by-Ravindra Sikarwar
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में सभी राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि अनाथ बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा मिले। कोर्ट ने राज्यों से कहा है कि वे इस संबंध में जल्द से जल्द अधिसूचना जारी करें और इस प्रावधान को लागू करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएं।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा एक मौलिक अधिकार है और अनाथ बच्चों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इन बच्चों को समाज की मुख्यधारा में लाने और उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अत्यंत आवश्यक है।
कोर्ट का निर्देश और सरकार को सुझाव:
सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण निर्णय के पीछे शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 का हवाला दिया। इस अधिनियम के तहत, 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। कोर्ट ने कहा कि अनाथ बच्चे विशेष रूप से कमजोर वर्ग हैं और उन्हें इस अधिकार का लाभ मिलना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने राज्यों को यह भी सुझाव दिया है कि वे:
- अधिसूचना जारी करें: जल्द से जल्द एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर निजी स्कूलों को अनाथ बच्चों के लिए सीटें आरक्षित करने का निर्देश दें।
- पुनर्वास और शिक्षा: अनाथ बच्चों की पहचान कर उन्हें स्कूलों में दाखिला दिलाने की प्रक्रिया को सरल बनाएं।
- निगरानी तंत्र: यह सुनिश्चित करने के लिए एक निगरानी तंत्र स्थापित करें कि स्कूल इस निर्देश का पालन कर रहे हैं या नहीं।
अनाथ बच्चों के भविष्य के लिए एक बड़ा कदम:
यह फैसला लाखों अनाथ बच्चों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया है, जिन्हें अक्सर शिक्षा के अवसरों से वंचित रहना पड़ता है। यह निर्णय न केवल उनके लिए शिक्षा के द्वार खोलेगा, बल्कि उन्हें एक सम्मानजनक जीवन जीने और आत्मनिर्भर बनने में भी मदद करेगा। समाज के सबसे कमजोर वर्ग के अधिकारों की रक्षा की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील कदम माना जा रहा है।
