by-Ravindra Sikarwar
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश सरकार और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को कड़ी फटकार लगाई। यह कार्रवाई 2024 में देवा परधी नामक व्यक्ति की पुलिस हिरासत में संदिग्ध मौत के मामले में दोषी पाए गए दो पुलिस अधिकारियों की अभी तक गिरफ्तारी न होने के कारण की गई। कोर्ट ने CBI को निर्देश दिया कि वह इन दोनों अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिए प्रत्येक पर 2 लाख रुपये का इनाम घोषित करे। यह मामला भोपाल के निकटवर्ती क्षेत्र से जुड़ा है, जहां पुलिस हिरासत में मौत की घटना ने मानवाधिकारों की रक्षा में प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
घटना का पृष्ठभूमि और विवरण:
यह मामला फरवरी 2024 का है, जब देवा परधी नामक एक गरीब आदिवासी युवक की भोपाल जिले के नजदीक एक पुलिस थाने में हिरासत के दौरान मौत हो गई। परधी को चोरी के संदेह में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन हिरासत के दौरान हुई पूछताछ में कथित तौर पर यातनाएं दी गईं, जिसके फलस्वरूप उनकी मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में चोटों के निशान और आंतरिक क्षति के प्रमाण मिले, जो पुलिस की क्रूरता की ओर इशारा करते हैं।
परिवार और मानवाधिकार संगठनों ने तुरंत शिकायत दर्ज की, जिसके बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा। उच्च न्यायालय ने CBI को जांच सौंप दी, लेकिन जांच में प्रगति न होने के कारण यह सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। कोर्ट ने इसे “राज्य द्वारा संरक्षित अपराध” करार दिया और कहा कि हिरासत में मौतें लोकतंत्र के लिए कलंक हैं।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और आदेश:
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस संजय करोल और जस्टिस सूर्य कांत शामिल थे, ने सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार और CBI पर गहरी नाराजगी जाहिर की। जस्टिस करोल ने कहा, “पुलिस हिरासत में मौत एक गंभीर अपराध है, और दोषियों को न्याय से बचने का कोई अधिकार नहीं। राज्य सरकार की उदासीनता और CBI की सुस्ती मानवाधिकारों का उल्लंघन है।” कोर्ट ने CBI को सख्त निर्देश दिए कि वह तत्काल कार्रवाई करे।
कोर्ट के प्रमुख आदेश निम्नलिखित हैं:
- इनाम घोषणा: CBI को दो पुलिस अधिकारियों—सब-इंस्पेक्टर राम कुमार और कांस्टेबल विजय सिंह—पर प्रत्येक के लिए 2 लाख रुपये का इनाम घोषित करने का आदेश दिया गया। यह इनाम सूचना देने वाले व्यक्ति को प्रदान किया जाएगा।
- जांच की समयसीमा: CBI को 30 दिनों के भीतर पूर्ण जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश।
- सरकारी जवाबदेही: मध्य प्रदेश सरकार को हिरासत में मौतों को रोकने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और निगरानी तंत्र मजबूत करने के लिए कदम उठाने को कहा गया।
- मुआवजा: देवा परधी के परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करने का आदेश, जो राज्य सरकार द्वारा भुगतान किया जाएगा।
मानवाधिकारों पर सवाल और व्यापक प्रभाव:
यह फैसला भारत में कस्टोडियल मौतों की बढ़ती संख्या पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अनुसार, 2024 में देशभर में 100 से अधिक हिरासत में मौतें दर्ज की गईं, जिनमें से अधिकांश गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़ी हैं। भोपाल के इस मामले ने आदिवासी समुदायों के प्रति पुलिस की संवेदनशीलता की कमी को उजागर किया।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। एक प्रमुख कार्यकर्ता, मेधा पाटकर ने कहा, “यह फैसला न्याय की दिशा में एक कदम है, लेकिन सिस्टम में सुधार की आवश्यकता है। हिरासत में यातनाओं को रोकने के लिए सख्त कानून और स्वतंत्र निगरानी जरूरी है।” विपक्षी दलों ने भी मध्य प्रदेश सरकार पर हमला बोला, इसे “पुलिस राज” का प्रमाण बताते हुए।
मध्य प्रदेश सरकार और CBI की प्रतिक्रिया:
मध्य प्रदेश सरकार ने कोर्ट के आदेश का पालन करने का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा, “हम न्याय के प्रति प्रतिबद्ध हैं। दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, और हिरासत में मौतों को रोकने के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे।” CBI ने भी बयान जारी कर कहा कि जांच तेज की जाएगी और इनाम घोषणा तुरंत प्रभाव से लागू होगी।
हालांकि, आलोचकों का मानना है कि यह प्रतिक्रिया केवल बयानबाजी है, और वास्तविक बदलाव के लिए सिस्टमिक सुधार जरूरी हैं।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देवा परधी कस्टोडियल मौत मामले में न्याय की उम्मीद जगाता है। दो पुलिस अधिकारियों पर इनाम घोषित करना और सरकार को फटकार लगाना पुलिस सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह मामला न केवल भोपाल के स्थानीय स्तर पर, बल्कि पूरे देश में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है। आशा है कि इस फैसले से हिरासत में मौतों की घटनाएं कम होंगी और न्याय व्यवस्था मजबूत बनेगी।
