By: Ravindra Sikarwar
उत्तराखंड सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य में मौजूदा मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है, और इसके स्थान पर एक नई व्यवस्था लागू की जाएगी। यह बदलाव 1 जुलाई 2026 से प्रभावी होगा, जब उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन पूरा हो जाएगा। इस नए प्राधिकरण के तहत न केवल मदरसे, बल्कि मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदायों से संबद्ध सभी शैक्षणिक संस्थान एक समान नियमों के अधीन आएंगे।
इस निर्णय का मुख्य लक्ष्य राज्य की शिक्षा प्रणाली को अधिक समावेशी, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण बनाना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे एक ऐतिहासिक कदम बताया है, जो सभी बच्चों को समान अवसर प्रदान करेगा। उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है जहां मदरसा बोर्ड को पूरी तरह भंग कर अल्पसंख्यक संस्थानों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा रहा है। नए कानून के अनुसार, सभी अल्पसंख्यक स्कूलों को उत्तराखंड विद्यालय शिक्षा परिषद (राज्य बोर्ड) से संबद्धता प्राप्त करनी होगी और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) तथा राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे (एनसीएफ) का पालन करना अनिवार्य होगा।
इस बदलाव की पृष्ठभूमि में कई वर्षों से चली आ रही चुनौतियां हैं। राज्य के ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में कई अल्पसंख्यक संस्थानों में पढ़ाई का स्तर मुख्यधारा के स्कूलों से अलग रहा है। इससे छात्रों को उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं या सरकारी नौकरियों में समान अवसर नहीं मिल पाते थे। इसके अलावा, मदरसा प्रणाली में केंद्रीय छात्रवृत्ति वितरण, मिड-डे मील योजना और प्रबंधन में अनियमितताओं की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था से इन समस्याओं का समाधान होगा और शिक्षा में एकरूपता आएगी।
नए प्राधिकरण की जिम्मेदारी संस्थानों को मान्यता प्रदान करना, शिक्षा की गुणवत्ता की निगरानी करना और छात्रों की परीक्षा प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना होगा। धार्मिक शिक्षा पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा, लेकिन विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण जैसे विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करना जरूरी होगा। इससे छात्र मुख्यधारा से जुड़कर बेहतर करियर विकल्प चुन सकेंगे।
अल्पसंख्यक समुदायों के कुछ शिक्षकों और प्रतिनिधियों ने इस बदलाव का स्वागत किया है। एक शिक्षक ने कहा कि पहले अलग बोर्ड और पाठ्यक्रम के कारण छात्रों को आगे बढ़ने में बाधाएं आती थीं, लेकिन अब यह नई प्रणाली उन्हें मुख्यधारा से जोड़ेगी और अवसर बढ़ाएगी। हालांकि, कुछ संगठनों ने इसे अल्पसंख्यक अधिकारों पर प्रभाव डालने वाला कदम बताया है, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह सुधार शिक्षा की गुणवत्ता और समानता के लिए है।
यह बदलाव उत्तराखंड को शिक्षा के क्षेत्र में अन्य राज्यों के लिए एक मिसाल बना सकता है। राज्य पहले से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे सुधारों के लिए जाना जाता है। अब अल्पसंख्यक शिक्षा में यह एकीकृत दृष्टिकोण छात्रों के भविष्य को मजबूत बनाएगा और समाज में समरसता को बढ़ावा देगा। कुल मिलाकर, यह कदम शिक्षा को अधिक आधुनिक, समावेशी और अवसरपूर्ण बनाने की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है।
