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रिपोर्टर: अतहर खान

Munger : पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव प्रबंधन और फॉरेस्ट्री (वानिकी) की शिक्षा के क्षेत्र में बिहार को आत्मनिर्भर बनाने के बड़े दावों के साथ शुरू हुआ संस्थान आज खुद प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है। मुंगेर में स्थापित बिहार का पहला और देश का दूसरा ‘वानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान संस्थान’ करोड़ों की लागत के बावजूद बुनियादी संसाधनों की घोर किल्लत से जूझ रहा है। आलम यह है कि आलीशान और अत्याधुनिक दिखने वाले इस परिसर में न तो पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही प्रैक्टिकल के लिए मुकम्मल प्रयोगशालाएं (लैब)। ऐसे में संस्थान में पढ़ रहे छात्रों का भविष्य अधर में लटका नजर आ रहा है।

Munger आलीशान और इको-फ्रेंडली परिसर, पर अंदर सुविधाएं नदारद

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर के अंतर्गत संचालित इस वानिकी कॉलेज की शुरुआत वर्ष 2023 में बड़े तामझाम के साथ की गई थी। लगभग 100 एकड़ के विशाल भूभाग में फैले इस पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) परिसर को देखकर पहली नजर में कोई भी प्रभावित हो सकता है। यहाँ पर्यावरण विज्ञान और फॉरेस्ट्री की उच्च शिक्षा दी जा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि यह शानदार ढांचा सिर्फ बाहर से ही चमक रहा है, अंदर शैक्षणिक संसाधनों का भारी टोटा है।

Munger 74 प्रोफेसरों की जगह सिर्फ 13 तैनात; ऑनलाइन चल रहीं कक्षाएं

संस्थान में स्टाफ की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ शिक्षकों और कर्मचारियों के स्वीकृत पदों के मुकाबले नाममात्र के लोग कार्यरत हैं। कॉलेज में अध्यापकों (शिक्षकों) के कुल 74 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में महज 13 शिक्षक ही पूरे कॉलेज का जिम्मा संभाल रहे हैं, यानी करीब 80 फीसदी पद खाली हैं। यही स्थिति गैर-शैक्षणिक स्टाफ की भी है, जहाँ 130 पदों के मुकाबले केवल 27 कर्मचारी ही तैनात हैं। फैकल्टी की इस भारी कमी के कारण छात्रों को कई मुख्य विषयों की पढ़ाई ऑनलाइन माध्यम से करनी पड़ रही है।

Munger ‘एक्रीडेशन’ और आधुनिक लैब का इंतजार; प्रबंधन ने दिया आश्वासन

कॉलेज के छात्र-छात्राओं का कहना है कि समय के साथ कुछ बुनियादी चीजें जरूर सुधरी हैं, लेकिन अभी भी एडवांस लैब, अपडेटेड लाइब्रेरी और पर्याप्त शैक्षणिक संसाधनों की भारी जरूरत है। प्रायोगिक शिक्षा (प्रैक्टिकल) के बिना वानिकी जैसे तकनीकी विषय को समझना बेहद मुश्किल हो रहा है।

इस संबंध में कॉलेज प्रशासन का पक्ष है कि नए शिक्षकों की बहाली, प्रयोगशालाओं को अत्याधुनिक बनाने और कॉलेज के राष्ट्रीय एक्रीडेशन (मान्यता) की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। प्रबंधन का दावा है कि वे सीमित संसाधनों में भी छात्रों की पढ़ाई को प्रभावित नहीं होने दे रहे हैं। अब देखना यह है कि बिहार सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन कब तक इन जरूरी सुविधाओं को बहाल कर छात्र-छात्राओं के भविष्य को सुरक्षित करता है।

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