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by-Ravindra Sikarwar

रांची: झारखंड के 13 प्रवासी मजदूरों को आंध्र प्रदेश में बंधुआ मजदूरी की अमानवीय परिस्थितियों से मुक्त कराया गया है। इन मजदूरों को लगभग 1 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान किया गया और 24 सितंबर को ट्रेन के माध्यम से सुरक्षित रूप से उनके घर वापस भेजा गया। यह घटना देश में श्रम तस्करी और शोषण की गंभीर समस्या को एक बार फिर उजागर करती है।

घटना का विवरण:
झारखंड के विभिन्न जिलों से आने वाले ये 13 मजदूर आंध्र प्रदेश के एक निर्माण स्थल पर काम करने गए थे। उन्हें बेहतर मजदूरी और अच्छे कामकाजी माहौल का वादा किया गया था, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें कठोर परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। मजदूरों ने बताया कि उन्हें लंबे समय तक काम करना पड़ता था, न्यूनतम मजदूरी दी जाती थी, और उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। कई बार उन्हें भोजन और विश्राम का समय भी नहीं दिया जाता था। उनके दस्तावेज जब्त कर लिए गए थे, जिससे वे वहां से भागने में असमर्थ थे।

मुक्ति अभियान:
स्थानीय सामाजिक संगठनों और आंध्र प्रदेश पुलिस को इस बंधुआ मजदूरी की जानकारी मिली, जिसके बाद एक संयुक्त अभियान चलाया गया। 20 सितंबर को छापेमारी के दौरान इन 13 मजदूरों को मुक्त कराया गया। पुलिस ने निर्माण स्थल के ठेकेदार और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया। जांच में पता चला कि ये मजदूर एक संगठित श्रम तस्करी रैकेट का शिकार हुए थे, जो झारखंड और अन्य राज्यों से गरीब मजदूरों को झूठे वादों के साथ लालच देकर ले जाता था।

मुआवजा और घर वापसी:
मुक्त कराए गए मजदूरों को आंध्र प्रदेश सरकार और श्रम विभाग की ओर से तत्काल राहत प्रदान की गई। प्रत्येक मजदूर को लगभग 7,500 रुपये का मुआवजा दिया गया, जिसका कुल योग लगभग 1 लाख रुपये रहा। इसके अलावा, उनकी सुरक्षित घर वापसी के लिए रेलवे टिकट की व्यवस्था की गई। 24 सितंबर को ये मजदूर ट्रेन से झारखंड के अपने गृह जिलों में लौट आए। झारखंड सरकार ने भी इन मजदूरों के पुनर्वास के लिए कदम उठाने का आश्वासन दिया है।

श्रम तस्करी की समस्या:
यह घटना भारत में श्रम तस्करी और बंधुआ मजदूरी की गंभीर समस्या को रेखांकित करती है। झारखंड जैसे आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों से हजारों मजदूर रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों में जाते हैं, जहां उन्हें शोषण का शिकार होना पड़ता है। गैर-कानूनी ठेकेदार और बिचौलिये इन मजदूरों को झूठे वादों के जाल में फंसाते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कड़े कानूनों और बेहतर निगरानी की आवश्यकता है।

सरकार और सामाजिक संगठनों की भूमिका:
आंध्र प्रदेश और झारखंड सरकारों ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई की सराहना की है। झारखंड के श्रम विभाग ने कहा कि वे प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा के लिए एक विशेष हेल्पलाइन और निगरानी तंत्र विकसित करने पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा, गैर-सरकारी संगठनों ने मांग की है कि मजदूरों के लिए सुरक्षित रोजगार और पुनर्वास योजनाओं को लागू किया जाए।

मजदूरों की प्रतिक्रिया:
मुक्त कराए गए मजदूरों ने अपनी आपबीती साझा करते हुए सरकार और पुलिस का आभार व्यक्त किया। एक मजदूर, रामू उरांव ने कहा, “हमें लगा था कि हम कभी घर नहीं लौट पाएंगे। लेकिन अब हम सुरक्षित हैं और अपने परिवार के पास वापस जा रहे हैं।” एक अन्य मजदूर, सीता देवी ने बताया कि उन्हें उम्मीद है कि सरकार भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएगी।

भविष्य के लिए कदम:
इस घटना ने प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा और उनके अधिकारों पर फिर से बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना चाहिए, जिसमें प्रवासी मजदूरों का रिकॉर्ड हो। साथ ही, ठेकेदारों और नियोक्ताओं पर सख्त निगरानी और लाइसेंसिंग नियम लागू करने की जरूरत है। झारखंड सरकार ने भी स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने की योजना बनाई है ताकि मजदूरों को अन्य राज्यों में पलायन न करना पड़े।

झारखंड के 13 मजदूरों की बंधुआ मजदूरी से मुक्ति एक सकारात्मक कदम है, लेकिन यह श्रम तस्करी की गहरी समस्या को उजागर करता है। सरकार, पुलिस और सामाजिक संगठनों के संयुक्त प्रयासों से इन मजदूरों को नया जीवन मिला है। यह घटना समाज और प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि ऐसी अमानवीय प्रथाओं को जड़ से खत्म करने के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है। मजदूरों की सुरक्षित घर वापसी और मुआवजा इस दिशा में एक उम्मीद की किरण है।

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