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by-Ravindra Sikarwar

अभिनेता से राजनेता बने विजय की किलदी (Keeladi) खुदाई के निष्कर्षों पर की गई टिप्पणियों को लेकर तमिलनाडु की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विजय ने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तमिल पहचान को दबाने की कोशिश कर रही है, जबकि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) पर तमिल गौरव का चयनात्मक उपयोग करने का आरोप लगाया गया है। इस मुद्दे ने एक बार फिर तमिल अस्मिता, इतिहास और राजनीतिक लाभ के लिए उसके इस्तेमाल पर बहस छेड़ दी है।

विजय के आरोप:

  • भाजपा पर तमिल इतिहास दबाने का आरोप:
    तमिलगा वेट्री कज़गम (TVK) के संस्थापक विजय ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर किलदी खुदाई के निष्कर्षों को दबाने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि भाजपा “हिंदी-संस्कृत एजेंडा” को बढ़ावा देने और “तमिल पहचान को मिटाने” का प्रयास कर रही है।
    विजय ने अपने पार्टी के X हैंडल पर जारी एक बयान में भाजपा की निंदा करते हुए कहा कि मूल किलदी उत्खनन रिपोर्ट जारी नहीं की गई है और परियोजना के प्रमुख पुरातत्वविद् अमरनाथ रामकृष्णन को उनके भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के ‘निदेशक पुरातत्व’ के पद से हटा दिया गया है। विजय का आरोप है कि केंद्र ने पुरातत्वविद् अमरनाथ रामकृष्णन से रिपोर्ट में बदलाव करने को कहा था, लेकिन जब उन्होंने इनकार कर दिया, तो उन्हें नोएडा स्थानांतरित कर दिया गया।
    विजय ने जोर देकर कहा कि “किलदी कोई पौराणिक कहानी नहीं है जिसका उपयोग लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए किया जाता है, बल्कि यह वैज्ञानिक साक्ष्य पर आधारित एक रिपोर्ट है, जो एक बार सामने आने पर भाजपा द्वारा बनाई गई कहानियों को नष्ट कर सकती है।” उन्होंने सुझाव दिया कि उत्खनन के निष्कर्ष सत्ताधारी पार्टी द्वारा समर्थित प्रमुख ऐतिहासिक आख्यानों को चुनौती देते हैं। विजय के अनुसार, किलदी स्थल संभावित रूप से यह साबित कर सकता है कि तमिल सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता से भी पुरानी है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट प्रकाशित करने की केंद्र की अनिच्छा “हिंदी और संस्कृत का उपयोग करके हमारी गौरवशाली तमिल भूमि, सभ्यता और संस्कृति को छिपाने” के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।
  • DMK पर चयनात्मक तमिल गौरव का आरोप:
    विजय ने अपनी आलोचना का रुख द्रमुक की ओर भी किया और कहा कि सत्तारूढ़ दल केवल तभी तमिल पहचान की बात करता है जब उन्हें यह सूट करता है। उन्होंने टिप्पणी की, “द्रमुक का नाटक बहुत बुरा है क्योंकि वे तमिल और थमिझर (तमिल लोग) का उपयोग तब करते हैं जब सरकार या शासकों के खिलाफ कुछ होता है।” यह टिप्पणी किलदी पुरातात्विक स्थल पर नए सिरे से ध्यान आकर्षित करती है, जो तमिल इतिहास पर बहस का केंद्र रहा है, जो संगम युग को हड़प्पा युग से भी पहले धकेलता है, और ऐतिहासिक आख्यानों के कथित राजनीतिक नियंत्रण पर सवाल उठाता है।

किलदी खुदाई के निष्कर्षों का महत्व:
किलदी खुदाई तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में वैगई नदी के किनारे एक छोटे से गांव किलदी में चल रही है। यहां से मिले पुरातात्विक साक्ष्य एक उन्नत शहरी सभ्यता के अस्तित्व का सुझाव देते हैं जो 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 1वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच फली-फूली। इनमें मिट्टी के बर्तन, उत्कीर्णित बर्तन के टुकड़े, सोने के आभूषण, तांबे की वस्तुएं, अर्ध-कीमती पत्थर, शंख और हाथी दांत के कंगन, कांच के मोती और बुनाई के उपकरण शामिल हैं।

विशेष रूप से, किलदी में तमिल-ब्राह्मी लिपि वाले मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े मिले हैं। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि ये निष्कर्ष तमिल-ब्राह्मी लिपि को 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक धकेलते हैं, जो अशोक के शिलालेखों से भी पुरानी हो सकती है। इन निष्कर्षों को भारत की दूसरी शहरीकरण की लहर से जोड़ा जा रहा है, जो गंगा के मैदानी इलाकों में शहरीकरण के समकालीन है।

केंद्रीय मंत्री और ASI की स्थिति:
केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किलदी उत्खनन के निष्कर्षों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया है और रिपोर्टों के लिए अधिक वैज्ञानिक सत्यापन की मांग की है। उन्होंने कहा है कि अमरनाथ रामकृष्णन द्वारा तैयार की गई रिपोर्टों में पर्याप्त तकनीकी सहायता का अभाव है। उन्होंने “एकल खोज” के आधार पर “पूरे विमर्श को बदलने” के प्रयासों के खिलाफ भी चेतावनी दी है।

ASI ने भी रिपोर्ट प्रकाशित करने में देरी की बात स्वीकार की है, लेकिन आरोपों को निराधार बताया है। ASI का कहना है कि रिपोर्ट में सुधार का अनुरोध “केवल वैज्ञानिक गुणवत्ता और विश्वसनीयता” को बढ़ाने के लिए किया गया था, न कि किसी निष्कर्ष को दबाने के लिए।

राजनीतिक निहितार्थ:
यह विवाद तमिलनाडु में राजनीतिक दलों के बीच तमिल अस्मिता और इतिहास के राजनीतिकरण को दर्शाता है। भाजपा, जो तमिलनाडु में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, पर अक्सर हिंदी और संस्कृत को थोपने और क्षेत्रीय पहचानों को कम आंकने का आरोप लगता रहा है। वहीं, द्रमुक, जो तमिल गौरव पर आधारित राजनीति करती है, पर अक्सर आरोप लगते हैं कि वह इन मुद्दों का इस्तेमाल केवल राजनीतिक संकटों के दौरान करती है।

विजय की टिप्पणी, जो एक लोकप्रिय अभिनेता होने के नाते एक बड़ा जनसमर्थन रखती है, इस बहस को और तेज कर रही है। उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कज़गम एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है, और तमिल अस्मिता के मुद्दे पर एक मजबूत रुख अपनाकर वह अपनी पैठ बनाना चाहती है।

यह मामला भारत में इतिहास, संस्कृति और राजनीति के जटिल संबंधों को उजागर करता है, जहां पुरातात्विक खोजें भी राजनीतिक अखाड़े में खींच ली जाती हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि किलदी के निष्कर्षों पर यह बहस तमिलनाडु और राष्ट्रीय स्तर पर किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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