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रिपोर्टर: रविन्‍द्र सिंह

OBC : मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण विवाद और हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बीच मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) ने असिस्टेंट टाउन प्लानर भर्ती परीक्षा का परिणाम जारी कर दिया है। 9 अक्टूबर को आए हाईकोर्ट के फैसले के बाद चयन एजेंसियों के कामकाज पर रोक की चर्चाओं के बीच यह पहला रिजल्ट सामने आया है, जिस पर अब नया कानूनी और प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। आयोग ने इस परिणाम को 87-13 फीसदी के फॉर्मूले के आधार पर घोषित किया है, जिससे अभ्यर्थियों और जानकारों के बीच बहस छिड़ गई है।

क्यों जारी किया गया यह रिजल्ट? आयोग का तर्क

OBC प्राप्त विवरण के अनुसार, इस भर्ती परीक्षा में कुल 39 पद विज्ञापित किए गए थे, जिन्हें 87-13 के फॉर्मूले में बांटा गया था। इसमें 87 प्रतिशत यानी 34 पद मुख्य भाग में और 13 प्रतिशत यानी 5 पद प्रोविजनल श्रेणी में रखे गए थे। आयोग के अधिकारियों के मुताबिक, 13 फीसदी प्रोविजनल पदों के लिए ओबीसी और अनारक्षित वर्ग से कोई भी उम्मीदवार आवश्यक कटऑफ अंक हासिल नहीं कर सका, जिससे ये पांचों पद खाली रह गए। चूँकि प्रोविजनल भाग में कोई भी अभ्यर्थी शॉर्टलिस्ट नहीं हुआ, इसलिए आयोग ने इसे 100 प्रतिशत परिणाम मानने की स्थिति बताते हुए रिजल्ट घोषित कर दिया।

हाईकोर्ट के निर्देशों और नियमों को लेकर उठ रहे सवाल

OBC भले ही आयोग ने इसे तकनीकी आधार पर सही ठहराया हो, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसमें प्रक्रियागत खामियां हैं। हाईकोर्ट के नए आदेश के अनुसार, अब प्रोविजनल पदों जैसी व्यवस्था का कोई औचित्य नहीं रह गया है और रिजल्ट 14% ओबीसी आरक्षण के दायरे में 100% पदों पर आना चाहिए था। इस हिसाब से चयन सूची 34 पदों की बजाय सभी 39 पदों के लिए जारी होनी चाहिए थी। आलोचकों का कहना है कि आयोग ने अभी भी अनारक्षित वर्ग के लिए 27 प्रतिशत पद ही आरक्षित रखे हैं, जबकि नियमों के मुताबिक यह संख्या अधिक होनी चाहिए, जो कि हाईकोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन प्रतीत होता है।

आगे क्या होगी प्रक्रिया और आयोग का पक्ष

OBC इस पूरे घटनाक्रम पर MPPSC के ओएसडी डॉ. रविन्द्र पंचभाई का कहना है कि चूंकि प्रोविजनल श्रेणी में कोई भी उम्मीदवार योग्य नहीं पाया गया, इसलिए यह परिणाम जारी किया गया है। आयोग अब उन अन्य परीक्षाओं के परिणामों पर भी विचार कर रहा है जिनमें प्रोविजनल पद या उम्मीदवार नहीं हैं। बहरहाल, इस रिजल्ट के आने के बाद से एक बार फिर मध्य प्रदेश की भर्तियों में आरक्षण के दांव-पेंच और कानूनी पेचीदगियां खुलकर सामने आ गई हैं, और सामान्य तथा आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों की निगाहें अब आगे के फैसलों पर टिकी हैं।

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