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Bhopal: नवजातों की सुरक्षा पर सवाल

मध्यप्रदेश के सरकारी अस्पतालों में नवजात शिशुओं की देखभाल से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। गांधी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध हमीदिया अस्पताल ने इस व्यवस्था पर आपत्ति दर्ज कराई। रेडिएंट वार्मर के साथ दी जाने वाली यूपीएस सप्लाई की जगह इन्वर्टर उपलब्ध कराए जाने का खुलासा हुआ है।

Bhopal: हमीदिया अस्पताल की आपत्ति से हुआ खुलासा

हमीदिया अस्पताल के शिशु रोग विभाग प्रबंधन ने नेशनल हेल्थ मिशन को पत्र लिखकर बताया कि रेडिएंट वार्मर के संचालन के लिए यूपीएस आवश्यक है, लेकिन संबंधित एजेंसी ने इन्वर्टर की आपूर्ति कर दी है। जो न केवल तकनीकी मानकों के खिलाफ है, बल्कि नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए भी जोखिमपूर्ण हो सकता है।

Bhopal: टेंडर शर्तों में यूपीएस का स्पष्ट प्रावधान

जब अस्पताल प्रबंधन ने टेंडर दस्तावेजों की जांच की, तो उसमें रेडिएंट वार्मर के साथ यूपीएस की सप्लाई का साफ उल्लेख पाया गया। स्पेसिफिकेशन के अनुसार इन्वर्टर की आपूर्ति स्वीकार्य नहीं है। इसके बावजूद तय मानकों से अलग सामग्री भेजे जाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

तकनीकी कमजोरी और सुरक्षा का खतरा

तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार यूपीएस की तुलना में इन्वर्टर कम भरोसेमंद होता है, खासकर संवेदनशील चिकित्सा उपकरणों के लिए। इसके अलावा इन्वर्टर को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना भी मुश्किल होता है। ऐसे में बिजली आपूर्ति बाधित होने पर नवजातों की देखभाल पर सीधा असर पड़ सकता है।

करोड़ों के वित्तीय नुकसान की आशंका

चूंकि इन्वर्टर की कीमत यूपीएस से कम है, इसलिए मामले में वित्तीय अनियमितता की आशंका जताई जा रही है। आरोप है कि तय मानकों से अलग सप्लाई के जरिए करोड़ों रुपये के नुकसान की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह पहलू अब जांच का विषय बन गया है।

विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर खींचतान

नेशनल हेल्थ मिशन के तहत प्रदेशभर के स्वास्थ्य संस्थानों के लिए करीब 7 करोड़ रुपये की लागत से लगभग 900 रेडिएंट वार्मर खरीदे गए हैं। मामला सामने आने के बाद संबंधित विभाग और एजेंसियां एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालती नजर आ रही हैं। इस संबंध में शिशु स्वास्थ्य एवं पोषण शाखा की उप संचालक डॉ. हिमानी यादव ने कहा है कि टेंडर के अनुसार सामग्री की सप्लाई सुनिश्चित करना हेल्थ सर्विस कॉरपोरेशन की जिम्मेदारी है और शिकायत मिलने के बाद मामले की जांच कराई जा रही है। यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है, बल्कि नवजात शिशुओं की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

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