by-Ravindra Sikarwar
भारत की राजधानी नई दिल्ली में एक विवादास्पद घटना ने न केवल मीडिया जगत को हिलाकर रख दिया है, बल्कि महिलाओं के अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मानदंडों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मौलवी आमिर खान मुत्तकी द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं पत्रकारों को प्रवेश से रोक दिया गया, जिससे पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गई। इस घटना के बाद विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया है कि इस प्रेस इवेंट में उसकी कोई भूमिका नहीं थी और यह पूरी तरह अफगान दूतावास द्वारा स्वतंत्र रूप से संचालित किया गया था। यह विवाद तालिबान शासन के लिंग-आधारित भेदभाव की नीतियों को भारत की धरती पर प्रतिबिंबित करने जैसा प्रतीत होता है, जिसकी व्यापक निंदा हो रही है। विपक्षी नेता और पत्रकार संगठनों ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। आइए, इस पूरे प्रकरण को विस्तार से जानते हैं।
घटना का पूरा विवरण: प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं का बहिष्कार
यह विवादास्पद घटना 10 अक्टूबर 2025 को नई दिल्ली के अफगान दूतावास में हुई। अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी आमिर खान मुत्तकी भारत के दौरे पर थे, जो 9 अक्टूबर से शुरू होकर 16 अक्टूबर तक चलने वाला था। यह दौरा 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद काबुल से भारत का पहला उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल दौरा था। मुत्तकी ने 10 अक्टूबर को विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ द्विपक्षीय वार्ता की, जिसमें भारत ने काबुल में अपनी तकनीकी मिशन को पूर्ण दूतावास का दर्जा देने की घोषणा की। इस बैठक के ठीक बाद, अफगान दूतावास ने मुत्तकी के लिए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित किया, जिसमें द्विपक्षीय संबंध, मानवीय सहायता, व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
हालांकि, इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक चौंकाने वाली व्यवस्था देखने को मिली। केवल चुनिंदा पुरुष पत्रकारों को ही आमंत्रित किया गया था, जबकि महिलाओं पत्रकारों को प्रवेश से साफ मना कर दिया गया। अफगान दूतावास के अधिकारियों ने मुंबई के अफगान वाणिज्य दूतावास से दिल्ली में तैनात पत्रकारों को निमंत्रण भेजे थे, लेकिन इनमें किसी भी महिला पत्रकार का नाम नहीं था। प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुत्तकी ने क्षेत्रीय मुद्दों पर बात की, लेकिन जब अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति पर सवाल उठा, तो उन्होंने इसे टाल दिया। यह घटना तालिबान शासन की उन नीतियों की याद दिलाती है, जहां महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन से वंचित रखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, तालिबान के ‘2.0’ शासन के तहत अफगान महिलाएं दुनिया में सबसे गंभीर लिंग अधिकार संकट का सामना कर रही हैं।
पत्रकारों ने बताया कि जब महिलाओं पत्रकार दूतावास पहुंचीं, तो उन्हें प्रवेश द्वार पर ही रोक लिया गया। एक वरिष्ठ महिला पत्रकार ने कहा, “यह भारत में हो रहा था, जहां महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हैं। तालिबान की नीतियां यहां लागू नहीं होनी चाहिए।” इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद कोई संयुक्त मीडिया ब्रीफिंग नहीं हुई, जो MEA और अफगान पक्ष के बीच हुई बैठक के बाद सामान्य प्रथा होती है।
MEA का स्पष्टीकरण: ‘हमारी कोई भूमिका नहीं’
घटना के तुरंत बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगीं। विपक्ष ने सरकार पर तालिबान की भेदभावपूर्ण नीतियों को बर्दाश्त करने का आरोप लगाया। इस पर MEA ने 11 अक्टूबर को एक आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया। मंत्रालय ने कहा, “MEA की कल अफगान विदेश मंत्री द्वारा दिल्ली में आयोजित प्रेस इंटरैक्शन में कोई भूमिका या संलिप्तता नहीं थी।” MEA ने जोर देकर कहा कि यह इवेंट अफगान पक्ष द्वारा स्वतंत्र रूप से उनके दूतावास में आयोजित किया गया था। निमंत्रण भी अफगान वाणिज्य दूतावास द्वारा भेजे गए थे, और MEA ने इसमें हस्तक्षेप नहीं किया।
MEA के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा, “भारत अफगानिस्तान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध है। हमारी सहायता मानवीय आधार पर है, लेकिन हम किसी भी प्रकार के भेदभाव को बढ़ावा नहीं देते।” मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि जयशंकर-मुत्तकी बैठक सकारात्मक रही, जिसमें भारत ने काबुल में एम्बुलेंस, चिकित्सा उपकरण और अन्य सहायता की घोषणा की। हालांकि, MEA ने स्पष्ट रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस से खुद को अलग कर लिया।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं: विपक्ष का तीखा विरोध
