by-Ravindra Sikarwar
ग्वालियर: मध्य प्रदेश में हाल ही में जहरीली खांसी की सिरप से जुड़ी बच्चों की मौतों के सिलसिले के बीच एक नई चिंताजनक घटना सामने आई है। ग्वालियर जिले के मोरार स्थित सरकारी अस्पताल में एक बच्चे को दी गई एजिथ्रोमाइसिन एंटीबायोटिक दवा की बोतल में कथित तौर पर कीड़े पाए जाने की शिकायत पर पूरे स्टॉक को सील कर दिया गया है। अधिकारियों ने गुरुवार (16 अक्टूबर 2025) को इसकी पुष्टि की और अस्पताल में उपलब्ध सभी 306 बोतलों को जब्त कर लिया गया। यह दवा बच्चों में विभिन्न संक्रमणों के इलाज के लिए आमतौर पर दी जाती है, और इस घटना ने दवा की गुणवत्ता व सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिकायत एक महिला ने दर्ज कराई, जिसके बच्चे को अस्पताल ने एजिथ्रोमाइसिन ओरल सस्पेंशन दी थी। दवा निरीक्षक अनुभूति शर्मा ने बताया, “मोरार के सरकारी अस्पताल में एक महिला ने एजिथ्रोमाइसिन की बोतल में कीड़े होने की शिकायत की।” उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा लाई गई बोतल पहले से खोली हुई थी, लेकिन फिर भी मामले की तुरंत जांच शुरू कर दी गई। प्रारंभिक जांच में कुछ बोतलों में कोई दृश्य संदूषण नहीं मिला, लेकिन सावधानी के तौर पर पूरा स्टॉक जब्त कर लिया गया। अस्पताल में वितरित और भंडारित सभी 306 बोतलों को वापस बुला लिया गया है, और नमूने भोपाल स्थित प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेज दिए गए हैं।
यह घटना मध्य प्रदेश में दवा सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच आई है। राज्य में कोल्डरिफ नामक जहरीली खांसी की सिरप से कम से कम 22 बच्चों की मौत हो चुकी है, जिसके कारण स्वास्थ्य विभाग सतर्क हो गया है। यह सिरप तमिलनाडु की एक कंपनी द्वारा निर्मित थी, और मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसकी जिम्मेदारी तमिलनाडु अधिकारियों पर डालते हुए कड़ी कार्रवाई की मांग की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी भारत में निम्न गुणवत्ता वाली दवाओं के खिलाफ चेतावनी जारी की है। एजिथ्रोमाइसिन की यह दवा एक सामान्य जेनेरिक संस्करण है, जिसका निर्माण मध्य प्रदेश की एक स्थानीय कंपनी ने किया था। दवा विभाग ने निर्माता कंपनी के खिलाफ भी जांच शुरू कर दी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि संदूषण कैसे हुआ।
अस्पताल प्रशासन ने कहा कि यह दवा बच्चों के लिए निर्धारित थी, जो सांस संबंधी संक्रमण या अन्य सामान्य बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होती है। शिकायत के बाद तुरंत कार्रवाई करते हुए अस्पताल ने मरीजों को वैकल्पिक दवाएं उपलब्ध कराईं और प्रभावित परिवारों को आश्वस्त किया। ग्वालियर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एसएस तोमर ने कहा, “हमने पूरे स्टॉक को अलग कर दिया है और जांच रिपोर्ट आने तक इस दवा का वितरण पूरी तरह बंद कर दिया गया है। मरीजों की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है।” उन्होंने यह भी बताया कि प्रारंभिक जांच में कीड़ों का संदूषण केवल एक बोतल तक सीमित लगता है, लेकिन सतर्कता बरतते हुए सभी बोतलों को जांच के दायरे में लिया गया।
यह मामला दवा निर्माण और वितरण प्रक्रिया में लापरवाही की ओर इशारा करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि दवाओं में संदूषण जैसी समस्याएं अक्सर खराब भंडारण, अस्वच्छ उत्पादन इकाइयों या आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों के कारण होती हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने पहले ही दवा कंपनियों पर सख्त निगरानी बढ़ाने के आदेश दिए हैं, और इस घटना के बाद राज्य स्तर पर एक विशेष जांच समिति गठित करने पर विचार किया जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री विश्वास सारंग ने सोशल मीडिया पर कहा, “बच्चों की सुरक्षा के लिए हम कोई कोताही नहीं बरतेंगे। दोषी पाए जाने पर कड़ी सजा दी जाएगी।”
सामाजिक कार्यकर्ताओं और अभिभावक संगठनों ने इस घटना की निंदा की है और मांग की है कि सरकारी अस्पतालों में दवाओं की नियमित जांच अनिवार्य हो। एक अभिभावक ने कहा, “हम अपने बच्चों को इलाज के लिए भेजते हैं, लेकिन ऐसी घटनाएं विश्वास को तोड़ देती हैं। सरकार को तत्काल मुआवजा और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करनी चाहिए।” फिलहाल, जांच रिपोर्ट का इंतजार है, जो आने वाले दिनों में स्पष्ट करेगी कि क्या यह एक अलग-थलग घटना थी या व्यापक समस्या का हिस्सा।
यह घटना न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर दवा नियामक प्राधिकरण (CDSCO) के लिए भी एक चुनौती है। विशेषज्ञों ने सिफारिश की है कि दवाओं के उत्पादन में गुणवत्ता मानकों को और सख्त किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियां दोबारा न हों। मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी अब और तेज हो गई है, और प्रभावित परिवार को सहायता का वादा किया गया है।
