by-Ravindra Sikarwar
जोधपुर: 4 अक्टूबर 2025 को एक बार बिल की तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई, जिसमें शराब की खरीद पर 20% ‘गौ उपकर’ (काउ सेस) लगाया गया था। यह घटना जोधपुर के पार्क प्लाजा होटल स्थित जियोफ्री बार में घटी, जहां एक ग्राहक ने कॉर्न फ्रिटर्स और छह बीयर का ऑर्डर दिया। बिल में मूल राशि 2,650 रुपये दिखाई गई, लेकिन जीएसटी, वैट और 20% गौ उपकर जोड़ने के बाद कुल बिल 3,262 रुपये हो गया। इस अनोखे उपकर ने लोगों में बहस छेड़ दी है, जहां एक ओर इसे गायों के संरक्षण के लिए सराहा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे शराब पीने वालों पर अनावश्यक बोझ बताया जा रहा है। यह उपकर राजस्थान सरकार की 2018 से चली आ रही नीति का हिस्सा है, जो गौशालाओं और पशु कल्याण के लिए धन जुटाने का माध्यम है।
घटना की पूरी जानकारी:
यह बिल 30 सितंबर 2025 को जारी किया गया था। ग्राहक ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर उपयोगकर्ता पियुष राय (@Benarasiyaa) ने इसकी तस्वीर साझा की और लिखा, “यह जोधपुर, राजस्थान में हुआ। राजस्थान सरकार गायों और पशुओं की पुनर्वास के लिए कुछ भी नहीं कर रही।” बिल में स्पष्ट रूप से ‘काउ सेस’ का उल्लेख था, जो वैट राशि पर 20% अतिरिक्त लगाया गया। होटल मैनेजर निखिल प्रेम ने स्पष्ट किया कि यह उपकर केवल शराब और बीयर पर लागू होता है, न कि भोजन पर। उन्होंने कहा, “हम वैट के 20% पर गौ उपकर लगाते हैं, जो कुल मिलाकर लगभग 24% हो जाता है। अधिकांश होटल इसे साधारण सरचार्ज कहते हैं, लेकिन हम इसे स्पष्ट रूप से गौ संरक्षण उपकर के रूप में दर्शाते हैं। यह राशि सीधे सरकारी पोर्टल पर जमा की जाती है।”
बिल का ब्रेकडाउन इस प्रकार था:
- मूल ऑर्डर: कॉर्न फ्रिटर्स और 6 बीयर – 2,650 रुपये।
- सीजीएसटी और एसजीएसटी: भोजन पर 9% (कुल 238.50 रुपये)।
- वैट: शराब पर 20% (लगभग 400 रुपये)।
- गौ उपकर: वैट पर 20% (80 रुपये)।
- कुल बिल: 3,262 रुपये।
यह उपकर तब लागू होता है जब बार या रेस्तरां में शराब का मूल्य अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से अधिक हो, क्योंकि इसे ‘मूल्य वृद्धि’ माना जाता है। राजस्थान के वित्त विभाग (राजस्व) के सचिव कुमार पाल गौतम ने बताया, “जब ग्राहक टेबल पर शराब ऑर्डर करता है, तो उसकी कीमत एमआरपी से ऊपर होती है। इस मूल्य वृद्धि पर वैट लगता है और उसके ऊपर गौ उपकर। यह केवल शराब की बिक्री पर है, भोजन पर जीएसटी लागू होता है।”
गौ उपकर की पृष्ठभूमि:
यह उपकर राजस्थान वैल्यू एडेड टैक्स एक्ट, 2003 के तहत 22 जून 2018 को तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की भाजपा सरकार द्वारा लागू किया गया था। शुरू में स्टांप ड्यूटी पर 10% गौ उपकर लगाया गया था, जिसे बाद में शराब पर भी विस्तारित किया गया। 2018 में केंद्र सरकार द्वारा गौशालाओं के लिए अनुदान में 90% कटौती के बाद यह कदम उठाया गया, ताकि राज्य स्तर पर गाय संरक्षण को मजबूत किया जा सके।
उपकर की दर को 20% रखा गया, जो विदेशी शराब, भारतीय निर्मित विदेशी शराब, देशी शराब और बीयर सभी पर लागू होता है। अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार ने इसे जारी रखा। वर्तमान भाजपा सरकार के तहत भी यह प्रभावी है। राज्य सरकार गौशालाओं के लिए प्रतिवर्ष 2,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करती है, जिसमें 600 करोड़ रुपये से ज्यादा गौशालाओं को सब्सिडी के रूप में दिए जाते हैं। राज्य में लगभग 2,900 पंजीकृत गौशालाएं हैं, जहां 11.5 लाख से अधिक पशु रखे जाते हैं। प्रत्येक गाय के लिए प्रतिदिन 40 रुपये और बछड़े के लिए 20 रुपये की सब्सिडी दी जाती है।
