Dedollarisation : दुनिया की आर्थिक व्यवस्था पिछले सात दशकों से एक ही धुरी पर घूमती रही है—अमेरिकी डॉलर। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कर्ज, निवेश और भुगतान प्रणाली में डॉलर की पकड़ इतनी गहरी है कि इसके बिना वैश्विक अर्थव्यवस्था की कल्पना करना मुश्किल लगता है। लेकिन अब ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य) की ओर से डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने की बातें जोर पकड़ रही हैं। सवाल यह है कि क्या यह सच में एक बड़ा बदलाव है या फिर सिर्फ एक आकर्षक सपना?
डॉलर की ताकत: सिर्फ मुद्रा नहीं, पूरी व्यवस्था
Dedollarisation अक्सर डॉलर की ताकत को आंकड़ों से समझा जाता है—जैसे अधिकांश वैश्विक लेनदेन डॉलर में होना या केंद्रीय बैंकों के भंडार में इसकी बड़ी हिस्सेदारी। लेकिन असली शक्ति इन आंकड़ों से आगे है। अमेरिका ने एक ऐसा संस्थागत ढांचा खड़ा किया है जिसमें आईएमएफ, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां और स्विफ्ट जैसी भुगतान प्रणालियां शामिल हैं।
यह ढांचा देशों को मजबूर नहीं करता, बल्कि नियम ही ऐसे बनाता है कि विकल्प सीमित हो जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार करना है तो डॉलर चाहिए, विदेशी निवेश लाना है तो अमेरिकी वित्तीय संस्थाओं की विश्वसनीयता जरूरी है। जो देश इस व्यवस्था से बाहर होता है, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था से भी लगभग कट जाता है।
ब्रिक्स की पहल: बदलती सोच या शुरुआती प्रयोग?
Dedollarisation ब्रिक्स देश इस जमी-जमाई सोच को चुनौती देना चाहते हैं। आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल, सोने से जुड़े डिजिटल करेंसी मॉडल और स्विफ्ट के विकल्प जैसी पहलें इसी दिशा में कदम हैं। चीन और रूस जैसे देश डॉलर पर निर्भरता घटाने में तेजी दिखा रहे हैं और ब्रिक्स के भीतर डॉलर की हिस्सेदारी में गिरावट भी दर्ज की जा रही है।
ये संकेत बताते हैं कि असंतोष बढ़ रहा है और देश विकल्प तलाश रहे हैं। सोने की कीमतों में उछाल और निवेशकों का विविध परिसंपत्तियों की ओर झुकाव भी इसी बदलाव की ओर इशारा करता है।
चुनौतियां और अंदरूनी विरोधाभास
Dedollarisation हालांकि, घोषणाओं और हकीकत के बीच बड़ा फासला है। ब्रिक्स देश एक-दूसरे से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। भारत और चीन के बीच रणनीतिक अविश्वास है, रूस आर्थिक दबाव में है, और बाकी देशों की आर्थिक क्षमता सीमित है। एक साझा मुद्रा या मजबूत वैकल्पिक व्यवस्था तभी संभव है जब राजनीतिक विश्वास, पारदर्शिता और समान नेतृत्व हो—जो फिलहाल कमजोर दिखता है।
अमेरिकी नीतियां और अनचाहा असर
Dedollarisation दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और वित्तीय दबावों ने ही कई देशों को विकल्प सोचने पर मजबूर किया है। जब किसी व्यवस्था को हथियार बनाया जाता है, तो भरोसा टूटता है। यही कारण है कि डॉलर के विकल्प की चर्चा अब केवल विचार नहीं रही, बल्कि रणनीति बनने लगी है।
निष्कर्ष
डॉलर का वर्चस्व रातोंरात खत्म नहीं होगा। यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें दशकों लग सकते हैं। ब्रिक्स की पहलें संकेत देती हैं कि दुनिया एकध्रुवीय आर्थिक सोच से बाहर निकलना चाहती है, लेकिन क्या यह बदलाव क्रांतिकारी होगा या क्रमिक—यह अभी भविष्य के गर्भ में है। फिलहाल इतना तय है कि डॉलर की बादशाहत पर पहली बार गंभीर सवाल उठे हैं।
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