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Geopolitics : अमेरिका की विदेश नीति में ऊर्जा संसाधनों, विशेषकर खनिज तेल, की भूमिका लंबे समय से केंद्रीय रही है। वर्ष 2001 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री मैडलिन ऑलब्राइट के एक चर्चित बयान ने इस सच्चाई को स्पष्ट कर दिया था कि तेल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि अमेरिकी शक्ति-संरचना की धुरी है। इसके बाद इराक पर 1991 और 2002 में हुए सैन्य आक्रमणों ने यह दिखाया कि अमेरिका अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए सैन्य हस्तक्षेप से भी पीछे नहीं हटता।

इराक में सत्ता परिवर्तन, सद्दाम हुसैन का अंत और पेट्रोलियम संसाधनों पर प्रभावी नियंत्रण इस नीति के प्रत्यक्ष उदाहरण रहे। इसी तरह वेनेजुएला में भी अमेरिका ने आर्थिक और राजनीतिक दबाव के माध्यम से वहां की सरकार को कमजोर करने का प्रयास किया, ताकि ऊर्जा संसाधनों पर अपना प्रभाव बनाए रखा जा सके।

ट्रंप युग और आर्थिक दबाव की राजनीति

Geopolitics वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य शक्ति के साथ-साथ व्यापार और टैरिफ को भी रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। भारत पर लगाए गए कठोर टैरिफ इसी नीति का हिस्सा थे। हालांकि हाल ही में संपन्न भारत–अमेरिका व्यापार समझौते से इन तनावों में कुछ कमी आने की उम्मीद है।

पश्चिम एशिया: वैश्विक राजनीति का संवेदनशील केंद्र

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक बार फिर अस्थिर शक्ति-संतुलन के दौर में प्रवेश कर चुकी है। पश्चिम एशिया, विशेष रूप से फारस की खाड़ी, इस उथल-पुथल का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा परमाणु ऊर्जा से संचालित विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन की खाड़ी क्षेत्र में तैनाती को देखा जाना चाहिए।

यह तैनाती केवल सैन्य कदम नहीं, बल्कि एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश भी है—अमेरिका यह दिखाना चाहता है कि वह अब भी क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

Geopolitics यूएसएस अब्राहम लिंकन: शक्ति और संदेश

Geopolitics यूएसएस अब्राहम लिंकन अमेरिकी नौसेना के सबसे शक्तिशाली विमानवाहक पोतों में शामिल है। इस पर लगभग 70 से 80 लड़ाकू विमान और करीब 6000 सैनिक तैनात रहते हैं। खाड़ी में इसकी मौजूदगी का उद्देश्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और अमेरिका के सहयोगी देशों—जैसे सऊदी अरब, इजराइल और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC)—को आश्वस्त करना है।

गौरतलब है कि दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग एक-चौथाई और एलएनजी का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जिस पर ईरान का प्रभाव है। एशिया की लगभग 85 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति इसी मार्ग से जुड़ी हुई है।

रूस की प्रतिक्रिया: बहुध्रुवीय विश्व की वकालत

Geopolitics रूस ने अमेरिकी विमानवाहक पोत की तैनाती को ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ करार देते हुए इसकी आलोचना की है। मॉस्को का मानना है कि सैन्य दबाव से नहीं, बल्कि संवाद और क्षेत्रीय सहयोग से ही स्थायी समाधान निकल सकता है। यूक्रेन युद्ध के बाद पहले से ही पश्चिम के साथ तनाव में चल रहे रूस के लिए यह कदम वैश्विक अस्थिरता को और बढ़ाने वाला है।

रूस एक ऐसी विश्व व्यवस्था का समर्थन करता है जहां शक्ति किसी एक देश के हाथ में केंद्रित न हो। इसी सोच के तहत वह ईरान के साथ अपने रक्षा और ऊर्जा संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है।

Geopolitics चीन का रुख: संतुलन और सतर्कता

इस मुद्दे पर चीन ने अपेक्षाकृत संयमित और कूटनीतिक प्रतिक्रिया दी है। उसने सीधे तौर पर अमेरिका की आलोचना करने से बचते हुए क्षेत्रीय शांति और स्थिरता पर जोर दिया है। पश्चिम एशिया चीन के लिए ऊर्जा आपूर्ति का अहम स्रोत है, इसलिए वहां किसी भी तरह की सैन्य अस्थिरता उसके आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती है।

चीन अमेरिका की ‘हार्ड पावर’ नीति के विपरीत, आर्थिक निवेश और कूटनीति के जरिए अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहता है और फिलहाल प्रत्यक्ष सैन्य टकराव से बचने की रणनीति पर चल रहा है।

भारत के लिए मायने: अवसर भी, जोखिम भी

भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र रणनीतिक, आर्थिक और सामाजिक—तीनों ही दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश अपनी लगभग 60 प्रतिशत तेल आवश्यकताएं इसी क्षेत्र से पूरी करता है और यहां बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक कार्यरत हैं।

इसके अलावा ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत का बड़ा निवेश है। इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड द्वारा संचालित शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल से अब तक सैकड़ों जहाजों और लाखों टन कार्गो का आवागमन हो चुका है।

Geopolitics रणनीतिक स्वायत्तता की चुनौती

यूएसएस अब्राहम लिंकन की तैनाती भारत के लिए दोहरे प्रभाव लेकर आ सकती है। एक ओर इससे भारत–अमेरिका रक्षा और समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूती मिल सकती है। दूसरी ओर रूस और ईरान जैसे पारंपरिक साझेदारों के साथ भारत के संबंधों में संतुलन बनाए रखना और अधिक जटिल हो सकता है।

सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा आपूर्ति और खाड़ी क्षेत्र में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर है। यदि तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतों में उछाल और आपूर्ति बाधित होने का खतरा रहेगा, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

निष्कर्ष

अमेरिका–ईरान तनाव के इस बदलते परिदृश्य में भारत के लिए सबसे बड़ी परीक्षा अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की है। संतुलित कूटनीति, विविध ऊर्जा स्रोतों की तलाश और क्षेत्रीय शांति के प्रयासों में सक्रिय भूमिका ही भारत को इन चुनौतियों से सुरक्षित निकाल सकती है।

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