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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसके तहत ‘ORS’ (ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन) शब्द का उपयोग करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला सार्वजनिक स्वास्थ्य हित में लिया गया है और इस तरह की भ्रामक ब्रांडिंग आम उपभोक्ताओं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

जस्टिस सचिन दत्ता की एकलपीठ ने 31 अक्टूबर 2025 को सुनाए अपने निर्णय में डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेटरीज की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि “व्यावसायिक हितों से पहले नागरिकों का स्वास्थ्य आता है।” हालांकि, अदालत ने मौजूदा स्टॉक पर री-स्टिकरिंग (लेबल बदलने) की अनुमति दी है, लेकिन ‘ORS’ नाम से बिक्री करने पर रोक बरकरार रखी है।

ORS क्या है? – चिकित्सकीय बनाम व्यावसायिक अंतर
चिकित्सकीय ORS (WHO मानक के अनुसार):

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित सटीक नमक और ग्लूकोज़ का घोल, जो डायरिया या उल्टी से होने वाले डिहाइड्रेशन के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है।

व्यावसायिक पेय उत्पाद:
कई कंपनियां ‘ORS’ नाम से ऐसे फ्रूट-आधारित या इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक्स बेच रही थीं जिनमें शर्करा की मात्रा अधिक थी। ये पेय वास्तव में शरीर में ऑस्मोटिक असंतुलन पैदा कर सकते हैं और डिहाइड्रेशन बढ़ाने का कारण बन सकते हैं।

FSSAI का मत:
केवल डिस्क्लेमर लगाने से समस्या हल नहीं होती क्योंकि अधिकतर उपभोक्ता लेबल को ठीक से पढ़ते नहीं। ऐसे में जब बोतल पर ‘ORS’ प्रमुखता से लिखा होता है, तो लोग इसे चिकित्सकीय उत्पाद समझ लेते हैं।

FSSAI की कार्रवाई की समयरेखा:

तारीखघटना / कार्रवाई
14 अक्टूबर 2025FSSAI ने ‘ORS’ नाम या ब्रांडिंग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया, जब तक WHO फॉर्मूला न अपनाया जाए।
15 अक्टूबर 2025लेबलिंग नियमों के उल्लंघन के आधार पर नोटिस जारी किया गया।
30 अक्टूबर 2025JNTL (जॉनसन एंड जॉनसन की सब्सिडियरी) की अपील पर FSSAI ने विस्तृत आदेश जारी किया — जिसमें बताया गया कि इन उत्पादों से बच्चों, मधुमेह रोगियों और बुजुर्गों को नुकसान पहुंच सकता है।
31 अक्टूबर 2025दिल्ली हाईकोर्ट ने FSSAI के इस प्रतिबंध को वैध और उचित ठहराया।

कानूनी आधार:
यह कार्रवाई फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 की धारा 23 और 24, लेबलिंग रेगुलेशंस 2020 तथा एडवरटाइजिंग एंड क्लेम्स रेगुलेशंस 2018 के अंतर्गत की गई।

प्रभावित कंपनियां और उनके उत्पाद:

कंपनीउत्पाद का नामस्थितिकार्रवाई
डॉ. रेड्डीज़ लेबोरेटरीजRebalanz VITORSबिक्री पर रोकअब इसे ‘Vitenergy’ नाम से री-ब्रांड किया जाएगा
JNTL (J&J सब्सिडियरी)ORS-L Electral₹180 करोड़ का स्टॉक फंसाFSSAI के समक्ष अपील लंबित

कोर्ट में हुई बहस और निर्णय:

डॉ. रेड्डीज़ की दलील:
कंपनी ने अदालत से निवेदन किया कि उन्हें मौजूदा स्टॉक बेचने की अनुमति दी जाए क्योंकि उत्पादन पहले ही हो चुका है।

FSSAI का जवाब:
संस्था ने कहा कि भ्रामक लेबलिंग को जारी रखने से स्वास्थ्य पर खतरा बना रहेगा। साथ ही उन्होंने JNTL के खिलाफ 30 अक्टूबर को दिए गए आदेश का उल्लेख किया, जिसमें बच्चों में गलत उपयोग से स्वास्थ्य हानि की बात कही गई थी।

कोर्ट का फैसला:

अनुमति दी गईप्रतिबंध जारी रखा गया
मौजूदा स्टॉक पर री-स्टिकरिंग (नाम बदलकर) बिक्री की प्रक्रिया शुरू करने की छूटनई उत्पादन या बिक्री ‘ORS’ नाम से सख्त मना
FSSAI को निर्देश दिया गया कि वह डॉ. रेड्डीज़ की अपील पर जल्द निर्णय लेडिस्ट्रीब्यूटर्स को चेतावनी दी गई कि किसी भी स्थिति में प्रतिबंधित उत्पाद की बिक्री न करें

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां:

  • “हम सार्वजनिक स्वास्थ्य से समझौता नहीं कर सकते; नागरिकों का स्वास्थ्य सर्वोच्च है।” – जस्टिस सचिन दत्ता
  • “डिस्क्लेमर पर्याप्त नहीं हैं, उपभोक्ता लेबल नहीं पढ़ते।”
  • “उच्च शर्करा वाले उत्पाद डिहाइड्रेशन को बढ़ा सकते हैं, जो बच्चों और मधुमेह रोगियों के लिए खतरनाक है।”

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय:

  • डॉक्टरों का मत: “गलत ORS फॉर्मूले से मरीजों की स्थिति और खराब हो सकती है, खासकर बच्चों में।”
  • FSSAI के अधिकारी: “हमें शिकायतें मिली थीं कि बच्चे चिकित्सकीय ORS की बजाय ये शर्करा युक्त पेय पी रहे थे, जिससे उनकी तबीयत बिगड़ी।”

संभावित प्रभाव और आगे की राह:

  • उपभोक्ता सुरक्षा: अब बाजार में भ्रामक हेल्थ क्लेम्स और गलत लेबलिंग पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी।
  • कंपनियों पर असर: री-लेबलिंग, री-ब्रांडिंग और फॉर्मूला परिवर्तन से उत्पादन लागत बढ़ेगी।
  • उद्योग पर प्रभाव: यह फैसला इलेक्ट्रोलाइट और एनर्जी ड्रिंक बाजार जैसे Glucon-D, Enerzal आदि पर भी अप्रत्यक्ष दबाव डालेगा।
  • अगले कदम: FSSAI डॉ. रेड्डीज़ के री-स्टिकर प्रस्ताव पर निर्णय लेगा और कोर्ट जल्द विस्तृत आदेश जारी करेगा।

न्यायाधीश का अंतिम कथन:
“व्यावसायिक लाभ किसी भी स्थिति में सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं हो सकता। नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है।” – जस्टिस सचिन दत्ता

यह फैसला भारत में फूड और बेवरेज उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। इससे लेबलिंग और हेल्थ क्लेम्स को लेकर सख्ती बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को सही जानकारी उपलब्ध कराना कंपनियों की जिम्मेदारी बन जाएगी।

दिल्ली हाईकोर्ट का यह निर्णय न सिर्फ FSSAI के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि भारत को एक “हेल्थ सेफ्टी इंडिया” की दिशा में आगे बढ़ाता है — जहां उपभोक्ता का विश्वास और स्वास्थ्य दोनों सर्वोच्च प्राथमिकता में होंगे।

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