by-Ravindra Sikarwar
उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस रिकॉर्ड्स, नोटिस बोर्ड और सार्वजनिक स्थलों पर जाति के उल्लेख पर रोक लगा दी है। अब FIR और गिरफ्तारी मेमो में जाति की जगह माता-पिता का नाम होगा। जानें पूरी डिटेल।
जातिगत भेदभाव पर लगाम लगाने की ऐतिहासिक पहल:
लखनऊ से आई इस बड़ी खबर ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में आदेश दिया था कि पुलिस रिकॉर्ड्स और सरकारी दस्तावेजों में जाति का उल्लेख अनावश्यक और भेदभाव को बढ़ावा देने वाला है। कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे तुरंत लागू करने का निर्णय लिया। कार्यवाहक मुख्य सचिव दीपक कुमार ने सभी विभागों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं।
अब FIR और गिरफ्तारी मेमो में नहीं होगी जाति का उल्लेख:
नए निर्देशों के तहत—
- प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR)
- गिरफ्तारी मेमो (Arrest Memo)
- जब्ती मेमो और अन्य पुलिस दस्तावेज
में अब आरोपी, गवाह या पीड़ित की जाति का जिक्र नहीं होगा। इसके बजाय माता-पिता का नाम, आधार नंबर, मोबाइल नंबर या अन्य आधुनिक पहचान साधन उपयोग किए जाएंगे। यह बदलाव केवल प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि समाज में जातिगत पहचान से होने वाले भेदभाव को कम करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
सार्वजनिक स्थलों से हटेंगे जाति आधारित संकेत और नारे:
आदेश के अनुसार—
- थानों के नोटिस बोर्ड,
- पुलिस वाहनों और साइनबोर्ड्स,
- सरकारी दफ्तरों के सूचना पट्ट
से जाति संबंधी सभी संकेत, स्टिकर और नारे हटाए जाएंगे।
इतना ही नहीं, जाति आधारित रैलियों और सार्वजनिक सभाओं पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर जातिगत विभाजन बढ़ाने वाले कंटेंट की सख्ती से निगरानी होगी।
SC/ST एक्ट मामलों में छूट:
हालांकि, जहां कानूनन जाति का उल्लेख जरूरी है, जैसे SC/ST (Atrocities) Act के मामलों में, वहां यह प्रावधान जारी रहेगा। इसके अलावा, आदेश को लागू करने के लिए सरकार SOP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) और पुलिस नियमावली में आवश्यक संशोधन करेगी।
क्यों अहम है यह फैसला?
भारत में सदियों से जातिगत भेदभाव सामाजिक ताने-बाने और न्याय व्यवस्था को प्रभावित करता रहा है। यूपी सरकार का यह कदम—
- प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाएगा,
- समानता और बंधुता की भावना को मजबूत करेगा,
- और समाज में जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को कम करने की दिशा में ठोस पहल साबित होगा।
संभावित चुनौतियाँ:
- क्रियान्वयन में कठिनाई – ग्रामीण और छोटे थानों तक आदेश का पालन सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- जागरूकता की कमी – पुलिस कर्मियों और आम जनता दोनों को इस नए नियम की जानकारी देना जरूरी होगा।
- सोशल मीडिया पर निगरानी – ऑनलाइन जातिगत कंटेंट को नियंत्रित करना आसान नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। अगर इसे सख्ती से लागू किया गया, तो यह समाज को जाति-आधारित पहचान और भेदभाव से मुक्त करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
