By: Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित विश्वविख्यात महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में एक दुर्लभ आध्यात्मिक घटना हुई, जब गुजरात के सोमनाथ मंदिर के प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों से निर्मित दो पवित्र शिवलिंग यहां पहुंचे। यह आयोजन न केवल दो प्रमुख ज्योतिर्लिंगों के बीच दिव्य मिलन का प्रतीक बना, बल्कि हजार वर्ष पुरानी ऐतिहासिक घटनाओं को भी याद दिलाता है। आर्ट ऑफ लिविंग संस्था द्वारा आयोजित इस यात्रा के तहत ये शिवलिंग बेंगलुरु से उज्जैन लाए गए और महाकालेश्वर की भोग आरती में शामिल किए गए। इसके बाद गर्भगृह में विशेष पूजन हुआ और श्रद्धालुओं के लिए जूना अखाड़ा परिसर में दर्शन की व्यवस्था की गई।
यह शिवलिंग सोमनाथ के मूल ज्योतिर्लिंग के उन अवशेषों से बने हैं, जो सदियों से संरक्षित रखे गए थे। धार्मिक कथाओं के अनुसार, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम है और इसका निर्माण सतयुग में चंद्रदेव ने करवाया था। लेकिन 11वीं शताब्दी में आक्रमणकारी महमूद गजनवी ने 1026 ईस्वी में मंदिर पर हमला कर शिवलिंग को खंडित कर दिया। उस समय अग्निहोत्री ब्राह्मणों ने टूटे हुए हिस्सों को सुरक्षित बचाया और उन्हें दक्षिण भारत ले जाकर 11 छोटे ‘बाण लिंग’ के रूप में स्थापित किया। पीढ़ी दर पीढ़ी इनकी गुप्त पूजा होती रही।
लगभग 100 वर्ष पहले, 1924 में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य के निर्देश पर इन अवशेषों को संरक्षित रखने का आदेश दिया गया। वर्ष 2025 में वर्तमान संरक्षक पंडित सीताराम शास्त्री ने कांची शंकराचार्य से मार्गदर्शन लिया, जिन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक गुरुदेव श्री श्री रविशंकर को सौंपने की सलाह दी। जनवरी 2025 में ये अवशेष श्री श्री रविशंकर को सौंपे गए। संस्था ने इनकी शुद्धिकरण प्रक्रिया पूरी कर देशभर में दर्शन के लिए यात्रा शुरू की है। अंतिम लक्ष्य सोमनाथ मंदिर में इनकी पुनः प्रतिष्ठा करना है, ताकि हजार वर्ष बाद मूल ज्योतिर्लिंग की महिमा फिर से स्थापित हो सके।
मध्य प्रदेश में इस यात्रा की शुरुआत उज्जैन के महाकालेश्वर से हुई, जो स्वयं बारह ज्योतिर्लिंगों में तीसरा है। यहां भोग आरती के दौरान इन शिवलिंगों को विशेष रूप से लाया गया। आर्ट ऑफ लिविंग के निर्देशक दर्शक हाथी और मध्य प्रदेश प्रभारी मनीष सोनी ने बताया कि यह यात्रा भक्तों को प्राचीन धरोहर से जोड़ने का माध्यम है। महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति की ओर से महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरी और सहायक प्रशासक आशीष फलवाडिया ने यात्रा दल का स्वागत किया। श्रद्धालुओं में उत्साह का माहौल रहा, क्योंकि दो ज्योतिर्लिंगों का यह मिलन दुर्लभ संयोग है।
यह घटना भारतीय संस्कृति की अजेयता को दर्शाती है। सदियों के आक्रमणों के बावजूद सनातन परंपराएं जीवित रहीं। महमूद गजनवी के हमले के समय हजारों भक्तों ने मंदिर की रक्षा में प्राण त्याग दिए थे, लेकिन आस्था नहीं डिगी। आज ये अवशेष देश के प्रमुख तीर्थों में भ्रमण कर रहे हैं, जिससे लाखों लोग इनके दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। श्री श्री रविशंकर ने इसे सनातन धर्म की शाश्वतता का प्रतीक बताया है।
उज्जैन जैसे पवित्र शहर में इस आयोजन ने श्रद्धालुओं को गहराई से प्रभावित किया। महाकालेश्वर की भस्म आरती और सोमनाथ अवशेषों का दर्शन एक साथ होना भक्तों के लिए अविस्मरणीय अनुभव रहा। आने वाले दिनों में ये शिवलिंग मध्य प्रदेश के अन्य शहरों में भी जाएंगे। यह यात्रा न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक एकता का भी संदेश दे रही है। ऐसे आयोजन युवा पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुल मिलाकर, यह घटना आस्था की विजय और इतिहास की निरंतरता का जीवंत उदाहरण है।
