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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: हाल ही में मध्य प्रदेश में दूषित कफ सिरप के सेवन से 20 से अधिक बच्चों की दर्दनाक मौतों के बाद, भारत के केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने औषधि क्षेत्र में गुणवत्ता नियंत्रण को मजबूत करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। 7 अक्टूबर, 2025 को जारी एक आपातकालीन सलाह में, नियामक ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के औषधि नियंत्रकों को निर्देश दिया है कि कफ सिरप सहित दवाओं के कच्चे माल और तैयार उत्पादों की हर बैच की जांच अनिवार्य रूप से की जाए। यह कदम वैश्विक स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की चिंताओं और पिछले वर्षों की समान घटनाओं को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है, जो भारत को “दुनिया की फार्मेसी” के रूप में स्थापित करने वाली छवि पर सवालिया निशान लगा रही हैं।

घटना की भयावह पृष्ठभूमि:
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में पिछले एक सप्ताह में कम से कम 20 बच्चों (सभी पांच वर्ष से कम आयु के) की मौत हो चुकी है, जिन्हें डॉक्टरों ने कफ सिरप के सेवन से जोड़ा है। इनमें से चार मौतें मात्र 24 घंटों में हुईं। प्रभावित बच्चे मुख्य रूप से वायरल संक्रमण या एलर्जी से उपजी खांसी से पीड़ित थे, और उन्हें कफ सिरप दिए गए थे। जांच में पाया गया कि “कोल्डरिफ” नामक सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) नामक विषैला पदार्थ 48.6 प्रतिशत तक मौजूद था, जो औद्योगिक सॉल्वेंट्स में इस्तेमाल होता है और छोटी मात्रा में ही घातक साबित हो सकता है। यह पदार्थ प्रोपाइलीन ग्लाइकॉल जैसे अनुमत सॉल्वेंट में मिल जाता है, जो दवाओं को स्थिर और स्वादिष्ट बनाने के लिए उपयोग किया जाता है।

यह घटना कोई पहली नहीं है। 2022 में गाम्बिया, उज्बेकिस्तान और कैमरून में भारतीय निर्मित कफ सिरपों से 140 से अधिक बच्चों की मौत हुई थी। 2019 में भी भारत में ही 12 बच्चों की जान गई थी। इन घटनाओं ने भारत की फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री की विश्वसनीयता पर गहरा आघात पहुंचाया है। कफ सिरप बाजार, जो 2024 में 262.5 मिलियन डॉलर का था, 2035 तक 743 मिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, लेकिन गुणवत्ता की लापरवाही इसे जोखिम भरा बना रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश बचपन की खांसी वायरल होती है, जो अपने आप ठीक हो जाती है, और सिरप केवल अस्थायी राहत देते हैं, लेकिन अधिक मात्रा में विषाक्तता या लत का खतरा पैदा करते हैं।

नए दिशानिर्देशों का विस्तृत विवरण:
सीडीएससीओ के महानिदेशक राजीव रघुवंशी द्वारा हस्ताक्षरित इस सलाह में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि दवा निर्माताओं को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 के अनुपालन में हर बैच के कच्चे माल (सक्रिय और निष्क्रिय सामग्री दोनों) और तैयार उत्पादों की जांच अनिवार्य रूप से करनी होगी। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • कच्चे माल की जांच: हर बैच के एक्सीपिएंट्स (जैसे ग्लिसरीन, सोर्बिटॉल, प्रोपाइलीन ग्लाइकॉल) को अनुमोदित विक्रेताओं से ही खरीदा जाए और उनकी गुणवत्ता परीक्षण किया जाए। डीईजी या ईथाइलीन ग्लाइकॉल जैसे विषाक्त पदार्थों की स्क्रीनिंग विशेष रूप से अनिवार्य।
  • तैयार उत्पादों का परीक्षण: कफ सिरप के हर बैच को बाजार में रिलीज करने से पहले सरकारी प्रयोगशालाओं में जांचा जाए। निर्यात के लिए 2023 से लागू अतिरिक्त परीक्षण स्तर को घरेलू बाजार पर भी विस्तारित किया जाए।
  • रिकॉर्ड रखरखाव: सभी परीक्षण रिपोर्टों का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया जाए, जो निरीक्षण के दौरान उपलब्ध हो।
  • निरीक्षण और जागरूकता: राज्य नियंत्रकों को उत्पादन इकाइयों का नियमित निरीक्षण करने, “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी” घोषित दवाओं की जांच करने और निर्माताओं को परिपत्र जारी कर संवेदनशील बनाने का निर्देश।

