by-Ravindra Sikarwar
भोपाल गैस त्रासदी, दिसंबर 1984 की वह रात, जिसने न केवल मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल बल्कि पूरे भारत को हिला दिया। उस रात यूनियन कार्बाइड (Union Carbide India Limited – UCIL) के कीटनाशक संयंत्र से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) नामक जहरीली गैस रिसी और देखते ही देखते हजारों लोग मौत की नींद सो गए। लाखों लोग बीमारियों से जूझते रहे और पीढ़ियाँ तक इस आपदा का बोझ ढोती रहीं। सवाल आज भी वही है—आख़िर इस त्रासदी की असली वजह क्या थी?
यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री का इतिहास
भोपाल में UCIL की फैक्ट्री 1969 में स्थापित हुई थी। इसका उद्देश्य किसानों को कीटनाशक उपलब्ध कराना था। यहाँ मुख्य रूप से ‘सेविन’ (Sevin) नामक कीटनाशक बनाया जाता था। इस उत्पादन के लिए मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) का उपयोग होता था, जो अत्यधिक जहरीला और खतरनाक रसायन है।
शुरुआत में इस फैक्ट्री में सेफ्टी के पूरे प्रावधान रखे गए थे। लेकिन जैसे-जैसे लागत घटाने का दबाव बढ़ा, सुरक्षा मानकों से समझौता होने लगा।
तकनीकी ढांचा और MIC का खतरा:
मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) एक ऐसी गैस है जो नमी और पानी के संपर्क में आते ही अत्यधिक प्रतिक्रिया करती है। यह प्रतिक्रिया न केवल ज़हरीली गैस पैदा करती है बल्कि भयंकर गर्मी और दबाव भी उत्पन्न करती है। इसलिए MIC को हमेशा ठंडे और सूखे वातावरण में स्टील के टैंक में सुरक्षित रखा जाता है।
लेकिन भोपाल की फैक्ट्री में MIC को अत्यधिक मात्रा में स्टोर किया गया था। वहाँ तीन बड़े टैंक थे, जिनमें हजारों टन MIC भरा था, जबकि सुरक्षित मात्रा बहुत कम होनी चाहिए थी।
त्रासदी की रात: 2-3 दिसंबर 1984
दिसंबर की उस ठंडी रात, फैक्ट्री के एक टैंक (E-610) में बड़ी मात्रा में पानी चला गया। MIC और पानी की प्रतिक्रिया इतनी तेज़ हुई कि कुछ ही मिनटों में टैंक के अंदर दबाव और तापमान नियंत्रण से बाहर हो गया। गैस रिसाव शुरू हुआ और कुछ ही देर में यह जहरीली बादल बनकर पूरे भोपाल शहर पर छा गया।
लोग सो रहे थे। अचानक आंखों और गले में जलन, सांस लेने में तकलीफ और घबराहट के कारण हजारों लोग अपने घरों से बाहर भागे। लेकिन गैस इतनी घनी थी कि भागना भी बेकार साबित हुआ।
तत्काल कारण क्या था?
