by-Ravindra Sikarwar
गुजरात के एक स्कूल को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान एक नाटक में बुरका पहनी लड़कियों को “आतंकवादी” के रूप में चित्रित करने के मामले में क्लीन चिट दिए जाने की खबरें हैं। इस घटना ने काफी विवाद खड़ा कर दिया था और कई लोगों ने इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला और आपत्तिजनक बताया था।
यह घटना स्वतंत्रता दिवस के समारोह के दौरान हुई थी। स्कूल के बच्चों द्वारा एक नाटक प्रस्तुत किया गया था, जिसमें कथित तौर पर कुछ पात्रों को बुरका पहने हुए दिखाया गया था और उन्हें “आतंकवादी” के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इस नाटक के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए थे, जिसके बाद पुलिस और शिक्षा विभाग ने मामले की जांच शुरू की थी।
इस नाटक को लेकर विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उनका आरोप था कि इस तरह का चित्रण एक विशेष समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाला और गलत धारणाओं को बढ़ावा देने वाला है। इसके बाद, मामला पुलिस तक पहुंचा और स्कूल प्रशासन के खिलाफ शिकायतें दर्ज की गईं।
जांच के दौरान, स्कूल प्रबंधन ने अपने बचाव में कहा कि नाटक का उद्देश्य किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ जागरूकता फैलाना था। उन्होंने दावा किया कि नाटक में बुरका का इस्तेमाल केवल एक प्रतीकात्मक प्रस्तुति थी और इसका मकसद किसी खास धर्म या पहनावे को निशाना बनाना नहीं था।
कई रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस और संबंधित अधिकारियों ने अपनी जांच पूरी करने के बाद स्कूल को इस मामले में क्लीन चिट दे दी है। जांच में पाया गया कि नाटक का उद्देश्य दुर्भावनापूर्ण नहीं था और इसे किसी विशेष समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के इरादे से नहीं किया गया था। अधिकारियों ने यह भी कहा कि नाटक को संदर्भ से हटाकर देखा गया, जिससे गलतफहमी पैदा हुई।
इस फैसले पर कुछ लोगों ने असहमति भी जताई है, उनका मानना है कि इस तरह के चित्रण से समाज में सांप्रदायिक सद्भाव को नुकसान पहुंचता है। वहीं, कुछ लोगों ने इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि कलात्मक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, इस घटना ने देश में कलात्मक अभिव्यक्ति और धार्मिक भावनाओं के बीच की नाजुक रेखा पर बहस छेड़ दी है।
