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by-Ravindra Sikarwar

नई दिल्ली: भारत के सबसे प्रतिष्ठित औद्योगिक समूह टाटा के वरिष्ठ अधिकारियों ने मंगलवार (7 अक्टूबर, 2025) को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की। यह मुलाकात टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टीज के बीच छिड़े आंतरिक कलह के बीच हुई, जिसमें बोर्ड नियुक्तियों और शासन संरचना से जुड़े मुद्दे प्रमुख हैं। लगभग 45 मिनट चली इस बंद कमरे वाली चर्चा ने केंद्र सरकार की चिंता को उजागर किया, क्योंकि टाटा समूह की स्थिरता देश की आर्थिक संरचना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। स्रोतों के अनुसार, सरकार ने समूह को आश्वस्त किया है कि वह “सभी आवश्यक कदम” उठाने को तैयार है ताकि ट्रस्ट और टाटा सन्स प्राइवेट लिमिटेड में स्थिरता बहाल हो सके।

बैठक का विस्तृत विवरण:
बैठक गृह मंत्री अमित शाह के नई दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास पर शाम को आयोजित हुई। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और टाटा सन्स के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के अलावा टाटा ट्रस्ट्स के उपाध्यक्ष वेणु श्रीनिवासन और ट्रस्टी डेरियस खंबाटा भी उपस्थित थे। ये सभी एक साथ शाम को शाह के निवास पर पहुंचे, जबकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन बाद में इसमें शामिल हुईं। पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह उच्च स्तरीय परामर्श टाटा समूह की आंतरिक अस्थिरता को संबोधित करने के उद्देश्य से बुलाई गई थी, जो समूह के संचालन को प्रभावित कर रही है।

बैठक के दौरान, टाटा नेताओं ने ट्रस्ट के भीतर उत्पन्न विवादों पर विस्तार से चर्चा की। एक स्रोत ने बताया कि केंद्र सरकार का मुख्य प्रश्न यह है: “देश की अर्थव्यवस्था के लिए इतना महत्वपूर्ण टाटा समूह को क्या किसी एक व्यक्ति के नियंत्रण में जाने दिया जा सकता है?” यह टिप्पणी ट्रस्ट के शासन तंत्र में संभावित एकाधिकार की आशंकाओं को दर्शाती है। हालांकि, न तो टाटा समूह और न ही सरकारी अधिकारियों ने बैठक के एजेंडे या परिणामों पर कोई आधिकारिक बयान जारी किया है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह हस्तक्षेप समूह की प्रतिष्ठा और आर्थिक योगदान को देखते हुए अपरिहार्य था।

विवाद की पृष्ठभूमि: ट्रस्ट में आंतरिक कलह
टाटा समूह, जो 156 वर्ष पुराना यह कांग्लोमेरेट है, लगभग 400 कंपनियों का संचालन करता है, जिनमें से 30 सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध हैं। इसका मूल्यांकन 180 अरब डॉलर से अधिक है, और टाटा ट्रस्ट्स टाटा सन्स (होल्डिंग कंपनी) में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। विवाद की जड़ सितंबर 2025 में हुई एक तीखी बोर्ड बैठक में है, जहां पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह को टाटा सन्स के बोर्ड से हटा दिया गया। इस घटना ने ट्रस्टीज के बीच गहरी खाई पैदा कर दी, जिसमें निर्णय लेने की प्रक्रिया से बहिष्कृत महसूस करने वाले सदस्यों का असंतोष प्रमुख है।

एक प्रमुख ट्रस्टी, मेहली (जिन्होंने अपनी असहमति जाहिर की है), ने महत्वपूर्ण फैसलों से बाहर रखे जाने पर नाराजगी व्यक्त की है। विवाद मुख्य रूप से टाटा सन्स के बोर्ड में प्रत्यक्षorship की नियुक्तियों पर केंद्रित है, जो समूह की समग्र शासन संरचना को प्रभावित कर सकता है। स्रोतों के अनुसार, यह कलह ट्रस्ट के भीतर सत्ता संतुलन को लेकर है, जहां कुछ सदस्यों को लगता है कि निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है। इससे पहले, 2022 में रतन टाटा के सेवानिवृत्ति के बाद नोएल टाटा को चेयरमैन बनाए जाने पर भी आंतरिक बहस हुई थी, लेकिन वर्तमान विवाद इससे कहीं अधिक गंभीर लग रहा है।

यह आंतरिक संघर्ष न केवल बोर्डरूम तक सीमित है, बल्कि समूह की प्रमुख कंपनियों जैसे टाटा स्टील, टाटा मोटर्स और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के संचालन को भी प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी अस्थिरता निवेशकों के विश्वास को हिला सकती है और समूह की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।

टाटा समूह का आर्थिक महत्व और सरकारी चिंता:
टाटा समूह भारत की कॉर्पोरेट दुनिया का एक स्तंभ है, जो रोजगार, नवाचार और सामाजिक कल्याण में महत्वपूर्ण योगदान देता है। समूह की कंपनियां स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में ट्रस्ट के माध्यम से अरबों रुपये का निवेश करती हैं। केंद्र सरकार के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि समूह की अस्थिरता राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि टाटा को “जो भी जरूरी हो, वह करे” ताकि शासन संबंधी मुद्दों का समाधान हो सके।

यह हस्तक्षेप असामान्य नहीं है; भारत सरकार अक्सर प्रमुख कॉर्पोरेट समूहों के संकटों में मध्यस्थता करती रही है, खासकर जब वे राष्ट्रीय हितों से जुड़े हों। उद्योग पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह बैठक एक सकारात्मक कदम है, जो ट्रस्ट को एकजुट करने में मदद करेगी।

संभावित प्रभाव और आगे की राह:
इस विवाद का समूह की प्रमुख बोर्ड बैठक पर भी असर पड़ सकता है, जो निकट भविष्य में होने वाली है। यदि कलह सुलझ न गया, तो यह नियामक जांच या कानूनी कार्रवाई का रूप ले सकता है। हालांकि, टाटा समूह की मजबूत विरासत को देखते हुए, विशेषज्ञ आशावादी हैं कि आंतरिक संवाद से मुद्दा हल हो जाएगा।

यह घटना भारतीय कॉर्पोरेट जगत में शासन और पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करती है। जैसे-जैसे विवरण सामने आते जा रहे हैं, टाटा समूह की अगली चालें न केवल उसके भविष्य को आकार देंगी, बल्कि देश के व्यावसायिक माहौल पर भी प्रभाव डालेंगी। उम्मीद है कि यह बैठक समूह को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगी।

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