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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने 2020 के उत्तर-पूर्व दिल्ली दंगों से जुड़े ‘बड़े साजिश’ मामले में पूर्व जेएनयू छात्र नेता उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल 389 पेज के विस्तृत हलफनामे में पुलिस ने दावा किया है कि ये दंगे कोई सहज हिंसा नहीं थे, बल्कि एक सुनियोजित ‘शासन परिवर्तन अभियान’ थे, जिसका उद्देश्य देश को अस्थिर करना, सांप्रदायिक दंगे भड़काना और वैश्विक स्तर पर भारत को बदनाम करना था। यह साजिश कथित तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान अंजाम दी गई, ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित हो और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को मुसलमानों के खिलाफ ‘नरसंहार’ के रूप में चित्रित किया जा सके। पुलिस ने जोर देकर कहा कि ऐसे गंभीर अपराधों में ‘जेल ही नियम है, जमानत नहीं’। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने गुरुवार को सुनवाई की शुरुआत की, जो आज (31 अक्टूबर) जारी रहेगी।

मामले का पृष्ठभूमि: 2020 दंगों की साजिश और कानूनी प्रक्रिया
2020 फरवरी में उत्तर-पूर्व दिल्ली के जाफराबाद, शिव विहार, चांद बाग और करावल नगर जैसे इलाकों में हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई, सैकड़ों घायल हुए और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा। इन दंगों के लिए 753 एफआईआर दर्ज की गईं, जिनमें से कई सीएए विरोधी प्रदर्शनों से जुड़ी बताई गईं। दिल्ली पुलिस ने इसे ‘बड़ी साजिश’ का हिस्सा ठहराया, जिसमें गैर-कानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) की धाराओं के तहत मुकदमा चलाया गया। आरोपियों पर देश की संप्रभुता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने, सांप्रदायिक हिंसा भड़काने और राजद्रोह का आरोप लगाया गया।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। उसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट की एक बेंच ने 2 सितंबर 2025 को उमर खालिद, शरजील इमाम और सात अन्य – मोहम्मद सलीम खान, शिफा-उर-रहमान, अतहर खान, मीरान हैदर, शादाब अहमद, अब्दुल खालिद सैफी और गुलफिशा फातिमा – की जमानत नामंजूर कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि उनकी भूमिका ‘गंभीर’ थी, भाषण ‘भड़काऊ’ थे और दंगे सहज नहीं, बल्कि ‘सुनियोजित साजिश’ का परिणाम थे। एक अन्य बेंच ने तसलीम अहमद की जमानत भी खारिज की। हाईकोर्ट ने हाल ही में तसलीम अहमद बनाम दिल्ली सरकार मामले के फैसले में कहा कि जमानत पर बाहर के आरोपी ही ट्रायल में देरी का कारण बन रहे हैं, जो जेल में बंद अन्यों को प्रभावित कर रहा है।

अभियुक्तों ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 27 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच – जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजरिया – ने दिल्ली पुलिस को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का समय दिया। पुलिस ने देरी पर कोर्ट की फटकार के बाद 30 अक्टूबर को यह हलफनामा दाखिल किया। वकील कपिल सिब्बल, ए.एम. सिंहवी और अन्य अभियुक्तों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू पुलिस की ओर से पेश हुए।