जाँच के अनुसार, टैंक में पानी जाने की कई संभावित वजहें थीं:
- पाइपलाइन की खराबी और मेंटेनेंस की लापरवाही – फैक्ट्री में उपकरण पुराने हो चुके थे और सही तरीके से रखरखाव नहीं किया गया।
- सुरक्षा प्रणालियों का बंद होना – गैस को रोकने और नियंत्रित करने वाले सुरक्षा सिस्टम जैसे रेफ्रिजरेशन यूनिट, गैस स्क्रबर और फ्लेयर टॉवर बंद पड़े थे या पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे थे।
- खर्च बचाने का दबाव – यूनियन कार्बाइड प्रबंधन ने लागत घटाने के लिए सुरक्षा पर होने वाले खर्च को कम कर दिया था।
इन कारणों से गैस टैंक में पानी चला गया और गैस नियंत्रित न हो सकी।
असली वजह: केवल तकनीकी खराबी नहीं:
अगर गहराई से देखा जाए तो भोपाल गैस त्रासदी की असली वजह सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं थी। इसमें कई परतें थीं:
- लागत कम करने की लालच:
कंपनी ने कर्मचारियों की संख्या कम कर दी थी। प्रशिक्षित इंजीनियरों और सुरक्षा विशेषज्ञों की जगह अस्थायी मजदूर रखे गए थे। इसका नतीजा यह हुआ कि तकनीकी सतर्कता कम हो गई। - सुरक्षा मानकों की अनदेखी:
- MIC को अधिक मात्रा में स्टोर करना ही खतरनाक था।
- रेफ्रिजरेशन यूनिट महीनों से बंद थी।
- अलार्म सिस्टम सही ढंग से काम नहीं कर रहा था।
- गैस स्क्रबर और फ्लेयर टॉवर जैसी आपात सुरक्षा प्रणालियाँ निष्क्रिय पड़ी थीं।
- प्रशासन और सरकार की उदासीनता
स्थानीय प्रशासन और सरकार को पहले से पता था कि यह फैक्ट्री खतरनाक है। कई बार शिकायतें भी की गईं, लेकिन राजनीतिक दबाव और उद्योग से मिलने वाले लाभ के चलते कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई। - यूनियन कार्बाइड की जिम्मेदारी से भागना
त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड ने तुरंत अपने CEO वॉरेन एंडरसन को भारत से बाहर भेज दिया। कंपनी ने अपनी जिम्मेदारी को कम दिखाने की कोशिश की और मुआवजे में भी टालमटोल किया।
मानव त्रासदी का भयावह रूप:
- आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, लगभग 3,000 लोग तुरंत मारे गए, लेकिन वास्तविक संख्या 15,000 से अधिक बताई जाती है।
- लगभग 5 लाख लोग प्रभावित हुए।
- गैस का असर पीढ़ियों तक रहा—जन्म दोष, कैंसर, सांस की बीमारियाँ, आंखों की रोशनी चली जाना, मानसिक समस्याएँ आदि।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और न्याय की विफलता:
भोपाल गैस कांड केवल औद्योगिक दुर्घटना नहीं था, बल्कि यह न्याय व्यवस्था और राजनीति की कमजोरी का भी प्रतीक बन गया।
- वॉरेन एंडरसन को गिरफ्तार किया गया, लेकिन कुछ ही घंटों में उन्हें रिहा कर अमेरिका भेज दिया गया।
- यूनियन कार्बाइड ने बाद में डॉव केमिकल (Dow Chemical) में विलय कर लिया और जिम्मेदारी से बच गई।
- भारतीय सरकार ने 470 मिलियन डॉलर का समझौता कर लिया, जो वास्तविक नुकसान की तुलना में बहुत कम था।
असली वजह का सार:
भोपाल गैस कांड की असली वजह एक नहीं, बल्कि कई स्तरों पर लापरवाही और लालच का मेल थी:
- तकनीकी असफलता: टैंक में पानी का प्रवेश और सुरक्षा प्रणालियों का निष्क्रिय होना।
- प्रबंधन की लापरवाही: खर्च बचाने के लिए सुरक्षा मानकों की अनदेखी।
- राजनीतिक उदासीनता: सरकार और प्रशासन का चेतावनियों को नजरअंदाज करना।
- कंपनी की गैर-जिम्मेदारी: त्रासदी के बाद भी यूनियन कार्बाइड का जिम्मेदारी से भागना।
आज की सीख:
भोपाल गैस त्रासदी हमें यह सिखाती है कि औद्योगिक विकास और आर्थिक लाभ के लिए मानव जीवन और पर्यावरण के साथ समझौता नहीं किया जा सकता।
आज भी दुनिया भर में रासायनिक फैक्ट्रियों और प्लांटों को यह उदाहरण याद दिलाता है कि सुरक्षा से कभी समझौता नहीं होना चाहिए।
