तबके सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की चिंता और संवैधानिक अधिकार

नेता प्रतिपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कहा कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

अदालत पहले भी कह चुकी है कि गरीब और कमजोर वर्ग के लोग जमानत न करा पाने के कारण वर्षों तक जेल में रहते हैं।

यह एक गंभीर चिंता का विषय है।

दोषी कैदियों के आंकड़े भी चिंताजनक

सिंघार ने यह भी बताया कि दोषी कैदियों में भी अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत है। एनसीआरबी की रिपोर्ट और संसद में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि जेल सुधार और न्यायिक प्रक्रिया में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है।

निष्कर्ष


नेता प्रतिपक्ष ने सरकार और न्यायपालिका से मिलकर ठोस सुधारात्मक कदम उठाने की अपील की है।

यदि समय रहते इस दिशा में काम नहीं किया गया, तो जेल व्यवस्था सामाजिक असमानता का आईना बनती चली जाएगी।

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