2024 में सरकार ने गौ उपकर को 25% करने का प्रस्ताव रखा था, ताकि चारे की सब्सिडी को 9 महीने से बढ़ाकर पूरे वर्ष के लिए किया जा सके, लेकिन अभी यह 20% पर ही है। इस उपकर से राज्य को प्रतिवर्ष सैकड़ों करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है, जो गायों की देखभाल, पशु चिकित्सा सेवाओं, आवारा पशुओं के भोजन और गौशालाओं के रखरखाव पर खर्च किया जाता है। राजस्थान देश का इकलौता राज्य है जहां गौ मंत्रालय समर्पित रूप से कार्य करता है।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं:
वायरल बिल ने एक्स और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर तीखी बहस छेड़ दी। एक यूजर ने लिखा, “20% गौ उपकर शराब पर लगाना मतलब हर शराबी को सरकार की गौ राजनीति के लिए मजबूरन भुगतान कराना। क्या यह वाकई गायों तक पहुंचता है?” (@vizhpuneet)। वहीं, कुछ ने इसे सराहा भी, कहते हुए कि “शराब पर टैक्स से गायों का संरक्षण एक अच्छा विचार है, कम से कम कुछ तो योगदान हो रहा है।”
कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि क्या यह उपकर पारदर्शी है और क्या यह वाकई गौशालाओं तक पहुंचता है। एक पोस्ट में कहा गया, “राजस्थान में गौशालाओं की हालत खराब है, फिर यह पैसा कहां जा रहा है?” बहस में राजनीतिक रंग भी घुल गया, जहां भाजपा समर्थक इसे गौ भक्ति का प्रतीक बता रहे थे, जबकि विपक्ष इसे शराबियों पर अतिरिक्त बोझ।
सरकारी पक्ष और विशेषज्ञ मत:
वित्त सचिव गौतम ने स्पष्ट किया कि यह उपकर कोई नया नियम नहीं है, बल्कि 2018 से लागू है। उन्होंने कहा, “यह राशि गौ संरक्षण और प्रचार के लिए विशेष कोष में जाती है। राज्य में 9.6 लाख आवारा पशु हैं, जिनके लिए अतिरिक्त फंडिंग जरूरी है।” होटल एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने बताया कि अधिकांश बार इसे ‘सरचार्ज’ के नाम से छिपा लेते हैं, लेकिन पार्क प्लाजा ने इसे स्पष्ट रूप से दिखाया, जो विवाद का कारण बना।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपकर राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद है, क्योंकि शराब पर टैक्स से प्राप्त राजस्व गौ कल्याण को जोड़ता है। हालांकि, कुछ अर्थशास्त्रियों ने सुझाव दिया कि पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जाए, ताकि ग्राहक देख सकें कि उनका योगदान कहां खर्च हो रहा है।
निष्कर्ष: बहस जारी
यह वायरल बिल राजस्थान की गौ संरक्षण नीति को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। एक ओर जहां यह गायों के कल्याण के लिए सराहनीय प्रयास है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय भार का कारण भी। सरकार का दावा है कि यह उपकर गौशालाओं को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, लेकिन जनता में पारदर्शिता की मांग बढ़ रही है। यदि आप राजस्थान में शराब का सेवन करते हैं, तो अगली बार बिल पर गौर करना न भूलें – यह न केवल आपकी जेब काट सकता है, बल्कि गायों की सेवा में भी योगदान दे सकता है। अधिक जानकारी के लिए राजस्थान वित्त विभाग की आधिकारिक वेबसाइट देखें।
