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by-Ravindra Sikarwar

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लगातार यह कहा है कि अलग हुए या तलाकशुदा माता-पिता के बच्चों को अपने दोनों माता-पिता का प्यार और स्नेह पाने का मौलिक अधिकार है, क्योंकि यह उनके सर्वांगीण कल्याण और विकास के लिए महत्वपूर्ण है। बच्चों की हिरासत और मुलाक़ात से संबंधित पारिवारिक न्यायालय के निर्णयों में इस अधिकार को एक प्राथमिक विचार के रूप में देखा जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय के रुख के मुख्य बिंदु:

बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है:
न्यायालय इस बात पर जोर देता है कि अलग हुए माता-पिता के बीच किसी भी विवाद में बच्चे का सर्वोत्तम हित और कल्याण ही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यह सिर्फ माता-पिता के अधिकारों का मामला नहीं है, बल्कि बच्चे के भविष्य और खुशी का मामला है। अदालत यह सुनिश्चित करती है कि सभी निर्णय बच्चे के हित में ही लिए जाएं।

दोनों माता-पिता के साथ संबंध का अधिकार:
न्यायालय ने यह पुष्टि की है कि बच्चे को अपने दोनों माता-पिता के साथ संबंध बनाए रखने का अधिकार है, भले ही माता-पिता अलग रह रहे हों या अलग-अलग देशों में हों। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि बच्चा किसी भी एक माता-पिता के प्यार और मार्गदर्शन से वंचित न हो, क्योंकि दोनों ही उसके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मुलाक़ात के अधिकार (Visitation Rights):
परिवार न्यायालयों को इस तरह से मुलाक़ात के अधिकार देने का निर्देश दिया गया है जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि बच्चा किसी भी माता-पिता के प्यार और देखभाल से वंचित न हो। इन अधिकारों का उद्देश्य बच्चे और दूर रह रहे माता-पिता के बीच एक स्वस्थ और मजबूत रिश्ता बनाए रखना है। न्यायालय का मानना है कि केवल भौतिक उपस्थिति ही काफी नहीं है, बल्कि भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक जुड़ाव भी ज़रूरी है।

बच्चे के भविष्य पर ध्यान दें:
सर्वोच्च न्यायालय ने माता-पिता को सलाह दी है कि वे अपने मतभेदों को भुलाकर अपने बच्चे के भविष्य पर ध्यान केंद्रित करें। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया है कि हिरासत को लेकर होने वाली भयानक लड़ाई से बच्चे को मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक रूप से गंभीर नुकसान हो सकता है। ऐसे विवादों में बच्चे को अक्सर दोनों तरफ से खींचतान का शिकार होना पड़ता है, जिससे उसके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

माता-पिता द्वारा अलगाव (Parental Alienation):
न्यायालय ‘पैरेंटल एलियनेशन’ पर भी विचार करता है, जिसमें एक माता-पिता जानबूझकर बच्चे की भावनाओं को दूसरे माता-पिता के खिलाफ भड़काते हैं। इस तरह की हरकतें बच्चे की दूसरे माता-पिता के प्रति धारणा को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती हैं और उसके मनोवैज्ञानिक कल्याण को नुकसान पहुँचा सकती हैं। न्यायालय ऐसे मामलों में बच्चे के हित की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाता है।

यह लेख स्पष्ट करता है कि भारतीय न्यायपालिका बच्चे के अधिकारों को सर्वोपरि मानती है और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि तलाक या अलगाव की स्थिति में भी बच्चे को दोनों माता-पिता का प्यार मिले।

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