By: Ravindra Sikarwar
भोपाल: झील के किनारे बसे भारत भवन का बहिरंग परिसर रविवार की शाम एक अद्भुत सुर-उत्सव में डूबा नजर आया। हवा में बजती धुनें, झिलमिल हल्की रोशनी और स्वर-विलास की अनुगूंज ने ऐसा वातावरण रचा कि श्रोता मानो किसी स्वप्निल संगीत-लोक में प्रवेश कर गए हों। संस्कृति और पर्यटन विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ‘हृदय दृश्यम संगीत समारोह’ का यह अंतिम दिवस था, जिसने अपने चरम पर संगीत प्रेमियों को अद्भुत और अविस्मरणीय अनुभव प्रदान किया।
कार्यक्रम में उपस्थित कलाकारों का स्वागत भोपाल नगर निगम आयुक्त श्रीमती संस्कृति जैन और उप-संचालक डॉ. पूजा शुक्ला द्वारा किया गया। कार्यक्रम की भव्यता और संगीतमय गूंज ने शहर की सांस्कृतिक धरोहर में एक और स्वर्णिय अध्याय जोड़ दिया।
बांसुरी का माधुर्य और रागों की दिव्यता
समारोह की शुरुआत सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित राकेश चौरसिया की धीर-गंभीर प्रस्तुति से हुई। जैसे ही उनकी बांसुरी से राग भीमपलासी के कोमल स्वर बहने लगे, वातावरण पूरी तरह संगीत-रस में डूब गया।
मध्य लय रूपक में प्रस्तुत उनकी गत और तत्पश्चात द्रुत तीनताल की प्रस्तुति ने श्रोताओं को अनहद नाद की अनुभूति कराई।
इसके बाद राग पहाड़ी की मधुर धुनों ने पूरे वातावरण को शांति, सौंदर्य और विराट आनंद से भर दिया। तबले पर श्री रामेंद्र सिंह सोलंकी का साथ प्रस्तुति का मुख्य आकर्षण रहा। दोनों कलाकारों के बीच हुआ संगीतमय संवाद ऐसा लगा मानो सुर और ताल एक-दूसरे के साथ अंतर्यात्रा पर हों।
ताल की अनंत ऊर्जा और शिव तांडव का स्पंदन
दूसरी प्रस्तुति मंच पर उतरे ग्रैमी पुरस्कार सम्मानित ताल साधक वी. सेल्वगणेश और उनकी टीम ने दी। उनके साथ घटम पर उमाशंकर, कंज़ीरा और कोनक्कल पर स्वामीनाथन तथा मोरसिंग पर ए. गणेशन ने जब अपनी प्रस्तुति आरंभ की, तो सभागार में बैठे हर व्यक्ति के मन में ऊर्जा, श्रद्धा और उत्साह की तरंगें एक साथ उठने लगीं।
शिव तांडव स्तोत्र की लयात्मक प्रस्तुति ने माहौल को धधकते आध्यात्मिक भावों से भर दिया। तालों का यह संगम न केवल संगीत का प्रदर्शन था बल्कि एक साधना, एक आंतरिक यात्रा जैसा प्रतीत हुआ।
फ्यूजन की आधुनिकता और उत्साह की विद्युत लहरें
समारोह की अंतिम प्रस्तुति में मंच पर आया विख्यात ब्रह्म फ्यूजन बैंड। जैसे ही उन्होंने सुरों और रिद्म का आधुनिक, ऊर्जावान संगम प्रस्तुत किया, दर्शक तालियों की गूंज और उत्साह में झूम उठे।
भारतीय शास्त्रीय धुनों और वैश्विक लयों का प्रयोग, इलेक्ट्रॉनिक जुगलबंदी और नए संगीत ढांचों ने प्रस्तुति को एक अनोखा आयाम दिया।
जो अलवारिस और शैफाली की प्रस्तुति ने इस संगीतमय यात्रा में नई चमक जोड़ दी। विशेष रूप से ‘सेवन एंड ए हाफ’ कंपोज़िशन में ताल संरचना और आरोह–अवरोह का जटिल विन्यास श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करता रहा।
अंतिम क्षणों में प्रस्तुत की गई कोनक्कल ने मंच और दर्शकों के बीच की दूरी मिटा दी और पूरा परिसर ताल के समान कंपन से भर उठा।
स्मृतियों में अंकित होगी यह संध्या
तीन दिनों तक चली इस संगीतमय यात्रा में कभी मंद्र सुरों की सौम्यता, तो कभी तालों की उग्र ऊर्जा बहती रही। अंतिम दिवस की यह अनोखी शाम, भारत भवन के सांस्कृतिक इतिहास में लंबे समय तक गूंजती रहेगी—जैसे किसी नदी के जल में सभ्यताओं का प्रतिबिंब चिरस्थायी हो जाता है।
भोपाल के संगीत प्रेमियों ने इस आयोजन को न केवल सुना, बल्कि आत्मा में महसूस किया—और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता साबित हुई।
