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By: Ravindra Sikarwar

ग्वालियर में आयोजित विश्वप्रसिद्ध तानसेन संगीत समारोह के दूसरे दिन की सायंकालीन सभा शास्त्रीय संगीत के विविध रंगों से सराबोर रही। इस ऐतिहासिक मंच पर जब सरोद सम्राट पद्म विभूषण उस्ताद अमजद अली खां अपने सुपुत्रों अमान अली और अयान अली के साथ उपस्थित हुए, तो श्रोताओं के लिए यह क्षण अविस्मरणीय बन गया। सुरों की गंभीरता, परंपरा की गरिमा और भावनाओं की गहराई ने मिलकर ग्वालियर की शाम को संगीत की साधना में डुबो दिया।

सायंकालीन सभा की शुरुआत ध्रुपद की शुद्ध और गंभीर परंपरा से हुई। ध्रुपद केंद्र, ग्वालियर के विद्यार्थियों ने राग पूरिया धनाश्री की प्रस्तुति देकर मंच को पवित्र संगीत वातावरण से भर दिया। विद्यार्थियों ने आलाप, मध्यलय और द्रुत लय में बंदिश “ऐसी छवि तोड़ी समझत नाही” को सधे हुए अंदाज में प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति में डागरवाणी परंपरा की स्पष्ट झलक दिखाई दी। बंदिश की रचना गुरु अभिजीत सुखदाने द्वारा की गई थी, जिसे विद्यार्थियों ने अनुशासन और भाव के साथ निभाया। पखावज पर जगत नारायण शर्मा की संगत ने इस ध्रुपद प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया।

इसके बाद मंच पर युवा सरोद वादक अमान अली और अयान अली ने अपनी जुगलबंदी से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने पूर्वी ठाट के गंभीर और आध्यात्मिक राग श्री को चुना, जो संध्या काल के वातावरण के अनुकूल माना जाता है। विस्तृत और संयमित आलाप के माध्यम से उन्होंने राग की भावभूमि को साकार किया। इसके पश्चात झपताल में विलंबित गत और तीनताल में झाला की प्रस्तुति ने उनकी तकनीकी दक्षता, लयबोध और आपसी सामंजस्य को उजागर किया। उनकी जुगलबंदी में परंपरा की गहराई के साथ आधुनिक संवेदना का सुंदर संतुलन देखने को मिला, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।

सायंकालीन सभा का सबसे भावुक और प्रतीक्षित क्षण तब आया, जब उस्ताद अमजद अली खां स्वयं मंच पर आए। सरोद पर उनकी पहली ही धुन ने श्रोताओं को शांत और भावविभोर कर दिया। उन्होंने महात्मा गांधी के प्रिय भजन “वैष्णव जन तो तेने कहिए” और “रघुपति राघव राजा राम” की मनोहारी प्रस्तुतियां दीं। इसके बाद जब सरोद पर ‘वंदे मातरम्’ की मधुर और भावनात्मक धुन गूंजी, तो पूरा वातावरण देशभक्ति से ओतप्रोत हो उठा। श्रोताओं की आंखों में भावनाओं की चमक और तालियों की गूंज ने इस प्रस्तुति की सफलता को स्वतः ही प्रमाणित कर दिया।

उस्ताद अमजद अली खां की वादन शैली में स्वर की स्पष्टता, मींड और गमक की कोमलता तथा भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि वे क्यों विश्व के महानतम सरोद वादकों में गिने जाते हैं। तबले पर रामेंद्र सोलंकी की सधी हुई संगत ने सरोद की धुनों को सशक्त आधार प्रदान किया।

इससे पूर्व सुबह की सभा भी शास्त्रीय संगीत की गंभीरता से परिपूर्ण रही। भारतीय संगीत महाविद्यालय, ग्वालियर के विद्यार्थियों ने राग भटियार में चौताल की बंदिश प्रस्तुत की। यह बंदिश संगीत गुरु संजय देवले की रचना थी, जिसे विद्यार्थियों ने पूरी निष्ठा और अनुशासन के साथ प्रस्तुत किया। पखावज पर संजय आफले, हारमोनियम पर वर्षा मित्रा और संगत में अनुव्रत चटर्जी की भूमिका सराहनीय रही।

कुल मिलाकर तानसेन समारोह का यह दिन शास्त्रीय संगीत की विविध विधाओं—ध्रुपद, खयाल और वाद्य संगीत—का जीवंत उदाहरण बना। उस्ताद अमजद अली खां और उनके सुपुत्रों की प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत न केवल परंपरा की धरोहर है, बल्कि भावनाओं, राष्ट्रप्रेम और आध्यात्मिक चेतना का सशक्त माध्यम भी है। ग्वालियर की यह संध्या सुरों की स्मृतियों के रूप में लंबे समय तक संगीत प्रेमियों के मन में जीवित रहेगी।

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