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by-Ravindra Sikwarwar

नेपाल, हिमालय की गोद में बसा यह खूबसूरत देश, दीवाली को अपनी सांस्कृतिक विविधता के साथ मनाता है। यहां दीवाली को मुख्य रूप से ‘तिहार’ या ‘यम पंचक’ कहा जाता है, जो भारत की दीवाली से मिलती-जुलती है लेकिन इसमें प्रकृति, पशु-पक्षियों और पारिवारिक बंधनों को विशेष महत्व दिया जाता है। तिहार नेपाल का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार है, जो दशैं के बाद आता है। यह पांच दिनों का उत्सव है, जो कार्तिक मास की अमावस्या के आसपास मनाया जाता है। 2025 में यह 19 अक्टूबर से 23 अक्टूबर तक चलेगा। इस दौरान पूरे देश में छुट्टियां घोषित हो जाती हैं, और लोग रोशनी, पूजा-अर्चना, स्वादिष्ट भोजन और पारंपरिक खेलों में डूब जाते हैं। लेकिन नेपाल की दीवाली की खासियत यह है कि यह केवल रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू—पशुओं से लेकर आत्मा तक—की पूजा का प्रतीक है। आइए, जानते हैं कि नेपाल कैसे अपनी अनूठी परंपराओं के साथ दीवाली को रंगीन बनाता है।

तिहार का महत्व और पृष्ठभूमि:
तिहार को ‘प्रकाश का त्योहार’ कहा जाता है, जो अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह यमराज (मृत्यु के देवता) के दूतों—कौवे, कुत्ते, गाय और बैल—की पूजा से जुड़ा है। एक कथा के अनुसार, राजा बली ने अपनी बहन से मिलने के लिए इन प्राणियों को भेजा था, इसलिए इनकी पूजा की जाती है। नेपाल में यह त्योहार सभी धर्मों के लोग मनाते हैं, जिसमें न्यूअर बौद्ध समुदाय भी शामिल है। वे लक्ष्मी और विष्णु की पूजा करते हुए इसे स्वांति कहते हैं। मधेशी समुदाय इसे दीपावली बुलाता है। तिहार प्रकृति के प्रति सम्मान सिखाता है और पारिवारिक एकता को मजबूत करता है। काठमांडू घाटी में रातें रोशनी से जगमगा उठती हैं, जहां बिजली की कमी के बावजूद हजारों दीये जलाए जाते हैं, जो शहर को किसी सपनों की नगरी में बदल देता है।

तिहार के पांच दिन: अनोखे रीति-रिवाज
तिहार के हर दिन की अपनी अलग थीम है, जो भारत की दीवाली से अलग है। यहां राम की अयोध्या वापसी के साथ-साथ पशु-पूजा पर जोर है।

पहला दिन: काग तिहार (कौवों की पूजा) 

तिहार का आगमन काग तिहार से होता है। नेपाल में कौवों को यमराज का दूत माना जाता है, जो पूर्वजों की आत्माओं को स्वर्ग पहुंचाते हैं। सुबह-सुबह लोग चावल के कण (लडडु या भात) को चोंच में लगाकर कौवों को चढ़ावा चढ़ाते हैं। कौवे अगर ये खा लें, तो यह शुभ माना जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के छोटे-छोटे जीव भी जीवन चक्र का हिस्सा हैं। बच्चों के लिए यह रोमांचक होता है, क्योंकि वे कौवों को बुलाने के लिए मीठे स्वरों में गीत गाते हैं।

दूसरा दिन: कुकुर तिहार (कुत्तों की पूजा) 

यह दिन कुत्तों को समर्पित है, जिन्हें भैरव (यम के द्वारपाल) का रूप माना जाता है। कुत्तों को घर लाकर तिलक लगाया जाता है, गेंदे के फूलों की माला पहनाई जाती है और रोटी या मीट से सम्मानित किया जाता है। कुछ परिवार कुत्तों को विशेष भोजन देते हैं, जैसे दही-चावल। यह परंपरा कुत्तों की वफादारी और सुरक्षा के प्रति आभार व्यक्त करती है। नेपाल के ग्रामीण इलाकों में यह देखना मजेदार होता है, जहां सड़कों पर सजे-धजे कुत्ते घूमते नजर आते हैं। यह भारत की दीवाली से बिल्कुल अलग है, जहां ऐसा कोई रिवाज नहीं।

तीसरा दिन: गाई तिहार और लक्ष्मी पूजा (गायों की पूजा और मुख्य दीवाली) 

