by-Ravindra Sikarwar
तेलंगाना के संगारेड्डी जिले के अमीनपुर इलाके में एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया है। 25 वर्षीय एक युवा मां, जो बचपन से ही चींटियों के गहन भय (माइर्मेकोफोबिया) से पीड़ित थी, ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। यह घटना 6 नवंबर 2025 को हुई, जब वह घर पर अकेली थी। पुलिस ने पाया कि उसने एक सुसाइड नोट छोड़ा था, जिसमें अपने पति से माफी मांगते हुए चींटियों के डर का जिक्र किया गया है। यह मामला न केवल मानसिक स्वास्थ्य की जटिलताओं को उजागर करता है, बल्कि दुर्लभ फोबिया के कारणों, लक्षणों और रोकथाम की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है। आइए इस दुखद घटना की पूरी पृष्ठभूमि, परिस्थितियों और इसके व्यापक प्रभावों पर विस्तार से चर्चा करें।
घटना का विवरण: एक सामान्य दिन का दर्दनाक अंत
मृतक महिला का नाम मनीषा था, जो मूल रूप से तेलंगाना के मंचेरियाल शहर की रहने वाली थीं। वह अपने पति श्रीकांत (35 वर्षीय) और तीन वर्षीय बेटी अन्विका के साथ हैदराबाद के बाहरी इलाके में नव्या होम्स कॉलोनी, अमीनपुर में रहती थीं। श्रीकांत एक निजी कंपनी में कर्मचारी हैं, जबकि मनीषा गृहिणी थीं। दंपति का विवाह 2022 में हुआ था, और उनकी जिंदगी सामान्य रूप से चल रही थी, लेकिन मनीषा का चींटियों का डर हमेशा एक छाया की तरह उनके जीवन पर मंडराता रहता था।
6 नवंबर की सुबह, मनीषा ने अपनी बेटी को रिश्तेदारों के घर छोड़ दिया और कहा कि वह घर की सफाई के बाद उन्हें ले आएंगी। वह घर लौटीं और सफाई शुरू की। पुलिस के अनुसार, सफाई के दौरान उन्हें चींटियां दिखाई दीं, जिससे उनका पुराना डर भड़क उठा। अकेलेपन में घबरा गईं मनीषा ने कथित तौर पर एक साड़ी से छत के पंखे से फंदा लगाकर अपनी जान दे दी। शाम को जब श्रीकांत काम से लौटे, तो घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद मिला। पड़ोसियों की मदद से दरवाजा तोड़कर अंदर घुसे, तो उन्हें मनीषा का शव लटका हुआ मिला।
पुलिस ने तुरंत मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की। अमीनपुर पुलिस स्टेशन में आत्महत्या का मामला दर्ज किया गया है, और पोस्टमॉर्टम के बाद शव परिवार को सौंप दिया गया। प्रारंभिक जांच में कोई संदिग्ध परिस्थिति नहीं पाई गई, लेकिन परिवार और रिश्तेदारों से पूछताछ जारी है।
सुसाइड नोट: डर और पछतावे की आखिरी पुकार
घटना स्थल से एक भावुक सुसाइड नोट बरामद हुआ, जो मनीषा ने अपने पति के नाम लिखा था। नोट में लिखा था: “श्री, मुझे माफ कर दो। मैं इन चींटियों के साथ और नहीं जी सकती। अन्विका का ख्याल रखना। सावधान रहना। अन्नावरम, तिरुपति – 1,116 रुपये… येल्लम्मा वाड़ी बिय्याम (चावल भेंट) मत भूलना।”
इस नोट से स्पष्ट है कि मनीषा न केवल अपने डर से त्रस्त थीं, बल्कि परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी याद रख रही थीं। उन्होंने धार्मिक स्थलों पर चढ़ाने वाले धन और भेंट का जिक्र किया, जो उनकी आस्था और पछतावे को दर्शाता है। पुलिस का मानना है कि सफाई के दौरान चींटियों का सामना होना ट्रिगर पॉइंट बना, जिसने उनके लंबे समय से चले आ रहे मानसिक तनाव को चरम पर पहुंचा दिया।
माइर्मेकोफोबिया: चींटियों का डर जो जिंदगी बर्बाद कर दे
मनीषा का मामला माइर्मेकोफोबिया (myrmecophobia) का एक चरम उदाहरण है, जो चींटियों के प्रति अतार्किक और तीव्र भय है। यह एक विशिष्ट फोबिया है, जो लगभग 5-10% आबादी को प्रभावित करता है, लेकिन गंभीर मामलों में यह दैनिक जीवन को नष्ट कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह डर बचपन में किसी दर्दनाक घटना (जैसे चींटी काटना), बार-बार की चेतावनियों या चींटियों की समूह में चलने वाली अप्रत्याशित प्रकृति से उत्पन्न हो सकता है।
