By: Ravindra Sikarwar
भोपाल/ग्वालियर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने निजी स्कूलों-कॉलेजों में कार्यरत हजारों शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं कि प्रदेश के सभी 52 जिलों में ‘एकेडमिक ट्रिब्यूनल’ (शैक्षणिक अधिकरण) का गठन किया जाए। न्यायमूर्ति शील नागू और न्यायमूर्ति आनंद पाठक की खंडपीठ ने यह व्यवस्था एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये ट्रिब्यूनल निजी शैक्षणिक संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों-कर्मचारियों की वेतन कटौती, मनमानी बर्खास्तगी, मानसिक उत्पीड़न, छुट्टी न देना और अन्य सेवा संबंधी शिकायतों का तेजी से और प्रभावी ढंग से निस्तारण करेंगे। अदालत ने सरकार से चार सप्ताह के अंदर इस दिशा में की गई कार्यवाही की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
दरअसल, पिछले कई सालों से प्रदेश भर के निजी स्कूल, कोचिंग संस्थान और कॉलेजों में शिक्षकों के साथ हो रहे शोषण की शिकायतें लगातार बढ़ रही थीं। अधिकांश संस्थान मान्यता प्राप्त होने के बावजूद शिक्षकों को न्यूनतम वेतन नहीं देते, बिना नोटिस अवधि के नौकरी से निकाल देते हैं, पीएफ और ग्रेच्युटी जैसी कानूनी सुविधाएं नहीं देते। जब शिक्षक श्रम आयुक्त या शिक्षा विभाग के पास जाते हैं तो मामला सालों तक लटक जाता है। कई शिक्षकों ने तो आत्महत्या तक कर ली थी क्योंकि उनके पास कोई त्वरित न्याय का रास्ता नहीं था। इसी पृष्ठभूमि में ग्वालियर के शिक्षक संघ और कुछ सामाजिक संगठनों ने मिलकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में पहले से ही जिला स्तर पर एकेडमिक ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं, जो 90 दिनों के अंदर फैसला सुनाते हैं। मध्य प्रदेश में भी ऐसा ही तंत्र बनाने की जरूरत है।
खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि शिक्षा का क्षेत्र पूरी तरह वाणिज्यिक हो चुका है और निजी संस्थानों द्वारा शिक्षकों का आर्थिक व मानसिक शोषण संवैधानिक अधिकारों का हनन है। कोर्ट ने केंद्र सरकार के 2010 के ‘राइट टू एजुकेशन एक्ट’ और यूजीसी के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षक अगर मानसिक तनाव और आर्थिक अभाव में रहेंगे तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे दे पाएंगे? अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि वर्तमान में श्रम न्यायालयों में हजारों मामले लंबित हैं, जिनमें फैसला आने में 5-7 साल लग जाते हैं। ऐसे में एकेडमिक ट्रिब्यूनल ही एकमात्र व्यावहारिक समाधान है।
कोर्ट ने सरकार को जो मॉडल सुझाया है, उसके अनुसार हर जिले में यह ट्रिब्यूनल तीन सदस्यीय होगा – एक सेवानिवृत्त जिला जज अध्यक्ष होंगे, दूसरा सदस्य शिक्षा विभाग का वरिष्ठ अधिकारी और तीसरा सदस्य शिक्षक संगठनों का प्रतिनिधि होगा। ट्रिब्यूनल को 90 दिनों के अंदर फैसला देना अनिवार्य होगा और उसका निर्णय बाध्यकारी होगा। शिक्षक सीधे ट्रिब्यूनल में आवेदन कर सकेंगे, इसके लिए कोई कोर्ट फीस भी नहीं लगेगी। यदि संस्थान फैसले का पालन नहीं करेगा तो ट्रिब्यूनल के पास संस्थान की मान्यता रद्द करने और जुर्माना लगाने तक का अधिकार होगा।
इस फैसले के बाद पूरे प्रदेश में शिक्षक समुदाय में खुशी की लहर है। मध्य प्रदेश निजी शिक्षक संघ के अध्यक्ष हरीश दीक्षित ने कहा, “यह हमारे लिए दिवाली और नए साल का तोहफा है। अब हमें दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा।” भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के शिक्षकों ने सोशल मीडिया पर कोर्ट को सलाम करते हुए पोस्ट किए हैं। दूसरी ओर, कुछ बड़े निजी स्कूल संचालकों ने इसे ‘अनावश्यक हस्तक्षेप’ बताया है, लेकिन ज्यादातर लोग इसे शिक्षक हित में क्रांतिकारी कदम मान रहे हैं।
अब सभी की नजरें सरकार पर टिकी हैं कि वह चार सप्ताह की समय सीमा में क्या कदम उठाती है। शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा है कि विभाग इस दिशा में गंभीरता से काम कर रहा है और जल्द ही अधिसूचना जारी की जाएगी। यदि यह व्यवस्था लागू हो गई तो मध्य प्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य बन जाएगा जहाँ हर जिले में शिक्षकों के लिए अलग से न्यायिक मंच होगा। यह कदम न केवल शिक्षकों को न्याय देगा बल्कि निजी संस्थानों में मनमानी पर भी अंकुश लगाएगा।
