by-Ravindra Sikarwar
वाशिंगटन/नई दिल्ली: विश्व बैंक ने अपनी ताजा रिपोर्ट ‘इंडिया फाइनेंशियल सेक्टर रिफॉर्म्स: अनलॉकिंग प्राइवेट कैपिटल फॉर ग्रोथ’ में भारत को वित्तीय क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधारों की सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत 2030 तक 8% की औसत जीडीपी वृद्धि दर हासिल करना चाहता है, तो उसे निजी क्षेत्र की पूंजी को बड़े पैमाने पर आकर्षित करना होगा। इसके लिए सार्वजनिक बैंकों की कार्यक्षमता बढ़ाने, सहकारी बैंकों पर नियामकीय नियंत्रण सख्त करने, डिजिटल फाइनेंस को मजबूत करने और बॉन्ड मार्केट को गहरा करने जैसे कदम जरूरी हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वर्तमान वित्तीय ढांचा निजी निवेशकों के लिए पर्याप्त आकर्षक नहीं है, जिससे विकास लक्ष्यों पर खतरा मंडरा रहा है।
रिपोर्ट का मूल संदेश: निजी पूंजी ही विकास का इंजन
विश्व बैंक के अर्थशास्त्रियों ने गणना की है कि 2025-2030 के बीच भारत को सालाना 1.5 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 125 लाख करोड़ रुपये) की पूंजी निवेश की आवश्यकता होगी। इसमें से 60% से अधिक निजी क्षेत्र से आना चाहिए। वर्तमान में, निजी निवेश जीडीपी का मात्र 22% है, जबकि चीन में यह 40% से ऊपर है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक और विश्व बैंक के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय निदेशक ऑगस्टे तानो कूएमे ने कहा, “भारत का सार्वजनिक क्षेत्र पहले से ही ऋणग्रस्त है। अब निजी पूंजी को प्रोत्साहित करना ही एकमात्र रास्ता है। इसके लिए वित्तीय प्रणाली को विश्वसनीय, पारदर्शी और जोखिम-मुक्त बनाना होगा।”
सहकारी बैंकों पर सख्ती: सबसे बड़ी कमजोरी
रिपोर्ट में सहकारी बैंकों (अर्बन कोऑपरेटिव बैंक – UCB और रूरल कोऑपरेटिव) को वित्तीय प्रणाली की सबसे कमजोर कड़ी बताया गया है। देश में 1,500 से अधिक UCB हैं, जिनके पास 6 लाख करोड़ रुपये की जमा राशि है, लेकिन पिछले दशक में 100 से अधिक बैंक दिवालिया हो चुके हैं। मुख्य समस्याएं:
- राजनीतिक हस्तक्षेप: स्थानीय नेताओं का बोर्ड में दबदबा।
- कमजोर गवर्नेंस: ऑडिट में अनियमितताएं, NPA स्तर 12-15%।
- दोहरी नियामक व्यवस्था: RBI और राज्य रजिस्ट्रार के बीच टकराव।
सिफारिशें:
- सभी UCB को RBI के एकल नियंत्रण में लाना।
- न्यूनतम पूंजी आवश्यकता को 100 करोड़ रुपये करना।
- डिजिटल कोर बैंकिंग सिस्टम अनिवार्य करना।
- अस्वस्थ बैंकों का विलय या समापन (जैसे PMC बैंक मॉडल)।
- जमा बीमा कवरेज को 5 लाख से बढ़ाकर 10 लाख रुपये करना।
सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण और सुधार:
रिपोर्ट ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल उठाए। PSB के पास कुल बैंकिंग संपत्ति का 65% हिस्सा है, लेकिन उनका NPA अनुपात 6.5% है (निजी बैंकों का 3.2%)। सिफारिशें:
- निजीकरण रोडमैप: 3-5 बड़े PSB का चरणबद्ध निजीकरण।
- बोर्ड स्वतंत्रता: सरकारी नामांकन की जगह प्रोफेशनल सिलेक्शन।
- क्रेडिट स्कोरिंग मॉडल: AI आधारित जोखिम मूल्यांकन।
- कर्मचारी प्रोत्साहन: परफॉर्मेंस लिंक्ड वेतन।
बॉन्ड मार्केट और पूंजी बाजार को गहराई:
भारत का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट जीडीपी का मात्र 18% है (चीन: 30%, अमेरिका: 50%)। निजी कंपनियां अभी भी 80% फंडिंग बैंक लोन से लेती हैं, जो जोखिम बढ़ाता है। सिफारिशें:
- म्युनिसिपल बॉन्ड: शहरों को इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बॉन्ड जारी करने की अनुमति।
- क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप (CDS): जोखिम हेजिंग के लिए लॉन्च।
- ग्रीन बॉन्ड फ्रेमवर्क: नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए।
- विदेशी निवेशकों के लिए आसान नियम: FPI लिमिट बढ़ाना।
डिजिटल फाइनेंस और फिनटेक क्रांति:
रिपोर्ट ने भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) – UPI, आधार, अकाउंट एग्रीगेटर – को विश्व स्तरीय बताया, लेकिन चेतावनी दी कि साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता में कमजोरी है। सिफारिशें:
- ओपन बैंकिंग API: सभी बैंकों के लिए अनिवार्य।
- साइबर इंश्योरेंस: छोटे व्यवसायों के लिए सब्सिडी।
- फिनटेक सैंडबॉक्स: नवाचार के लिए विस्तार।
सरकार और RBI की प्रतिक्रिया:
वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “रिपोर्ट की कई सिफारिशें हमारी नीतियों से मेल खाती हैं। सहकारी बैंकों पर RBI का एकल नियंत्रण हम विचार कर रहे हैं।” RBI गवर्नर शक्तिकांत दास ने सहकारी बैंकों के लिए नया ‘अंब्रेला ऑर्गनाइजेशन’ मॉडल पेश किया है, जो रिपोर्ट से प्रेरित लगता है।
चुनौतियां और जोखिम:
- राजनीतिक विरोध: सहकारी बैंक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं, सख्ती से वोटबैंक प्रभावित हो सकता है।
- कर्मचारी यूनियन: PSB निजीकरण पर हड़ताल का खतरा।
- क्षमता निर्माण: छोटे UCB के लिए डिजिटल अपनाना मुश्किल।
सुधारों का सुनहरा मौका:
विश्व बैंक की यह रिपोर्ट भारत के सामने एक स्पष्ट रोडमैप रखती है। यदि 2026-27 तक सहकारी बैंकों पर नियंत्रण, PSB सुधार और बॉन्ड मार्केट गहराई के कदम उठाए गए, तो 2030 तक निजी निवेश जीडीपी का 30% तक पहुंच सकता है। यह न केवल आर्थिक विकास को गति देगा, बल्कि वित्तीय समावेशन, रोजगार सृजन और वैश्विक निवेशक विश्वास को भी मजबूत करेगा। अब गेंद सरकार और RBI के पाले में है – सुधारों की गति और दृढ़ता ही भारत को ‘विकसित राष्ट्र’ के लक्ष्य तक पहुंचाएगी।
