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by-Ravindra Sikarwar

1984 का ऑपरेशन ब्लू स्टार भारतीय इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसने देश की राजनीति, समाज और सिख समुदाय के साथ संबंधों को हमेशा के लिए बदल दिया। इस सैन्य कार्रवाई को लेकर आज भी बहस और विवाद जारी हैं। कई इतिहासकारों, सिख नेताओं और विश्लेषकों का मानना है कि यह ऑपरेशन एक “ऐतिहासिक भूल” थी, जिसकी कीमत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। इस ऑपरेशन ने न केवल सिख समुदाय में गहरे घाव छोड़े, बल्कि भारत की एकता और अखंडता पर भी सवाल उठाए। आइए, इस घटना के कारणों, परिणामों और इसके दीर्घकालिक प्रभावों को विस्तार से समझते हैं।

ऑपरेशन ब्लू स्टार की पृष्ठभूमि:
1970 के दशक के अंत में पंजाब में सिख समुदाय के बीच अलगाववादी भावनाएं उभरने लगी थीं। इसकी जड़ें आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973) में थीं, जिसमें सिखों के लिए अधिक स्वायत्तता और धार्मिक-सांस्कृतिक अधिकारों की मांग की गई थी। इस आंदोलन को जनरैल सिंह भिंडरावाले ने तेज किया, जो एक करिश्माई धार्मिक नेता थे। भिंडरावाले ने सिखों के लिए एक अलग खालिस्तान की मांग को हवा दी और अपने अनुयायियों के साथ अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में डेरा डाल लिया।

1980 के दशक की शुरुआत तक पंजाब में हिंसा बढ़ गई थी। भिंडरावाले और उनके समर्थकों पर हत्याओं, बम विस्फोटों और आतंकवादी गतिविधियों का आरोप था। केंद्र सरकार का दावा था कि स्वर्ण मंदिर परिसर में भारी मात्रा में हथियार जमा किए गए थे, और यह आतंकवाद का गढ़ बन चुका था। इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सैन्य हस्तक्षेप का फैसला लिया, जो ऑपरेशन ब्लू स्टार के रूप में सामने आया।

ऑपरेशन ब्लू स्टार: क्या हुआ?
1-6 जून 1984 को भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया। इसका उद्देश्य भिंडरावाले और उनके सशस्त्र अनुयायियों को हटाना और परिसर को आतंकवादियों से मुक्त करना था। सेना ने टैंकों, तोपों और भारी हथियारों का उपयोग किया, जो सिख समुदाय के सबसे पवित्र स्थल पर सैन्य कार्रवाई के लिए अभूतपूर्व था।

  • पहला दिन: 1 जून को सेना ने स्वर्ण मंदिर को घेर लिया। परिसर में मौजूद तीर्थयात्रियों को बाहर निकलने की चेतावनी दी गई, लेकिन कई लोग अंदर ही फंस गए।
  • मुख्य कार्रवाई: 3-6 जून को भारी गोलीबारी और विस्फोट हुए। भिंडरावाले और उनके प्रमुख सहयोगी मारे गए। अकाल तख्त, जो सिखों का एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, को भारी नुकसान पहुंचा। स्वर्ण मंदिर की दीवारों और संरचनाओं पर भी गोलियों और बमों के निशान बन गए।
  • हताहत: सरकारी आंकड़ों के अनुसार, ऑपरेशन में 83 सैनिक और 492 आतंकवादी/नागरिक मारे गए। लेकिन सिख संगठनों का दावा है कि हजारों निर्दोष तीर्थयात्री मारे गए, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे।

ऑपरेशन की गलतियां और विवाद:
इतिहासकारों और सिख नेताओं ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को कई कारणों से गलत ठहराया है:

  1. सैन्य कार्रवाई का समय और स्थान: ऑपरेशन गुरु अर्जन देव के शहीदी दिवस (3 जून) के आसपास शुरू हुआ, जब स्वर्ण मंदिर में हजारों तीर्थयात्री मौजूद थे। इसे सिख समुदाय की भावनाओं पर सीधा हमला माना गया।
  2. भारी हथियारों का उपयोग: टैंकों और तोपों का इस्तेमाल सिखों के पवित्र स्थल पर अपमानजनक माना गया। इससे न केवल धार्मिक भावनाएं आहत हुईं, बल्कि सिख समुदाय में सरकार के खिलाफ गुस्सा भड़क उठा।
  3. वैकल्पिक रास्तों की अनदेखी: कई विशेषज्ञों का मानना है कि बातचीत या कम आक्रामक तरीकों से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता था। लेकिन सरकार ने जल्दबाजी में सैन्य कार्रवाई को चुना।
  4. खुफिया विफलता: सेना को परिसर में मौजूद हथियारों और आतंकवादियों की संख्या की सटीक जानकारी नहीं थी, जिससे ऑपरेशन अनियोजित और हिंसक हो गया।