नियामक ने पाया कि कई फैक्ट्रियों में बैच-दर-बैच जांच की अनदेखी हो रही थी, जो इस त्रासदी का मुख्य कारण है। ड्रग इंस्पेक्टर्स को अब नियमित रूप से इन रिपोर्टों की समीक्षा करनी होगी, न कि केवल शिकायतों पर।

सरकारी और राज्य स्तर पर कार्रवाई:
मध्य प्रदेश सरकार ने तत्काल प्रतिक्रिया में औषधि नियंत्रक दिनेश मौर्य को स्थानांतरित कर दिया, जबकि छिंदवाड़ा के गौरव शर्मा, जबलपुर के शरद कुमार जैन और डिप्टी डायरेक्टर शोभित कोष्ठा को निलंबित कर दिया। 19 प्रभावित सिरप के नमूने इकट्ठा किए गए, जिनमें से 10 की रिपोर्ट आ चुकी है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कंपनी की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया।

अन्य राज्यों ने भी सतर्कता बरती:

  • तमिलनाडु: कोल्डरिफ सिरप का उत्पादन करने वाली श्रीसन फार्मा की कांचीपुरम इकाई को सील कर दिया। राज्य औषधि नियंत्रक ने डीईजी प्रदूषण की पुष्टि की और कंपनी के अन्य उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया।
  • केरल: 12 वर्ष से कम बच्चों को बिना नई प्रिस्क्रिप्शन के दवाएं देने पर रोक। एक विशेषज्ञ पैनल गठित किया गया, जिसमें राज्य औषधि नियंत्रक, बाल स्वास्थ्य अधिकारी और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स शामिल।
  • राजस्थान: घर-घर सर्वे, जागरूकता अभियान, कुछ सिरपों पर प्रतिबंध और नमूना परीक्षण।
  • महाराष्ट्र: निगरानी बढ़ाई और छह राज्यों में 19 दवा इकाइयों का निरीक्षण शुरू।
  • तेलंगाना: जन जागरूकता और दो वर्ष से कम बच्चों के लिए कफ सिरप पर सख्ती।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने डॉक्टरों को “तर्कसंगत” उपयोग की सलाह दी, अर्थात पांच वर्ष से कम बच्चों को अनावश्यक सिरप न दें।

वैश्विक प्रतिक्रिया और चिंताएं:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भारत से कोल्डरिफ सिरप के निर्यात पर स्पष्टीकरण मांगा है और घरेलू बाजार में डीईजी/ईजी स्क्रीनिंग की “नियामक कमी” पर गहरी चिंता जताई। डब्ल्यूएचओ ने वैश्विक चिकित्सा उत्पाद अलर्ट जारी करने पर विचार कर रहा है। संगठन ने दो वर्ष से कम बच्चों के लिए कफ और सर्दी की दवाओं के उपयोग के खिलाफ सलाह दी है।

भारतीय मेडिकल एसोसिएशन के प्रमुख दिलीप भानुशल ने डॉक्टरों का बचाव किया, लेकिन फार्मा कंपनियों और नियामक प्रणाली की विफलताओं को जिम्मेदार ठहराया। एक ड्रग रेगुलेशन विशेषज्ञ ने कहा कि निरीक्षक बैच रिपोर्टों की नियमित जांच नहीं करते, जिससे कंपनियां इसे छोड़ देती हैं।

प्रभाव और भविष्य की दिशा:
यह नया दिशानिर्देश न केवल घरेलू बाजार को सुरक्षित बनाएगा, बल्कि निर्यात पर भी सकारात्मक असर डालेगा। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि समस्या गहरी है—कम लागत वाले छोटे निर्माताओं की अनियमितता, ओवर-द-काउंटर बिक्री और कमजोर प्रवर्तन। बाजार की वृद्धि दर 9.9 प्रतिशत होने के बावजूद, गुणवत्ता पर नियंत्रण जरूरी है।

यह त्रासदी बच्चों के स्वास्थ्य और भारत की फार्मा प्रतिष्ठा को बचाने की दिशा में एक जागृति का क्षण है। सरकार ने जांच समितियां गठित की हैं, लेकिन विशेषज्ञों की मांग है कि लंबे समय के लिए डिजिटल ट्रैकिंग और सख्त दंडनीति लागू हो। माता-पिता को सलाह दी जाती है कि बच्चों को सिरप देने से पहले डॉक्टर से परामर्श लें और लक्षणों पर नजर रखें। उम्मीद है कि ये कदम भविष्य में ऐसी विपत्तियों को रोकेंगे।

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