by-Ravindra Sikarwar
बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने आगामी विधानसभा चुनाव 2025 के लिए सीट बंटवारे का ऐलान कर दिया है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) को बराबरी का दर्जा देते हुए प्रत्येक को 101-101 सीटें आवंटित की गई हैं। इसके अलावा, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को 29 सीटें, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) को 6 और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (एचएएम) को 6 सीटें मिली हैं। कुल 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में यह बंटवारा एनडीए के सभी सहयोगियों को संतुष्ट करने का प्रयास नजर आता है। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इसकी घोषणा की, जो गठबंधन की एकजुटता का प्रतीक मानी जा रही है।
यह फैसला कई दौर की गहन चर्चाओं के बाद लिया गया, जिसमें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, जदयू प्रमुख नीतीश कुमार और उनके सहयोगी दलों के नेता शामिल हुए। एनडीए के प्रवक्ता ने बताया कि यह समझौता “सौहार्दपूर्ण” तरीके से तय हुआ, जिससे गठबंधन की मजबूती बनी रहे। बिहार में 2020 के चुनावों के मुकाबले यह बंटवारा भाजपा-जदयू के बीच संतुलन बनाए रखने वाला है, जहां पिछली बार जदयू को 122 और भाजपा को 110 सीटें मिली थीं।
सीट बंटवारे का पूरा विवरण
एनडीए ने अपनी रणनीति को मजबूत बनाने के लिए सीटों का बंटवारा इस प्रकार किया है:
- भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): 101 सीटें। भाजपा को राज्य के उत्तर और दक्षिणी हिस्सों में मजबूत आधार वाले क्षेत्रों पर फोकस करने का मौका मिला है।
- जनता दल यूनाइटेड (जदयू): 101 सीटें। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी को मगध और कोसी क्षेत्रों में प्राथमिकता दी गई है, जहां उनकी पकड़ मजबूत है।
- लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) – चिराग पासवान: 29 सीटें। पासवान समुदाय के बीच लोकप्रिय चिराग को यह कोटा गठबंधन में उनकी भूमिका को मजबूत करने के लिए दिया गया। यह 2020 के 42 सीटों से कम है, लेकिन चिराग ने इसे “सकारात्मक” बताया।
- राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) – उपेंद्र कुशवाहा: 6 सीटें। कोइरी समुदाय के नेता कुशवाहा को यह सीमित कोटा मिला, जो उनकी पार्टी की स्थिति को दर्शाता है।
- हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (एचएएम) – जीतन राम मांझी: 6 सीटें। महादलित नेता मांझी को भी समान कोटा दिया गया, जो गठबंधन की सामाजिक समीकरण को संतुलित करने का प्रयास है।
यह बंटवारा बिहार की 243 विधानसभा सीटों को पूरी तरह कवर करता है। एनडीए के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह फॉर्मूला जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। भाजपा और जदयू की बराबरी से नीतीश कुमार को मजबूत स्थिति मिलेगी, जबकि छोटे सहयोगी भी अहम भूमिका निभा सकेंगे।”
पृष्ठभूमि: चर्चाओं का लंबा सिलसिला
बिहार चुनाव 2025 की तैयारी पिछले कई महीनों से चल रही थी। 2020 के चुनावों में एनडीए ने 125 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, लेकिन बीच में नीतीश कुमार का महागठबंधन से वापसी और फिर एनडीए में लौटना राजनीतिक ड्रामा का हिस्सा बना। इस बार सीट बंटवारे पर सहमति बनाने में देरी हुई, क्योंकि जदयू अधिक सीटें चाहती थी। भाजपा ने स्पष्ट कर दिया था कि वह 100 से कम सीटें नहीं लेगी। चिराग पासवान ने भी 30 से अधिक सीटों की मांग की, जो आखिरकार 29 पर तय हुई।
केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, “एनडीए की एकता बिहार की प्रगति का आधार है। यह बंटवारा सभी सहयोगियों की भावनाओं का सम्मान करता है। हम विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर जनता के बीच जाएंगे।” नीतीश कुमार ने पटना से एक बयान जारी कर कहा, “यह फैसला बिहार के हित में है। हम गरीबी उन्मूलन और बुनियादी ढांचे पर फोकस करेंगे।”
विपक्ष की प्रतिक्रिया: ‘भाजपा का जदयू को खत्म करने का षड्यंत्र’
महागठबंधन ने इस घोषणा पर तीखी प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के प्रदेश अध्यक्ष मृत्युंजय तिवारी ने कहा, “यह सीट बंटवारा दिखाता है कि भाजपा जदयू को खत्म करने की साजिश रच रही है। 101-101 का फॉर्मूला नीतीश जी को कमजोर करेगा। बिहार की जनता एनडीए की साजिश को समझेगी।” आरजेडी ने दावा किया कि महागठबंधन भी जल्द अपनी सीट बंटवारे की घोषणा करेगा, जिसमें आरजेडी को 144, कांग्रेस को 70 और वाम दलों को 29 सीटें मिल सकती हैं।
कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल ने कहा, “एनडीए का यह फैसला जातिवादी राजनीति का प्रमाण है। हम सामाजिक न्याय और समानता के एजेंडे पर लड़ेंगे।” इधर, प्रोफेसर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने अपनी दूसरी उम्मीदवार सूची जारी कर दी, जो एनडीए और महागठबंधन दोनों को चुनौती देगी।
चुनावी परिदृश्य: क्या होगा असर?
बिहार विधानसभा चुनाव नवंबर-दिसंबर 2025 में होने हैं। एनडीए की इस रणनीति से गठबंधन की एकजुटता मजबूत हुई है, लेकिन छोटे दलों को कम सीटें मिलने से आंतरिक असंतोष की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा-जदयू का बराबर बंटवारा केंद्र-राज्य समन्वय को दर्शाता है, जबकि चिराग पासवान का कोटा पासवान वोट बैंक को साधने का प्रयास है।
2020 के चुनावों में एनडीए को 37.29% वोट शेयर मिला था, जबकि महागठबंधन को 37.35%। इस बार विकास और जातिगत समीकरण प्रमुख मुद्दे रहेंगे। एनडीए ने उम्मीद जताई है कि यह फॉर्मूला उन्हें पूर्ण बहुमत दिलाएगा।
यह घोषणा बिहार की राजनीति को नई ऊर्जा देगी। क्या एनडीए अपनी एकजुटता बनाए रख पाएगा, या विपक्ष इसका फायदा उठाएगा? चुनावी घमासान अब जोर पकड़ चुका है।
