by-Ravindra Sikarwar
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में थैलेसीमिया और खांसी के इलाज के नाम पर बच्चों को चढ़ाई गई जहरीली दवा से जुड़े मामले में पुलिस ने एक नया खुलासा किया है। यहां एक मेडिकल प्रतिनिधि को हिरासत में ले लिया गया है, जो संदिग्ध रूप से जहरीली ‘कोल्डरिफ’ खांसी की सिरप की सप्लाई चेन से जुड़ा हुआ है। यह गिरफ्तारी पहले से चली आ रही जांच का हिस्सा है, जिसमें अब तक 20 बच्चों की मौत हो चुकी है, मुख्य रूप से किडनी फेलियर के कारण। घटना ने न केवल स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि दवा वितरण नेटवर्क की कमजोरियों को भी उजागर किया है। 26 अक्टूबर 2025 को हुई इस कार्रवाई के बाद पुलिस ने विशेष जांच दल (एसआईटी) को और सशक्त बनाने का फैसला लिया है, ताकि पूरी सप्लाई चेन को खंगाला जा सके।
मामले की पृष्ठभूमि: बच्चों की मौतों का सिलसिला
यह कांड सितंबर 2025 के शुरुआती दिनों से शुरू हुआ, जब छिंदवाड़ा जिले के परासिया उप-मंडल में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को खांसी की शिकायत पर डॉक्टरों द्वारा ‘कोल्डरिफ’ सिरप लिखी गई। प्रारंभ में, कम से कम 11 बच्चों की मौत किडनी फेलियर से हुई, जिनमें से अधिकांश परासिया के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) से जुड़े थे। जांच में पता चला कि सिरप में 48.6% डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) नामक जहरीला औद्योगिक रसायन मिला हुआ था, जो किडनी को नष्ट करने वाला पदार्थ है। यह वही विषाक्त तत्व था, जो 2023 में उत्तर प्रदेश के नोएडा में हुई दवा कांड में भी पाया गया था।
मृतकों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई। 7 अक्टूबर तक यह आंकड़ा 20 पहुंच गया, जिसमें 17 बच्चे छिंदवाड़ा से, दो बैतूल से और एक पंधुरना से थे। प्रभावित बच्चों की उम्र 2 से 12 वर्ष के बीच थी। परिवारों ने बताया कि सिरप लेने के बाद बच्चों को उल्टी, दस्त, कमजोरी और फिर तीव्र किडनी क्षति के लक्षण दिखे। एक मां ने दर्द भरी आपबीती सुनाते हुए कहा, “हमारा बच्चा थैलेसीमिया से लड़ रहा था, लेकिन यह सिरप उसके लिए जहर साबित हुआ। डॉक्टर पर भरोसा था, लेकिन अब सब कुछ बर्बाद हो गया।” जांच एजेंसियों ने पाया कि सिरप का एक ही बैच नंबर (CLD-025) सभी मामलों में शामिल था, जो तमिलनाडु के कांचीपुरम स्थित श्रीसन फार्मास्यूटिकल्स द्वारा निर्मित था।
अब तक की कार्रवाइयां: डॉक्टर से लेकर सप्लायर तक
पुलिस ने शुरुआत में डॉ. प्रवीण सोनी नामक एक सरकारी बाल रोग विशेषज्ञ को गिरफ्तार किया, जो परासिया सीएचसी में तैनात थे। डॉ. सोनी पर आरोप था कि उन्होंने अधिकांश प्रभावित बच्चों को यह सिरप लिखा था। डॉक्टर ने अपना बचाव करते हुए कहा कि वे 15 वर्षों से यह दवा प्रिस्क्राइब कर रहे थे और कभी कोई शिकायत नहीं आई। उन्हें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 105 (हत्या के बिना दोषपूर्ण हत्या) और 276 (दवाओं में मिलावट) के तहत मामला दर्ज किया गया, साथ ही ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 27ए के तहत, जिसमें 10 वर्ष से आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है। डॉक्टर को तत्काल निलंबित कर दिया गया।
इसके बाद, ‘अपना फार्मा’ नामक लोकल एजेंसी के संचालक को हिरासत में लिया गया, जो सिरप की जिला स्तर पर सप्लाई करता था। जांच में 594 बोतलें छिंदवाड़ा में वितरित होने की पुष्टि हुई। अब, 26 अक्टूबर को मेडिकल प्रतिनिधि की गिरफ्तारी ने मामला नया मोड़ दिया। यह प्रतिनिधि श्रीसन फार्मास्यूटिकल्स का कर्मचारी था, जो डॉक्टरों को सिरप बेचने और प्रचारित करने का काम करता था। पुलिस अधीक्षक अजय पांडे ने बताया, “प्रतिनिधि पर सप्लाई चेन में लापरवाही और संदिग्ध प्रमोशन का आरोप है। पूछताछ में कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं।” एसआईटी ने तमिलनाडु जाकर कंपनी के अधिकारियों से पूछताछ की, जहां फैक्ट्री सील कर दी गई।
