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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में एक अभूतपूर्व घटना के बाद कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है। 71 वर्षीय वकील राकेश किशोर, जिन्होंने सोमवार (7 अक्टूबर, 2025) को मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई (सीजेआई बी.आर. गवई) पर जूता फेंकने का प्रयास किया था, को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने कानूनी प्रैक्टिस से निलंबित कर दिया है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने उन्हें एसोसिएशन से स्थायी रूप से निष्कासित कर दिया है और सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। यह कार्रवाई वकील की ओर से अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले व्यवहार को “अनुशासनहीन और अपमानजनक” बताते हुए की गई है। घटना धार्मिक टिप्पणियों से जुड़ी एक सुनवाई के दौरान घटी, जिसने न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

घटना का विस्तृत विवरण:
घटना सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच के समक्ष सोमवार दोपहर को घटी, जहां सीजेआई गवई एक धार्मिक विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई कर रहे थे। यह मामला उत्तर प्रदेश के मथुरा में एक मंदिर-मस्जिद विवाद से संबंधित था, जहां याचिकाकर्ताओं ने भगवान कृष्ण की मूर्ति को लेकर अदालत में अपील की थी। सुनवाई के दौरान, सीजेआई गवई ने कथित तौर पर भगवान कृष्ण के बारे में एक टिप्पणी की, जिसे राकेश किशोर ने अपमानजनक माना। किशोर, जो याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, अचानक गुस्से में आ गए और बेंच की ओर बढ़े। सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें रोक लिया, लेकिन इस दौरान उन्होंने अपना जूता उतारकर फेंकने का प्रयास किया। जूता बेंच तक नहीं पहुंचा, लेकिन यह कृत्य कोर्ट रूम में हड़बड़ी मचा गया।

वीडियो फुटेज में दिखाया गया है कि किशोर चिल्लाते हुए आगे बढ़े और “यह अपमान है” जैसे नारे लगाए। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने तुरंत सुरक्षा को सक्रिय किया, और किशोर को कोर्ट रूम से बाहर निकाल लिया गया। सीजेआई गवई ने शांत भाव से सुनवाई जारी रखी, लेकिन बेंच ने इस व्यवहार को “न्यायिक प्रक्रिया का अपमान” करार दिया। किशोर को तत्काल हिरासत में ले लिया गया, और कोर्ट ने उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया।

कार्रवाई का क्रम: बीसीआई और एससीबीए की भूमिका
घटना के तुरंत बाद, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने आपात बैठक बुलाई। एससीबीए के अध्यक्ष और कार्यकारी समिति ने सर्वसम्मति से राकेश किशोर को एसोसिएशन से निष्कासित करने का फैसला लिया। एससीबीए के महासचिव ने एक बयान जारी करते हुए कहा, “यह व्यवहार वकील की गरिमा और अदालत की पवित्रता के विरुद्ध है। किशोर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी, और उनकी सदस्यता रद्द की जाती है।” यह निष्कासन स्थायी है, और किशोर अब सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका दाखिल नहीं कर सकेंगे।

उसी शाम, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी कदम उठाया। बीसीआई के चेयरमैन मनन मिश्रा की अध्यक्षता में हुई बैठक में किशोर को पूरे देश में कानूनी प्रैक्टिस से निलंबित करने का आदेश जारी किया गया। बीसीआई ने कहा कि यह कृत्य “वकीलों के आचरण नियमों का घोर उल्लंघन” है, और अनुशासनात्मक जांच शुरू की जाएगी। निलंबन की अवधि अस्थायी है, लेकिन जांच पूरी होने तक किशोर किसी भी अदालत में पेश नहीं हो सकेंगे। बीसीआई ने स्पष्ट किया कि यदि दोषी पाए गए, तो स्थायी निष्कासन हो सकता है।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने किशोर के खिलाफ आपराधिक अवमानना का केस दर्ज करने का आदेश दिया है। एक वकील ने कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें मांग की गई थी कि किशोर को तत्काल दंडित किया जाए। कोर्ट ने इस पर सुनवाई की तारीख 15 अक्टूबर तय की है।

पृष्ठभूमि: धार्मिक टिप्पणी और विवाद का कारण
यह घटना एक संवेदनशील धार्मिक मामले से जुड़ी है। सुनवाई मथुरा के शाही ईदगाह मस्जिद और कृष्ण जन्मभूमि मंदिर विवाद पर हो रही थी। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति को अपमानित किया जा रहा है। सीजेआई गवई की टिप्पणी—जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा कि “भगवान कृष्ण ने कहा था कि…”—को किशोर ने हिंदू भावनाओं का अपमान माना। किशोर ने बाद में मीडिया को बताया, “मैंने गुस्से में ऐसा किया, क्योंकि न्यायाधीश की टिप्पणी असंवेदनशील थी।” हालांकि, कोर्ट ने उनकी सफाई को खारिज कर दिया और कहा कि कोई भी वकील ऐसी हिंसक प्रतिक्रिया नहीं दे सकता।

राकेश किशोर एक वरिष्ठ वकील हैं, जिनके पास 40 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे विभिन्न सामाजिक और धार्मिक मामलों में सक्रिय रहे हैं, लेकिन इस घटना ने उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। उनके सहयोगियों का कहना है कि वे भावुक स्वभाव के हैं, लेकिन यह व्यवहार अस्वीकार्य है।

प्रतिक्रियाएं: न्यायिक जगत और राजनीतिक हलकों में बहस
सुप्रीम कोर्ट के अन्य वकीलों ने इस घटना की निंदा की है। बार काउंसिल के एक सदस्य ने कहा, “यह अदालत की स्वतंत्रता पर हमला है। वकीलों को अपनी नाराजगी शांतिपूर्ण तरीके से व्यक्त करनी चाहिए।” पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने ट्वीट किया, “न्यायपालिका की गरिमा सर्वोपरि है। ऐसी घटनाएं लोकतंत्र के लिए खतरा हैं।”

राजनीतिक दलों ने भी प्रतिक्रिया दी। भाजपा ने इसे “न्यायिक अपमान” बताया, जबकि विपक्षी दलों ने सीजेआई की टिप्पणी पर सवाल उठाए। एक कांग्रेस नेता ने कहा, “धार्मिक मामलों में संवेदनशीलता जरूरी है।” सोशल मीडिया पर #JusticeForGavai और #BarDiscipline जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां बहस छिड़ी हुई है।

निष्कर्ष: न्यायिक प्रक्रिया पर प्रभाव
यह घटना भारतीय न्याय व्यवस्था में अनुशासन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। वकीलों के लिए आचरण संहिता को और सख्त करने की मांग उठ रही है, ताकि ऐसी घटनाएं दोहराई न जाएं। किशोर की निलंबन अवधि और अवमानना सुनवाई के नतीजे अब नजरें बाकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अन्य वकीलों के लिए चेतावनी बनेगा, और अदालत की गरिमा को बनाए रखने में मदद करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे कितना भी प्रभावशाली हो, कानून से ऊपर नहीं है।

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