- लक्षण:
- चींटी देखते ही दिल की धड़कन तेज होना, पसीना आना, सांस फूलना या घबराहट।
- बाहरी गतिविधियों से परहेज – जैसे पार्क जाना, पिकनिक या बागवानी।
- अतिरिक्त सफाई या कीटनाशक का अत्यधिक उपयोग, जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है।
- गंभीर मामलों में सामाजिक अलगाव, अवसाद और आत्महत्या के विचार।
मनीषा का डर बचपन से था। परिवार के अनुसार, मंचेरियाल में रहते हुए वे चींटियां देखकर हृदय गति बढ़ने (पैल्पिटेशन) की शिकायत करती रहीं। उन्होंने स्थानीय अस्पताल में काउंसलिंग ली थी, लेकिन पूर्ण इलाज नहीं करा पाईं। एक मनोचिकित्सक डॉ. प्रिया शर्मा के अनुसार, “ऐसे फोबिया को कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) और एक्सपोजर थेरेपी से ठीक किया जा सकता है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कई लोग चुप रह जाते हैं।”
परिवार का दर्द: एक अचानक खोया सहारा
श्रीकांत और अन्विका के लिए यह सदमा असहनीय है। श्रीकांत ने बताया कि मनीषा खुशमिजाज थीं, लेकिन कभी-कभी चुपचाप उदास हो जाती थीं। “वह बेटी के लिए सब कुछ करती थीं, लेकिन अपना दर्द छिपाती रहीं। अब अन्विका का भविष्य कैसे संभालूं?” उन्होंने पुलिस को बताया। परिवार ने बताया कि मनीषा ने कभी गंभीरता से डर का जिक्र नहीं किया, शायद शर्म या बोझ न बनने की वजह से। पड़ोसी भी स्तब्ध हैं, क्योंकि बाहर से सब सामान्य लगता था।
जांच और पुलिस की भूमिका:
अमीनपुर पुलिस ने आईपीसी की धारा 174 (अनियंत्रित मौत की जांच) के तहत मामला दर्ज किया है। जांच अधिकारी ने कहा, “हम काउंसलरों और रिश्तेदारों से बात कर रहे हैं। कोई बाहरी दबाव नहीं मिला है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य पहलू पर फोकस है।” पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में फंदे से दम घुटना कारण बताया गया। पुलिस ने परिवार को मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन नंबर दिए हैं।
व्यापक संदेश: मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता की जरूरत
यह घटना भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट की गहराई को दर्शाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, फोबिया और चिंता विकारों से 264 मिलियन लोग प्रभावित हैं, लेकिन सिर्फ 20% ही इलाज लेते हैं। तेलंगाना में आत्महत्या की दर 2024 में 12.5 प्रति लाख थी, जिसमें महिलाओं का हिस्सा 40% है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं:
- जल्दी पहचान: परिवार को लक्षणों पर नजर रखनी चाहिए।
- उपचार: CBT, दवाएं या सपोर्ट ग्रुप्स प्रभावी हैं।
- हेल्पलाइन: रोशिनी (8142020033/44) या तेलंगाना हेल्थ हेल्पलाइन (104) पर संपर्क करें।
मनीषा की मौत एक चेतावनी है कि छोटे-छोटे डर भी जिंदगियां तबाह कर सकते हैं। समाज को अब मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी।
एक जिंदगी का अंत, लेकिन सबक की शुरुआत:
मनीषा की कहानी दुखद है, लेकिन यह हमें याद दिलाती है कि अदृश्य पीड़ा कितनी घातक हो सकती है। उनके परिवार को सांत्वना दें, और समाज से अपील है कि किसी को अकेला न छोड़ें। यदि आप या कोई जानने वाला ऐसा महसूस कर रहा है, तो तुरंत मदद लें। यह घटना न केवल एक परिवार का नुकसान है, बल्कि पूरे समाज के लिए जागृति का आह्वान है।