यह घटना राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे सवाल किया: “प्रधानमंत्री जी, तालिबान प्रतिनिधि के प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिला पत्रकारों को हटाने पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। यदि महिलाओं के अधिकारों की मान्यता केवल चुनावी स्टंट नहीं है, तो भारत की सबसे सक्षम महिलाओं का यह अपमान कैसे अनुमति प्राप्त कर गया?” उन्होंने इसे “भारतीय महिला पत्रकारों का अपमान” करार दिया।
पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा, “भू-राजनीतिक मजबूरियां तालिबान से संवाद करने को मजबूर करती हैं, लेकिन उनके भेदभावपूर्ण और प्राचीन रीति-रिवाजों को मान लेना पूरी तरह हास्यास्पद है। MEA और एस जयशंकर के आचरण पर निराशा है।” टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने इसे “भारत की हर महिला का अपमान” बताया और सरकार को “कायरों का समूह” कहा। पत्रकार अलिशान जफरी ने व्यंग्य किया, “भारतीय महिला पत्रकार तालिबान की पसंद के अनुसार प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल नहीं हो सकतीं।”
महिला पत्रकार संगठनों ने भी कड़ी निंदा की। भारतीय महिला प्रेस कोर (IWWPC) की अध्यक्ष ने कहा, “यह तालिबान की मिसोजिनी का प्रतिबिंब है। भारत सरकार को ऐसी घटनाओं को अनुमति नहीं देनी चाहिए।” कई पत्रकारों ने सवाल उठाया कि कौन सा अधिकारी इस भेदभाव को मंजूरी देता है।
तालिबान की नीतियां: अफगान महिलाओं पर बढ़ते प्रतिबंध
यह घटना अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं पर लगाए गए सख्त प्रतिबंधों की याद दिलाती है। अगस्त 2021 से तालिबान सत्ता में आने के बाद, उन्होंने लड़कियों को माध्यमिक शिक्षा से वंचित कर दिया, महिलाओं को अधिकांश नौकरियों से बाहर किया, यात्रा के लिए पुरुष संरक्षक की अनिवार्यता थोप दी और सार्वजनिक स्थानों जैसे पार्कों व जिमों को बंद कर दिया। हाल ही में, उन्होंने अफगान विश्वविद्यालयों में महिलाओं द्वारा लिखी किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया और जेंडर एंड डेवलपमेंट, महिला समाजशास्त्र, मानवाधिकार, अफगान संवैधानिक कानून और वैश्वीकरण जैसे 18 कोर्स हटा दिए।
पिछले महीने अफगानिस्तान में आए भूकंप में 2,200 से अधिक मौतें हुईं, जिसमें महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित हुईं। तालिबान के नियमों के कारण पुरुष बचावकर्मी महिलाओं को छू नहीं सकते थे, जिससे कई महिलाएं मलबे में दबकर मर गईं। महिलाओं के लिए बचावकर्मी या चिकित्सक उपलब्ध न होने से स्थिति और बदतर हो गई। संयुक्त राष्ट्र ने इसे “दुनिया में महिलाओं के अधिकारों का सबसे बुरा संकट” बताया है।
भारत-अफगानिस्तान संबंधों का संदर्भ: कूटनीतिक संतुलन
मुत्तकी का यह दौरा भारत-अफगानिस्तान संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। भारत ने अफगानिस्तान में 3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है, जिसमें विकास परियोजनाएं और मानवीय सहायता शामिल है। जयशंकर ने कहा, “भारत अफगानिस्तान की संप्रभुता का समर्थन करता है। हम काबुल में अपनी उपस्थिति मजबूत करेंगे।” बैठक में भारत ने छह नई परियोजनाएं, 20 एम्बुलेंस, एमआरआई-सीटी स्कैन मशीनें, टीके और कैंसर दवाओं की घोषणा की। अफगान पक्ष ने भी भारत के साथ संतुलित संबंधों की इच्छा जताई।
हालांकि, यह घटना भारत की कूटनीतिक रणनीति पर सवाल उठाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत तालिबान से व्यावहारिक संवाद बनाए रखते हुए मानवाधिकारों पर दबाव डाल सकता है। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसी घटनाएं अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर सकती हैं।
महिलाओं के अधिकारों की रक्षा जरूरी:
यह घटना न केवल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुद्दा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर लिंग समानता की लड़ाई का प्रतीक है। MEA का स्पष्टीकरण विवाद को कम करने का प्रयास है, लेकिन विपक्ष और मीडिया की मांग है कि सरकार भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए। पत्रकारों ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में तालिबान की नीतियों को जगह नहीं मिलनी चाहिए। उम्मीद है कि यह विवाद भारत को अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों के लिए अधिक मुखर बनने के लिए प्रेरित करेगा। कूटनीति और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना ही भविष्य की कुंजी है।