इंदिरा गांधी की हत्या और परिणाम:
ऑपरेशन ब्लू स्टार ने सिख समुदाय में गहरा आक्रोश पैदा किया। इसकी प्रतिक्रिया में 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की उनके ही सिख अंगरक्षकों, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह, ने गोली मारकर हत्या कर दी। बेअंत सिंह मौके पर मारे गए, जबकि सतवंत सिंह को बाद में फांसी दी गई। इंदिरा गांधी की हत्या ने देश को झकझोर दिया और इसके बाद दिल्ली, कानपुर और अन्य शहरों में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे। इन दंगों में हजारों सिखों की हत्या हुई, संपत्तियां नष्ट हुईं और समुदाय में असुरक्षा की भावना गहरी हो गई।

दीर्घकालिक प्रभाव:

  1. सिख समुदाय का अलगाव: ऑपरेशन ने सिख समुदाय को केंद्र सरकार से और दूर कर दिया। कई सिखों ने इसे अपने धर्म और पहचान पर हमला माना।
  2. खालिस्तान आंदोलन को बल: ऑपरेशन के बाद खालिस्तान की मांग तेज हो गई, और 1980 के दशक के अंत तक पंजाब में हिंसा चरम पर थी।
  3. राजनीतिक परिणाम: कांग्रेस को पंजाब में भारी नुकसान हुआ। अकाली दल और अन्य सिख संगठनों ने सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की।
  4. सैन्य और प्रशासनिक सबक: ऑपरेशन ने सेना और सरकार को धार्मिक स्थलों पर सैन्य कार्रवाई के खतरों का सबक सिखाया। बाद में इस तरह के ऑपरेशनों में अधिक सावधानी बरती गई।

नेताओं और विशेषज्ञों की राय:

  • शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी): एसजीपीसी ने ऑपरेशन को “सिख नरसंहार” करार दिया और मांग की कि सरकार इसके लिए माफी मांगे। 2015 में तत्कालीन अकाली दल सरकार ने ऑपरेशन की जांच की मांग की थी।
  • इतिहासकार खुशवंत सिंह: उन्होंने अपनी किताब A History of the Sikhs में लिखा कि ऑपरेशन एक “घातक भूल” थी, जिसने सिखों को देश से अलग-थलग कर दिया।
  • पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी.पी. मलिक: उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सैन्य दृष्टिकोण से सफल रहा, लेकिन सामाजिक और धार्मिक प्रभावों को नजरअंदाज करना भारी गलती थी।
  • कानूनी विशेषज्ञ: कई वकीलों ने ऑपरेशन को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया, क्योंकि निर्दोष नागरिकों की मौत को रोका जा सकता था।

माफी और सुलह के प्रयास:
2015 में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन को “दुखद घटना” बताया और सिख समुदाय से माफी मांगी। हालांकि, सिख संगठनों का कहना है कि माफी के बिना पूरी तरह सुलह संभव नहीं है। 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में ऑपरेशन को “गलती” स्वीकार किया और सिख समुदाय की भावनाओं को समझने की बात कही। लेकिन आज भी कई सिख संगठन इस मामले में पूर्ण जांच और जवाबदेही की मांग करते हैं।

ऑपरेशन ब्लू स्टार एक जटिल और दुखद घटना थी, जिसने भारत के सामाजिक ताने-बाने को गहरी चोट पहुंचाई। इंदिरा गांधी का यह फैसला उनके लिए व्यक्तिगत रूप से घातक साबित हुआ और देश को दंगों और हिंसा की आग में झोंक दिया। यह घटना हमें सिखाती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को नजरअंदाज करने की कीमत भारी हो सकती है। सिख समुदाय और सरकार के बीच विश्वास बहाली के लिए आज भी सुलह और संवाद की जरूरत है। क्या भविष्य में ऐसी गलतियां टाली जा सकेंगी? यह समय और नेतृत्व के फैसलों पर निर्भर करता है।

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