यह तिहार का सबसे चमकदार दिन है। सुबह गायों को पूजा जाता है, क्योंकि गाय को धन-समृद्धि की देवी माना जाता है। गायों को तिलक, माला और चारा चढ़ाया जाता है। वैष्णव समुदाय गोवर्धन पूजा भी करता है, जो भगवान कृष्ण की लीला से जुड़ी है। शाम को लक्ष्मी पूजा होती है—घरों को साफ किया जाता है, रंगोली बनाई जाती है, और दीये जलाकर लक्ष्मी को आमंत्रित किया जाता है। लोग नए कपड़े पहनते हैं, मिठाइयां बनाते हैं (जैसे सेल रोटी, लडडु) और आतिशबाजी करते हैं। काठमांडू में दर्शन और पशुपतिनाथ मंदिर रोशनी से नहा जाते हैं। यह दिन नेपाल में दीवाली का चरम है, लेकिन गाय पूजा इसे अनोखा बनाती है।

चौथा दिन: गोवर्धन पूजा या महा पूजा (बैलों की पूजा और आत्म-पूजा) 

यह दिन बैलों को समर्पित है, जो कृषि कार्यों में किसानों के साथी होते हैं। बैलों को तिलक लगाकर आरती उतारी जाती है। न्यूअर समुदाय में यह महा पूजा का दिन है, जहां व्यक्ति अपनी आत्मा की पूजा करता है। चावल से मंडला बनाकर माथे पर तिलक लगाया जाता है, जो आत्म-चिंतन का प्रतीक है। कुछ जगहों पर यह नेपाल संवत् के नए साल की शुरुआत भी है। वैष्णव लोग गोवर्धन पूजा करते हैं। यह दिन नेपाल की सांस्कृतिक गहराई दिखाता है, जहां व्यक्ति स्वयं को दिव्य मानता है।

पांचवां दिन: भाई टीका (भाई-बहन का त्योहार) 

तिहार का समापन भाई टीका से होता है। बहनें भाइयों को रंग-बिरंगे तिलक लगाती हैं, माला पहनाती हैं और दक्षिणा (शगुन) देती हैं, जो लंबी उम्र की कामना करती हैं। बदले में भाई बहनों को उपहार देते हैं। परिवार में मिठाइयां बांटी जाती हैं, और कार्ड गेम्स जैसे कौड़ा या लंगुर बुरजा खेले जाते हैं। यह दिन पारिवारिक प्रेम को मजबूत करता है, जो भारत के भाई दूज से मिलता-जुलता लेकिन अधिक भावुक है।

तिहार के दौरान विशेष परंपराएं और उत्सव:
तिहार में घरों को सजाने का अपना अंदाज है। गेंदे के फूलों की मालाएं दरवाजों पर लटकाई जाती हैं, दीये और इलेक्ट्रिक लाइट्स से आंगन जगमगाते हैं। बच्चे घर-घर जाकर गीत गाते हैं और रोशनी के बदले मिठाई मांगते हैं। आतिशबाजी पर हालांकि पाबंदी है (चोटों के कारण), लेकिन लोग सुरक्षित ढंग से पटाखे फोड़ते हैं। स्वादिष्ट व्यंजनों में सेल रोटी, यमरी और चूड़ा अमिलो प्रमुख हैं। तिहार कार्ड गेम्स के लिए भी प्रसिद्ध है—परिवार रात भर खेलते हैं। पर्यटकों के लिए चितवन नेशनल पार्क के पास थारू जनजाति के गांव में तिहार मनाना अनोखा अनुभव है, जहां बॉलीवुड संगीत के साथ पारंपरिक नृत्य होते हैं।

तिहार का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव:
तिहार नेपाल की एकता का प्रतीक है। यह हिंदू-बौद्ध संस्कृति का मिश्रण दिखाता है, जहां लक्ष्मी पूजा सभी करते हैं। पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है, क्योंकि पशु-पूजा प्रकृति के प्रति जागरूकता पैदा करती है। आधुनिक नेपाल में तिहार बाजारों में भी रंग भरता है—कपड़े, मिठाइयां और सजावट की खरीदारी जोरों पर होती है। पाटन या भक्तपुर जैसे ऐतिहासिक शहरों में प्राचीन मंदिरों में पूजा देखना अद्भुत है। यह त्योहार लोगों को नई शुरुआत की प्रेरणा देता है, जहां अंधकार दूर भगाकर उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है।

नेपाल का तिहार न केवल रोशनी का उत्सव है, बल्कि जीवन, प्रकृति और रिश्तों का सम्मान भी। यदि आप 2025 में नेपाल घूमने जा रहे हैं, तो तिहार के दौरान यहां पहुंचें—यह आपको एक अविस्मरणीय अनुभव देगा। यह त्योहार सिखाता है कि खुशी साझा करने से बढ़ती है, और हर प्राणी का महत्व है।

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