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India–Turkey relations : वैश्विक कूटनीति के पटल पर भारत और तुर्की (Turkey) के रिश्तों को लेकर एक बार फिर नई सुगबुगाहट शुरू हो गई है। लंबे समय से ठंडे पड़े संबंधों के बीच अब तुर्की के रुख में नरमी देखने को मिल रही है। तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान ने एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संदेश देते हुए भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में तुर्की के इस कदम को बेहद रणनीतिक माना जा रहा है।

India–Turkey relations पाकिस्तान कार्ड को किनारे करने का संकेत, ‘ऑपरेशन दोस्त’ की यादें

तुर्की के विदेश मंत्री ने अंकारा में एक कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट रूप से कहा कि किसी तीसरे देश (परोक्ष रूप से पाकिस्तान) के साथ तुर्की के प्रगाढ़ संबंध भारत और तुर्की की आपसी कूटनीति के आड़े नहीं आने चाहिए। गौरतलब है कि विगत वर्षों में पाकिस्तान के प्रति तुर्की के झुकाव के कारण नई दिल्ली और अंकारा के बीच दूरियां बढ़ गई थीं। हालांकि, साल 2023 में जब तुर्की भीषण भूकंप से तड़प रहा था, तब भारत ने मानवता का परिचय देते हुए ‘ऑपरेशन दोस्त’ के तहत सबसे पहले मदद का हाथ बढ़ाया था, जिसे दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने की पहली शुरुआत माना गया।

India–Turkey relations पर्यटन और व्यापारिक मोर्चे पर तुर्की को हुआ था नुकसान

भारत से रिश्ते बिगड़ने का सीधा असर तुर्की की अर्थव्यवस्था के दो सबसे मजबूत स्तंभों—पर्यटन और व्यापार पर पड़ा था। भारतीय पर्यटकों के लिए तुर्की हमेशा से एक पसंदीदा वेकेशन डेस्टिनेशन रहा है, लेकिन दोनों देशों में वैचारिक मतभेद बढ़ने के बाद भारतीय ट्रेवल एजेंसियों और सैलानियों ने तुर्की का बहिष्कार कर अन्य वैकल्पिक देशों का रुख कर लिया था। इसके अलावा व्यावसायिक गतिविधियों में आई सुस्ती ने भी अंकारा को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने और भारत जैसे विशाल बाजार को वापस रिझाने के लिए मजबूर किया है।

India–Turkey relations वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते रसूख ने बदला अंकारा का नजरिया

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम एशिया, यूरोप और रक्षा तकनीक के क्षेत्र में भारत की रणनीतिक ताकत बहुत तेजी से बढ़ी है। भारत आज सिर्फ एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि रक्षा उपकरणों और मिसाइल प्रणालियों का एक प्रमुख निर्यातक बनकर उभरा है। भारत की इसी बढ़ती सैन्य और आर्थिक संप्रभुता को भांपते हुए अब राष्ट्रपति एर्दोगन की सरकार अपने पुराने बयानों से पीछे हटकर भारत के साथ संतुलन साधने की कोशिश कर रही है। अब देखना होगा कि आने वाले समय में दोनों देश आपसी अविश्वास को मिटाकर व्यापार और निवेश को कितनी नई रफ्तार दे पाते हैं।

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