By: Ravindra Singh
Ahoi Ashtami : हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का पर्व संतान के प्रति मां के प्रेम, त्याग और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता की पूजा करने और व्रत कथा सुनने से संतान के जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार दिवाली से कुछ दिन पहले आता है। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं शाम को अहोई माता की पूजा करती हैं और तारों को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करती हैं। वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी का पर्व 1 नवंबर, रविवार को मनाया जा रहा है। आइए जानते हैं इस पर्व की पौराणिक कथा, पूजा करने की विधि और व्रत खोलने की परंपरा के बारे में।
अहोई अष्टमी व्रत कथा: जानें स्याहू माता की पौराणिक कहानी
Ahoi Ashtami प्राचीन कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे और सात बहुएं थीं। दिवाली से पहले कार्तिक मास की अष्टमी तिथि पर उसकी सातों बहुएं अपनी ननद के साथ जंगल में मिट्टी खोदने गईं। वहां एक स्याहू नामक जीव की मांद थी। मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ से अनजाने में स्याहू का एक बच्चा मर गया। इससे नाराज होकर स्याहू माता ने उसकी कोख बांधने का श्राप दे दिया।
ननद की परेशानी देखकर उसकी सभी भाभियों से अपनी कोख बंधवाने का आग्रह किया गया, लेकिन किसी ने इसके लिए हामी नहीं भरी। अंत में सबसे छोटी बहू ने अपनी ननद के स्थान पर स्वयं यह दंड स्वीकार कर लिया। इसके बाद उसके जो भी बच्चे पैदा होते, वे सात दिन के भीतर मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे।
सुरही गाय की सेवा से मिली रास्ता दिखाने वाली मदद
Ahoi Ashtami लगातार संतान की मृत्यु से दुखी छोटी बहू ने एक पंडित से इसका कारण पूछा। पंडित ने उसे सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी। मान्यता थी कि सुरही गाय स्याहू माता की सहेली थी और उसकी मदद से छोटी बहू की समस्या का समाधान हो सकता था।
छोटी बहू नियमित रूप से सुबह उठकर सुरही गाय के आसपास साफ-सफाई करने लगी। एक दिन गाय ने उसे ऐसा करते देख लिया और उसकी सेवा का कारण पूछा। छोटी बहू ने अपनी पूरी व्यथा सुनाई। उसकी बात सुनकर सुरही गाय ने उसकी सहायता करने का वचन दिया और उसे अपने साथ स्याहू माता के पास ले जाने लगी।
गरुड़ पक्षी के बच्चे को बचाने पर प्रसन्न हुई स्याहू माता
Ahoi Ashtami रास्ते में दोनों एक पेड़ के नीचे आराम करने के लिए रुकीं। वहां एक सांप गरुड़ पक्षी के बच्चे पर हमला करने वाला था। छोटी बहू ने साहस दिखाते हुए सांप को मार दिया और पक्षी के बच्चे की जान बचा ली।
जब गरुड़ पक्षी वापस आया, तो पहले उसे गलतफहमी हुई, लेकिन छोटी बहू की बात सुनकर उसे सच्चाई का पता चल गया। प्रसन्न होकर उसने दोनों को स्याहू माता तक पहुंचाने में सहायता की।
स्याहू माता के पास पहुंचकर छोटी बहू ने उनकी सेवा की और उनके सिर से जुएं निकालकर उन्हें राहत दी। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर स्याहू माता ने उसे सात पुत्रों और सात बहुओं का आशीर्वाद दिया। तब छोटी बहू ने बताया कि उसकी कोख तो स्याहू माता ने ही बांध रखी है। यह सुनकर स्याहू माता को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने उसकी कोख खोलने का वचन पूरा किया।
घर लौटने पर छोटी बहू ने अपने परिवार को खुशहाल पाया। उसने अहोई माता की पूजा की और अपनी मनोकामना पूरी होने पर धार्मिक परंपरा के अनुसार अनुष्ठान किया। तभी से अहोई अष्टमी पर संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए व्रत रखने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।
अहोई अष्टमी पूजा विधि: इस तरह करें माता की आराधना
Ahoi Ashtami अहोई अष्टमी के दिन पूजा-पाठ और व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन महिलाएं श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर अहोई माता से अपनी संतान की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं।
सुबह व्रत का संकल्प लें
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- अहोई माता का स्मरण करते हुए संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत का संकल्प लें।
- अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार दिनभर व्रत रखें। कुछ महिलाएं निर्जला व्रत भी करती हैं।
शाम को अहोई माता की पूजा करें
- पूजा स्थल को साफ करके वहां अहोई माता की तस्वीर स्थापित करें या परंपरा के अनुसार दीवार पर उनका चित्र बनाएं।
- पूजा के लिए रोली, अक्षत, फूल, दीपक, जल से भरा करवा या कलश और प्रसाद तैयार रखें।
- अहोई माता को तिलक लगाएं, फूल चढ़ाएं और सात्विक मिठाई का भोग लगाएं।
- श्रद्धापूर्वक अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
- पूजा के अंत में माता की आरती करें और संतान की सुख-समृद्धि की कामना करें।
- परिवार की परंपरा के अनुसार सास या घर की किसी वरिष्ठ महिला को बायना देकर उनका आशीर्वाद लें।
अहोई अष्टमी व्रत का पारण कैसे करें?
Ahoi Ashtami अहोई अष्टमी पर तारों को देखने और उन्हें अर्घ्य देने की परंपरा प्रचलित है। शाम को तारे दिखाई देने के बाद महिलाएं जल अर्पित करती हैं और अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं।
तारों को अर्घ्य देने के बाद अहोई माता का स्मरण किया जाता है। इसके पश्चात पूजा का प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोला जाता है। कुछ परिवारों में व्रत खोलने की विधि अलग भी हो सकती है, इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन करना उचित माना जाता है।
व्रत के दौरान अपनी सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी है। यदि किसी महिला को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी है, गर्भावस्था है या चिकित्सकीय कारणों से उपवास करना उचित नहीं है, तो व्रत की कठिन विधि अपनाने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
अहोई अष्टमी का धार्मिक महत्व
Ahoi Ashtami अहोई अष्टमी केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि मां और संतान के बीच प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक भी है। इस दिन माताएं अपनी संतान के सुखद भविष्य के लिए प्रार्थना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता की पूजा, व्रत कथा का श्रवण और तारों को अर्घ्य देने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।
इस पर्व के माध्यम से परिवार में धार्मिक आस्था, परंपराओं और आपसी स्नेह को भी बढ़ावा मिलता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी का त्योहार मातृत्व की भावना को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है।
नोट: अहोई अष्टमी की पूजा और पारण के समय स्थानीय पंचांग तथा अपने क्षेत्र की परंपरा के अनुसार पुष्टि कर लें।
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