By: Ravindra Sikarwar
सुकमा: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले में एक प्रेरणादायक बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां कभी हिंसा और संघर्ष का माहौल था, वहां अब विकास और आत्मनिर्भरता की नई शुरुआत हो रही है। राज्य के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की दूरदर्शी पुनर्वास नीति के तहत, पुनर्वास केंद्र में रह रहे 35 आत्मसमर्पित पूर्व नक्सलियों को राजमिस्त्री (मेसन) के रूप में व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस पहल से न केवल इन युवाओं का जीवन बदल रहा है, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति और विश्वास की बुनियाद मजबूत हो रही है।
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम जिला प्रशासन और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्था (एसबीआई आरसेटी) के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसमें 15 महिलाएं और 20 पुरुष शामिल हैं, जो भवन निर्माण की बारीकियों को सीख रहे हैं। प्रशिक्षण में नींव डालना, ईंट जोड़ाई, प्लास्टरिंग, छत की ढलाई और गुणवत्ता नियंत्रण जैसे सभी जरूरी कौशल सिखाए जा रहे हैं। इसका मकसद इन लोगों को इतना कुशल बनाना है कि वे स्वतंत्र रूप से निर्माण कार्य कर सकें और सम्मानजनक रोजगार प्राप्त करें।

छत्तीसगढ़ सरकार की नीति संवाद, संवेदना और विकास पर आधारित है। नक्सल प्रभावित इलाकों में स्थायी शांति लाने के लिए आत्मसमर्पित लोगों को कौशल प्रदान करना और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करना प्रमुख लक्ष्य है। यह कार्यक्रम सिर्फ ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है; पूरा होने के बाद ये प्रशिक्षित युवा प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के अंतर्गत जिले में चल रहे आवास निर्माण कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान देंगे। इससे दुर्गम क्षेत्रों में कुशल कारीगरों की लंबे समय से चली आ रही कमी दूर होगी और इन युवाओं को स्थिर आय का स्रोत मिलेगा।
प्रशिक्षण ले रहे कुछ पूर्व नक्सलियों ने अपनी कहानियां साझा की हैं, जो इस पहल की सफलता को रेखांकित करती हैं। पोलीमपल्ली के रहने वाले पोडियम भीमा ने बताया कि वे करीब 30 साल तक नक्सली संगठन से जुड़े रहे। आत्मसमर्पण के बाद उनका पूरा जीवन बदल गया। अब उन्हें अच्छा रहन-सहन, भोजन और विभिन्न प्रशिक्षण मिल रहे हैं, जिसमें राजमिस्त्री का कोर्स भी शामिल है। पहले उन्होंने इलेक्ट्रीशियन और मैकेनिक का प्रशिक्षण लिया था। वे कहते हैं कि अब वे सम्मानजनक जीवन जी सकेंगे।
इसी तरह, पुवर्ती की मुचाकी स्नवती (या रनवती) ने 24 साल संगठन में बिताए। पुनर्वास के बाद उन्हें सिलाई सिखाई गई और अब राजमिस्त्री प्रशिक्षण मिल रहा है। वे परिवार से मिलने, बस्तर ओलंपिक में भाग लेने और पुरस्कार जीतने की खुशी जाहिर करती हैं। डब्बमरका की गंगा वेट्टी का कहना है कि उनका जीवन पूरी तरह बदल चुका है। प्रशासन ने उन्हें मोबाइल फोन और राजमिस्त्री किट दी है, साथ ही आधार, आयुष्मान, राशन और जॉब कार्ड जैसे दस्तावेज बनवाए हैं। कोई समस्या होने पर कलेक्टर और एसपी तुरंत मदद करते हैं।
जिला कलेक्टर देवेश ध्रुव ने इस प्रयास को सामाजिक परिवर्तन का बड़ा कदम बताया। उनके अनुसार, आत्मसमर्पण का असली मतलब हथियार छोड़ना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर होकर समाज में गरिमा के साथ लौटना है। प्रशासन का लक्ष्य है कि पुनर्वास केंद्र के सभी युवाओं को कौशल, रोजगार और बुनियादी सुविधाएं मिलें। जिला पंचायत के सीईओ मुकुंद ठाकुर ने कहा कि सरकारी निर्माण कार्यों, खासकर पीएम आवास योजना के लिए कुशल श्रमिकों की जरूरत है। यह ट्रेनिंग न केवल रोजगार देगी, बल्कि इन युवाओं को सामाजिक जिम्मेदारी से भी जोड़ेगी।
यह पहल छत्तीसगढ़ की पुनर्वास नीति को एक मिसाल बना रही है। हाल के दिनों में कई आत्मसमर्पण हुए हैं और ऐसे कार्यक्रमों से नक्सलवाद पर लगाम लगाने में मदद मिल रही है। क्षेत्र में शांति स्थापित होने से विकास कार्य तेज होंगे और स्थानीय लोग सुरक्षित जीवन जी सकेंगे। कुल मिलाकर, यह प्रयास साबित करता है कि सही दिशा और अवसर से भटके हुए लोग भी समाज के उपयोगी सदस्य बन सकते हैं।
