By: Ravindra Sikarwar
असम के वन्य क्षेत्र से होकर गुजरने वाली एक प्रमुख रेल लाइन पर बुधवार तड़के एक दर्दनाक हादसा सामने आया, जिसने वन्यजीव संरक्षण और रेल सुरक्षा—दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। राजधानी से गुवाहाटी की ओर जा रही राजधनी एक्सप्रेस एक हाथियों के झुंड से टकरा गई। इस टक्कर में सात हाथियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि ट्रेन के पांच डिब्बे पटरी से उतर गए। हालांकि राहत की बात यह रही कि यात्रियों में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं मिली, लेकिन यह घटना पर्यावरणीय संतुलन और बुनियादी ढांचे की तैयारियों पर चिंता बढ़ाने वाली है।
प्रत्यक्षदर्शियों और अधिकारियों के अनुसार, हादसा सुबह के समय उस इलाके में हुआ, जो पहले से ही हाथियों की आवाजाही के लिए जाना जाता है। बताया जा रहा है कि घना कोहरा और सीमित दृश्यता के कारण लोको पायलट को समय रहते झुंड का अंदाजा नहीं लग सका। जैसे ही ट्रेन मोड़ पर पहुंची, पटरियों पर हाथियों का समूह मौजूद था। तेज रफ्तार ट्रेन के पास रुकने का पर्याप्त समय नहीं था, जिससे टक्कर टल नहीं सकी।
हादसे की सूचना मिलते ही रेलवे और वन विभाग की टीमें मौके पर पहुंचीं। पटरी से उतरे डिब्बों को सुरक्षित करने और यात्रियों को बाहर निकालने का काम प्राथमिकता के साथ किया गया। सभी यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया और वैकल्पिक परिवहन की व्यवस्था की गई। रेलवे अधिकारियों ने बताया कि ट्रैक की मरम्मत और सामान्य परिचालन बहाल करने के लिए युद्धस्तर पर काम शुरू कर दिया गया है।
वन विभाग के अधिकारियों ने हाथियों की मौत पर गहरा दुख जताया। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जिस क्षेत्र में हादसा हुआ, वह हाथियों का पारंपरिक गलियारा माना जाता है। मानसून और सर्दियों के मौसम में भोजन और पानी की तलाश में हाथियों की आवाजाही बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे संवेदनशील इलाकों में ट्रेनों की गति सीमित रखने, चेतावनी संकेतों को और प्रभावी बनाने तथा आधुनिक तकनीक—जैसे थर्मल कैमरे और सेंसर—का उपयोग आवश्यक है।
इस घटना के बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय संगठनों ने एक बार फिर रेल मार्गों पर वन्यजीव सुरक्षा उपायों को सख्ती से लागू करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में ट्रेन से टकराने के कारण हाथियों सहित कई वन्यजीवों की जान जा चुकी है। यदि पहले से चिन्हित गलियारों पर गति नियंत्रण, अंडरपास/ओवरपास और रियल-टाइम मॉनिटरिंग की व्यवस्था होती, तो इस तरह की त्रासदी को रोका जा सकता था।
रेलवे प्रशासन ने मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। जांच में यह देखा जाएगा कि क्या निर्धारित सावधानियों का पालन किया गया था और किन परिस्थितियों में हादसा हुआ। साथ ही भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की बात कही गई है। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि वन विभाग के साथ समन्वय बढ़ाया जाएगा और संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त सतर्कता बरती जाएगी।
यह हादसा केवल एक रेल दुर्घटना नहीं, बल्कि मानव गतिविधियों और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव की चेतावनी है। विकास और संरक्षण के बीच संतुलन साधना आज की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। यदि समय रहते प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो ऐसी घटनाएं न केवल वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए खतरा बनेंगी, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती रहेंगी।