मध्य प्रदेश सरकार ने सिरप की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, और केंद्र सरकार ने भी दवा नियंत्रकों को सतर्क किया। स्वास्थ्य सचिव पून्या सलीला श्रीवास्तव ने राज्यों के साथ बैठक बुलाई, जिसमें रिवाइज्ड शेड्यूल एम (दवा निर्माण मानक) का सख्त पालन और क्वालिटी टेस्टिंग पर जोर दिया गया। इसके अलावा, दो दवा निरीक्षकों और एक उप निदेशक को निलंबित किया गया।
विशेष जांच दल (एसआईटी) की भूमिका: सप्लाई चेन की कड़ियां जोड़ना
12 सदस्यीय एसआईटी का गठन 5 अक्टूबर को हुआ, जिसका नेतृत्व परासिया एसडीओपी जितेंद्र सिंह जाट कर रहे हैं। टीम ने प्रभावित बच्चों के सैंपल पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी भेजे और सिरप के बैच की लैब टेस्टिंग कराई। जांच के प्रमुख बिंदु:
- उत्पादन स्तर: कंपनी के लाइसेंस, कच्चे माल की खरीद (खासकर ग्लाइकॉल), और क्वालिटी कंट्रोल की कमी।
- वितरण नेटवर्क: लोकल डिस्ट्रीब्यूटर्स, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स, और डॉक्टरों के बीच प्रोत्साहन योजनाएं।
- डॉक्यूमेंटेशन: 594 बोतलों का ट्रेसिंग, जिनमें से कई अभी भी बाजार में थीं।
- अन्य प्रभाव: बैतूल और पंधुरना में संभावित लिंक की जांच।
एसआईटी ने कंपनी के निदेशकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और दिल्ली दवा नियंत्रक को सूचित किया। एक सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट सौंपने का लक्ष्य है।
विवाद और प्रतिक्रियाएं: डॉक्टरों का विरोध, राजनीतिक रंग
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने डॉ. सोनी की गिरफ्तारी को “सिस्टमिक फेलियर का शिकार” बताया और उनकी रिहाई की मांग की। छिंदवाड़ा आईएमए प्रमुख कल्पना शुक्ला ने चेतावनी दी कि अगर डॉक्टर रिहा नहीं होते, तो सोमवार से अनिश्चितकालीन हड़ताल होगी। डॉक्टरों ने केंद्रीय जांच समिति गठित करने और चिकित्सकों की सुरक्षा की मांग की। विपक्षी दल कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया, जबकि सीएम मोहन यादव ने कहा, “दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।”
सोशल मीडिया पर #ChhindwaraCoughSyrupTragedy और #JusticeForChildren जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां परिवार न्याय की गुहार लगा रहे हैं। एक सर्वे में पाया गया कि 70% ग्रामीण परिवार दवाओं की गुणवत्ता पर संदेह करते हैं।
कानूनी प्रावधान और प्रभाव:
- मुख्य धाराएं: बीएनएस 105 (हत्या जैसी लापरवाही), 276 (मिलावट); ड्रग्स एक्ट 27ए (10+ वर्ष सजा)।
- केंद्र का कदम: सभी दवा कंपनियों के लिए अनिवार्य ऑडिट और डीईजी टेस्टिंग।
- सामाजिक असर: थैलेसीमिया मरीजों में दहशत; जिले में 56 ऐसे केस हैं।
बचाव के उपाय: क्या करें माता-पिता और सरकार?
- माता-पिता: दवा खरीदने से पहले बैच नंबर चेक करें; संदिग्ध लक्षण (उल्टी, सूजन) पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क।
- सरकार: ब्लड बैंक और दवा स्टोर पर डिजिटल ट्रैकिंग अनिवार्य; नियमित रेड।
- जागरूकता: स्कूलों में अभियान चलाएं; हेल्पलाइन 108 पर शिकायत।
- कानूनी सहायता: प्रभावित परिवारों को मुआवजा (प्रति बच्चा 5 लाख) और मुफ्त इलाज।
यह कांड दवा उद्योग की नियामक खामियों को उजागर करता है। एसआईटी की रिपोर्ट से पूरी सच्चाई सामने आएगी, लेकिन असली बदलाव तभी संभव जब उत्पादन से वितरण तक पारदर्शिता सुनिश्चित हो। प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदना, और भविष्य में ऐसी त्रासदी न हो, इसके लिए सतर्कता जरूरी।
