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वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल

Editorial : राज्यसभा के उपसभापति रहे हरिवंश को फिर से राज्यसभा की सदस्यता मिल गई है। उन्हे इस बार जेडीयू ने राज्यसभा नहीं भेजा था। लेकिन भाजपा सरकार के निर्णय पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू को हरिवंश को राज्यसभा में मनोनीत करना पडा. राष्ट्रपति भवन से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि एक मनोनीत सांसद के रिटायरमेंट से जो रिक्ति हुई है, उस स्थान पर हरिवंश को मौका दिया गया है। अब वह फिर से राज्यसभा सांसद होंगे।

हरिवंश के मनोनयन से पत्रकार बिरादरी को खुश होने की जरुरत नहीं है क्योंकि अब हरवंश पत्रकारों के न वंश में हैं और न पत्रकारों के वंशज हैं. वे आज की तारीख में सत्तारूढ भाजपा के ‘यसमैन’ यानि हुकुम के गुलाम हैं. हरवंश को अबकी राज्यसभा की सदस्यता ईनाम -इकराम की शक्ल में मिली है.वे दूसरे जगदीप धनकड बनकर भाजपा के अधीन आ गए हैं. उन्हे धनकड गति भी याद नहीं रही.

राज्यसभा के उप सभापति रहै हरिवंश को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का करीबी माना जाता था, लेकिन बीते कुछ समय से उनके रिश्तों में जो दरार आई उसी के चलते नीतीश बाबू ने हरिवंश का पत्ता काट दिया था.उनके पिछले कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने सदन में उनकी जमकर सराहना की थी। उनका कहना था कि हरिवंश ने सदन चलाने में अच्छी भूमिका अदा की। इसके अलावा अपने अनुभव से राज्यसभा को समृद्ध किया है।

मोदीजी ने संकेत भी दे दिया था कि हरिवंश जी की राजनीतिक पारी अभी समाप्त नहीं हुई है और वह आगे भी जनहित में काम करते रहेंगे। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की वह टिप्पणी एक संकेत थी कि कैसे हरिवंश फिर से लौट सकते हैं और वही हुआ। हरिवंश का 9 अप्रैल को ही कार्यकाल समाप्त हुआ था और अगले ही दिन उन्हें नया मौका मिल गया है। पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का कार्यकाल समाप्त होने के बाद एक मनोनीत सांसद की सीट खाली थी। उसी स्थान पर हरिवंश को मौका मिला है। मोदीजी ने नीतीश बाबू को भी संकेत दे दिए हैं कि जिसे वे ठुकराएंगे, उसे भाजपा गले लगाएगी.

मुझसे उम्र में सिर्फ 2 साल बडे 69 साल के हरिवंश पहले ही दो बार राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वह उच्च सदन के उपसभापति भी रहे हैं। इस दौरान सरकार की ताल में ताल मिलाकर व्यवस्था के साथ सदन का संचालन करने की उनकी काबिलियत ही मोशा को भा गई. हरिवंश का लंबे समय तक पत्रकारिता का अनुभव रहा है।वे जिस आखबार के कारण नीतीश बाबू के खास बने उसमें मेरा दामाद भी संपादक रह चुका है.हरिवंश को नीतीश कुमार करीबी माना जाता था और इसी कारण वह जेडयू कोटे से दो बार राज्यसभा पहुंच गए. हरवंश को तीसरी बार राज्यसभा में जाने के लिए जदयू का वंश छोडना पडा. अब वे नागपुरिया संस्कृति के संवाहक हैं.

मेरी स्मृति में ऐसा पहली बार हो रहा है कि कोई व्यक्ति पहले किसी राजनीतिक दल से सांसद हुआ और उसे दोबारा राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया गया हो। कम से कम हरिवंश सिंह के मामले में यही हुआ है। सवाल यह है कि क्या यह कला और संस्कृति विभूतियों के प्रति अन्याय नहीं है? हरवंश किसी कलाकार की राज्यसभा सीट खा गए। हरवंश को खैरात ही बांटना थी तो भाजपा उन्हे अपने कोटे से राज्यसभा भेज देती.हरिवंश को राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की सीट से मनोनित किया है। रंजन गोगोई के रिटायर होने के बाद यह सीट खाली हुई थी। हरिवंश का कार्यकाल 2032 तक रहेगा।

आपको बता दूं कि राज्यसभा में अधिकतम 250 सदस्य हो सकते हैं। अभी 245 सदस्य हैं। इनमें से 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा मनोनित किया जाता है। कला, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान देने वालों को राष्ट्रपति द्वारा सांसद बनाया जाता है।

हरिवंश नारायण सिंह राजनेता बनने से पहले लंबे समय तक पत्रकार रहे। वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रहने वाले हैं। हरिवंश ने तीसरी बार राज्यसभा जाने के लिए कुछ किया हो या न किया हो लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने अपने उस जमीर को जरूर गिरवी रख दिया है जो एक पत्रकार के रूप में उन्हे समय ने दिया था.

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