पुलिस का हलफनामा: साजिश के प्रमुख दावे और सबूत
दिल्ली पुलिस के हलफनामे में दावा किया गया है कि यह साजिश ‘गहरी जड़ों वाली, पूर्वनियोजित और सुनियोजित’ थी, जिसका लक्ष्य पूरे भारत में दंगे भड़काना था। पुलिस ने ‘ओकुलर, अपरिवर्तनीय दस्तावेजी और तकनीकी सबूत’ का हवाला दिया, जिसमें चैट्स, मीटिंग्स के रिकॉर्ड और गवाहों के बयान शामिल हैं। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • शासन परिवर्तन का उद्देश्य: साजिश का अंतिम लक्ष्य ‘शासन परिवर्तन’ था, जो शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के आड़ में अंजाम दिया गया। पुलिस ने कहा कि सीएए विरोधी प्रदर्शनों को ‘प्रायोजित’ बनाया गया, जो ‘उग्रवादी उत्प्रेरक’ के रूप में काम करने वाले थे। दंगों को ट्रंप की यात्रा के समय इसलिए चुना गया, ताकि वैश्विक मीडिया में सीएए को मुसलमानों के खिलाफ ‘पोग्रोम’ (नरसंहार) दिखाया जा सके और भारत को अस्थिर दिखाया जा सके।
  • उमर खालिद की केंद्रीय भूमिका: पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद को साजिश का ‘मुख्य सूत्रधार’ बताया गया। पुलिस ने कहा कि उन्होंने सीलमपुर में एक गुप्त बैठक में निर्देश दिए कि स्थानीय महिलाओं को चाकू, बोतलें, एसिड, पत्थर, मिर्च पाउडर जैसी खतरनाक चीजें जमा करने को कहा जाए। जब हिंसा की इच्छित तीव्रता न मिली, तो खालिद ने जाहंगीरपुरी से बांग्लादेशी महिलाओं को जाफराबाद प्रदर्शन में शामिल करवाया। उन्हें ‘चक्का जाम के विचार के संस्थापक’ के रूप में चित्रित किया गया, जो दंगों का ट्रिगर था।
  • शरजील इमाम की भूमिका: शरजील इमाम को खालिद और अन्य ‘शीर्ष साजिशकर्ताओं’ के ‘शिष्य’ के रूप में वर्णित किया गया। वे दिसंबर 2019 से 20 दिसंबर तक दंगों के पहले चरण के ‘मुख्य वास्तुकारों’ में से एक थे। पुलिस ने उनके भड़काऊ भाषणों का हवाला दिया, जो प्रदर्शनों को हिंसक बनाने में सहायक थे।
  • अन्य आरोपियों की संलिप्तता: गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान और मोहम्मद सलीम खान को साजिश में गहराई से शामिल बताया गया। पुलिस ने कहा कि ये सभी देश की संप्रभुता पर ‘प्रहार’ करने के लिए एकजुट हुए। साजिश को पूरे भारत में दोहराने की योजना थी, जिससे 53 मौतें, संपत्ति क्षति और व्यापक हिंसा हुई।
  • ट्रायल में देरी का खंडन: अभियुक्तों ने 900 गवाहों का हवाला देकर देरी का तर्क दिया, लेकिन पुलिस ने इसे ‘भ्रामक’ बताया। केवल 155 सार्वजनिक गवाह हैं, जिनमें से 58 ने शपथ-पत्र दिए हैं। 47 संरक्षित गवाहों में से 38 ने धारा 164 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज कराए हैं। पुलिस ने कहा कि ट्रायल जल्द पूरा हो सकता है और देरी के लिए अभियुक्त जिम्मेदार हैं, जो ‘तुच्छ आवेदनों’ और ‘समन्वित असहयोग’ से मुकदमे को लटका रहे हैं।

पुलिस ने तसलीम अहमद मामले के हाईकोर्ट फैसले का सहारा लिया, जिसमें कहा गया कि जमानत पर आरोपी ही देरी का कारण हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई: बहस के प्रमुख बिंदु
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पुलिस ने जोर दिया कि यूएपीए जैसे कठोर कानूनों में जमानत ‘अपवाद’ है, नियम नहीं। एएसजी राजू ने कहा कि सबूतों से साजिश की पुष्टि होती है, जो राज्य को अस्थिर करने का प्रयास था। अभियुक्तों के वकीलों ने सबूतों की कमजोरी, लंबी न्यायिक हिरासत (2020 से) और मौलिक अधिकारों का हवाला दिया। कोर्ट ने 27 अक्टूबर को देरी पर नाराजगी जताई थी, लेकिन पुलिस ने तर्क दिया कि यह ‘जमानत प्राप्ति का बहाना’ है। सुनवाई आज जारी रहेगी, जहां बेंच यह तय करेगी कि क्या देरी के आधार पर जमानत दी जा सकती है।

व्यापक प्रभाव: राजनीतिक और सामाजिक बहस
यह मामला राजनीतिक विवादों का केंद्र रहा है। अभियुक्तों को विपक्ष ‘राजनीतिक कैदी’ मानता है, जबकि सरकार इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मुद्दा बताती है। यूएपीए की आलोचना होती रही है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाता है। दंगों ने सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया, और सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल इन व्यक्तियों के लिए, बल्कि भविष्य के ऐसे मामलों के लिए मिसाल बनेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ट्रायल प्रक्रिया को तेज करने और मानवाधिकारों के संतुलन पर भी असर डालेगा। फिलहाल, पुलिस का यह हलफनामा साजिश के दावों को और मजबूत करने का प्रयास है, जो अदालत में कड़ी बहस का विषय बनेगा।

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